क्या मुख्यमंत्री पांडवों से बड़े हो गए...? डूब मरो पांडवों को नीलाम करने वालों

संस्कृति और परंपरा क्या बिकाऊ है...? क्या देवभूमि कहलाने वाले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को इतना भी ज्ञान नहीं कि देवताओं से मनुष्य का स्वागत नहीं कराया जाता...? क्या उन आयोजकों और देवताओं को बुलाने वालों को भी पता नहीं था कि वो देवताओं से हैं, देवता उनसे नहीं हैं...? कौन है जो हमारी संस्कृति को नीलाम कर देना चाहता है...? कौन है जो हमारी परंपरा को तबाह कर देना चाहता है...? कौन है जो हमारी विरासत को डुबो देना चाहता है...? क्या बेशर्मी की भी कोई हद होती होगी...? मुझे नहीं लगता कि बेशर्मी की कोई हद होती होगी। बेशर्मी तो बेशर्मी ही होती है। चाहे कम हो या ज्यादा...। बेशर्मी में चोरी और डकैती जैसा फर्क भी नहीं कर सकते...। आपको बताते हैं कि असल में हुआ क्या...?



पांडवों की धरती

पांच पांडवों का नाम लेते ही मन श्रद्धा से भर जाता है। कहा जाता है कि प्रथम पूज्य श्री गणेश हैं। लेकिन, जौनसार से लेकर रंवाई तक जब भी लोग कोई शुभ कार्य करते हैं, तो बससे पहले पांच पांडवों को याद करते हैं। उनसे किसी भी काम को शुरू करने की इजाजत मांगते हैं। अपनी मेहतन से जो भी कमाते-खाते हैं। उसका सबसे पहला हिस्सा पांच पांडवों को चढ़ाया जाता है। ऐसा शायद ही कोई गांव होगा, जहां पांडवों की पूजा ना होती हो। हां कुछ अपवाद जरूर हो सकते हैं। जिस केदारनाथ भगवान पर सीएम श्रद्धा रखते हैं। वो भगवान केदारनाथ भी पांडवों के लिए ही केदारनाथ बने। उनको इस बात की शायद जानकारी नहीं कि केदारनाथ जी और भगवान पशुपति नाथ की लीला भी भगवान भोले नाथ ने पांडवों के लिए ही रची थी...।

सीएम बड़ा, देवता छोटे

देहरादून के मधुवन होटल में जो हुआ वो पांडवों का अपमान ही नहीं, हमारी समृद्ध संस्कृति और विरासत का घोर अपमान है। मुख्यमंत्री के स्वागत के लिए पांडवों को बुलाया गया। सोचिये क्या मुख्यमंत्री देवता हो गए...? क्या उनको इस बात की जानकारी नहीं कि देवताओं के आगे झुका जाता है...? देवता उनके आगे क्यों झुकें...? सोचिए सीएम देवताओं के आगे सिर झुकाना तो दूर, अपनी कुर्सी तक से खड़े नहीं हुए। कुर्सी का खेल बहुत बुरा होता है खैरासैंण के सूरज। कहीं पांडव रूठ गए, तो सूरज अस्त होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। जिसने आयोजन कराया और जिसने पांडवों के पाश्वाओं को ऐसा करने पर मजबूर किया, उनको कतई माफ नहीं किया जाना चाहिए। सांस्कृतिक आयोजनों, खुली जगहों पर पांडवों के जाने में कोई ऐतराज नहीं, लेकिन किसी होटल में मंच पर पांडवों को स्वागत के लिए लाना परंपरा रौंदने जैसा है।

परंपरा और संस्कृति को बाजार बना दिया
 
सरनौल की जिस संस्कृति पर पूरी रवांई घाटी को नाज है। उसे उसी गांव के कुछ लोगों ने कमाने का साधन बना दिया। बाजार में उतार दिया। खुले बाजार में। ना संस्कृति का ख्याल, ना परंपरा का ध्यान और ना पांच पांडवों के उन पाश्वाओं का मान, जिनको गांव में लोग पांडवों के अवतारों के नाम से ही पुकारते हैं। जब वो कहीं से लौटकर आते हैं, तो उन्हीं को पांच पांडव समझकर आशीष लेते हैं। उनके लिए रास्ते में गौ-मूत्र और गंगा जल छिड़कते हैं। उस मान-सम्मान को अपने निजी स्वार्थ के लिए बाजरू बना दिया। क्यों...?

गांव के लोग भी दुखी

देवताओं के अपमान और देवताओं को इस तरह खुले बाजार की चीज बनाने वालों से हर कोई नाराज है। शिक्षक और साहित्यकार ध्यान सिंह रावत ‘‘ध्यानी’’ इस बात को लेकर बहुत दुखी हैं। उनका कहना है कि ये संस्कृति का घोर अपमान है। उन्होंने कहा कि हमारी परंपरा को बर्बाद करना है। इसे अगर हम ये समझें की संस्कृति का विस्तार होगा, तो पूरी तरह गलत है। इस तरह से हमने अपनी संस्कृति को हाटलों में लेजाकर ना केवल पांच पांडवों का अपमान किया, बल्कि अपने बुजुर्गों, अपने गांव, अपने समाज और पूरी यमुनाघाटी का अपमान किया है। उन्होंने सवाल उठाया कि किसी होटल में मंच पर तीन फीट ही हाइट पर गेस्ट बैठे हों और उनके नीचे पांडव नृत्य करें वो भी ये कहकर कि पांडव मुख्यमंत्री का स्वागत कर रहे हैं। केवल ध्यान सिंह रावत ही नहीं। दूसरे लोग भी खासे नाराज हैं। इस पर जरूर चिंता की जानी चाहिए। मंथन किया जाना चाहिए। एक दायरा तो कम से कम हमको सेट करना ही पड़ेगा कि हमें करना क्या है...?
                                                                           ...प्रदीप रावत (रवांल्टा)
क्या मुख्यमंत्री पांडवों से बड़े हो गए...? डूब मरो पांडवों को नीलाम करने वालों क्या मुख्यमंत्री पांडवों से बड़े हो गए...? डूब मरो पांडवों को नीलाम करने वालों Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Wednesday, September 11, 2019 Rating: 5

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