ये लखिया भूत डराता नहीं, आशीर्वाद दे जाता है, जानें क्या है कुमौड़ की हिल-जात्रा

पिथौरागढ़ की हिल-जात्रा। एक ऐसा पर्व जो जितना पुरातन है उनका ही खास भी है। किसानों का पर्व है हिल-जात्रा। वैसे तो पिथौरागढ़ जिले के कई गांवों में हिल जात्रा होती है, लेकिन इनमें कुमौड़ की हिल-जात्रा विशेष होती है। कुमौड़ में लखिया भूत आता है। ये ऐसा भूत है, जो किसी को डराता नहीं है। बल्कि लोगों को आशीर्वाद देता है। किसानों के इस पर्व में हर पात्र खेती से जुड़ा होता है। ये कोई साधारण जात्रा नहीं है। पहाड़ के किसानों की यात्रा है। पहाड़ की समृद्ध संस्कृति की यात्रा है। बेहद शानदार हिल-जात्रा देखने लोगों का हुजूम यूं ही नहीं उमड़ता...।
हिल-जात्रा आपको अपने बिसरे पलों को याद दिलाती है। आपको हुक्का औी चिलम की गुड़गुड़ाहट सुनाई पड़ेगी। पहाड़ के खेतों में बैलों के हल जोतते हुए जो नखरे होते हैं, वो भी नजर आएंगे। बैलों की शानदार और बेमेल जोड़ियां भी नजर आएंगी। पड़वा बल्द भी इस हील-जात्रा में नजर आएगा। इतना ही नहीं। इस यात्रा में आपको काकड़, गोल भी दिखेंगे। ढोल और नगाड़ों की गूंज भी सुनाई पड़ेगी। इस हिल-जात्रा में अपको हर वो पारंपकिर संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी, जिसे लोग अब छोड़ देना चाहते हैं। लेकिन, हिल-जात्रा एक ऐसा आयोजन है, जो बिसरी परंपराओं को चाहने के बावजूद भी बिसरने नहीं देता।
हिल-जात्रा की संबंध चार वीर-भड़ महर भाइयों कुंवर सिंह महर, चैहज सिंह महर, चंचल सिंह महर और जाख सिंह महर की वीरता से भी माना जाता है। इसकी शुरूआत नेपाल से मानी जाती है। नेपाल के राजा ने कुमौड़ के चार महर भाईयों की वीरता से खुश होकर यह जात्रा भेंट स्वरुप उन्हें दी थी। मुखौटे, हल और दूसरी चीजें देने की बातें भी कही जाती हैं। इनको लेकर जब महर भाई अपने कुमौड़ा लौटे, तब उत्सव मनाया गया था और आज तक मनाया जा रहा है।
हिल-जात्रा रमाण के बाद प्रदेश और देश का दूसरा सबसे प्रसिद्ध मुखौटा नृत्य है। इसका मंचन देश के केई स्थानों पर हो चुका है। हिल-जात्रा को वर्षा ऋतु की समाप्ति और शरद के आगमन का त्योहार भी माना जाता है। उत्तराखंड के अलावा देश के सिक्किम, लेह लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, नेपाल, तिब्बत के अलावा चीन जापान और भूटान में भी मुखौटा नृत्य की परंपरा है। नेपाल में हिलजात्रा को इंदर जात्रा के नाम से जाना जाता है। 
मुखौटों के साथ होने वाले इस उत्सव में लोक जीवन के साथ आस्था और हास्य भी है। मुख्य पात्रों की भूमिका पुरुष निभाते हैं। लखिया भूत इस उत्सव का मुख्य पात्र है। लखिया भूत को भगवान शिव का गण माना जाता है। लखिया के हिल-जात्रा आयोजन मैदान में आने के बाद पूरे उत्सव पर आस्था का रंग चढ़ जाता है। लखिया भूत धन, धान्य और सुख समृद्धि का आर्शीवाद देता है।
                                                           ...प्रदीप रावत (रवांल्टा)
ये लखिया भूत डराता नहीं, आशीर्वाद दे जाता है, जानें क्या है कुमौड़ की हिल-जात्रा ये लखिया भूत डराता नहीं, आशीर्वाद दे जाता है, जानें क्या है कुमौड़ की हिल-जात्रा Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Wednesday, August 28, 2019 Rating: 5

No comments:

Powered by Blogger.