बेआवाजों की आवाज बने रवीश कुमार, बेबाक पत्रकारिता को रेमन मैगसेसे पुरस्कार

  • प्रदीप रावत (रवांल्टा)
रवीश कुमार बनना आसान नहीं है। बिल्कुल भी आसान नहीं। उनकी फेसबुक वाल पर जब वो कोई पोस्ट डालते हैं। ट्रोलर्स उन पर पागल कुत्तों की तरह भौंकने लगते हैं। उनके नंबर पर फोन कर गालियों की बौछार करते हैं। कमेंट में गिलयों की बौछार। इनबाॅक्स में भी गालियां और धमकियां। बाकायदा कई लोग पोस्टर बनाकर उनके खिलाफ नफरत परोसते हैं। मां-बहिन, पत्नी और बच्चों तक के लिए भद्दी गालियां होती हैं। उनके साथ ऐसा भी हुआ कि उनको दुकानदार ने सामान देने से तक मना कर दिया। रवीश ने हौसला बनाए रखा। बेआवाजों की आवाज बनते चले गए। जिनकी आवाज को सब दबा देते हैं। रवीश उनकी आवाज बनकर खड़े होते हैं। 


टीवी पर जोर-जोर से चिल्लाने वालों से अलग रवीश कुमार ने बगैर शोर के पत्रकारिता की। उनके शो का भाजपा ने बहष्किार कर दिया। उनको ट्रोल करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए गए। रवीश मजबूती से बन रहे। बेबाकी से लिखते रहे। आज उनको एशिया के नाॅबेल पुरस्कार कहे जाने वाले रेमाॅन मैगसेसे-2019 पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। ये उपलब्धि रवीश को प्यार करने वाले, उनका अनुशरण करने वाले, उनको आदर्श मानने वाले, उस सभी पत्रकारों युवाओं के लिए एक ताकत है, जो सरकार की खराब नीतियों से लोहा ले रहे हैं, जो अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। वैलडन रवीश जी। ये पुरस्कार आपका ही नहीं। हम सबका पुरस्कार भी है।  

पत्रकारिता की दुनिया में रवीश कुमार की पूरी दुनिया में अलग पहचान है। बेशक शोर मचाने वाले, चाटुकारिता करने वाले, महिमागान करने वाले, भक्ति करने वालों को उनसे ज्यादा तब्बजो नेता लोग देते होंगे, सरकार देती होगी, लेकिन सही मायने में रवीश जैसा बनने के लिए रवीश को जीना होगा। जितनी जिल्लतें रवीश कुमार सह रहे हैं, जितनी गालियां लोग उनको दे रहे हैं। उतनी गालियां टीवी इतिहास की पत्रकारिता में किसी दूसरे पत्रकार को नहीं मिली होगी। बावजूद इसके उनका हौसला कमजोर नहीं हुआ। और मजबूर हुआ। वो और ताकतवर बनकर उभरे। 

रवीश कुमार जिस एनडीटीवी इंडिया के मैनेजिंग एडिटर हैं। उसी एनडीटीवी में रवीश ने कभी लोगों की आने वाली चिट्ठियां छांटा करते थे। रवीश का समर्पण और उनका धौर्य उन्हें 2019 के रेमाॅन मैगसेसे पुरस्कार तक ले गया। पुरस्कार देने वाली संस्था ने ट्वीट कर बताया कि रवीश कुमार को यह सम्मान बेआवाजों की आवाज बनने के लिए दिया गया है। रैमन मैगसेसे अवार्ड फाउंडेशन ने कहा कि रवीश कुमार का कार्यक्रम प्राइम टाइम आम लोगों की वास्तविक और अनकही समस्याओं को उठाता है। प्रशस्ति पत्र में कहा गया, अगर आप लोगों की अवाज बन गए हैं, तो आप पत्रकार हैं। रवीश कुमार ऐसे छठे पत्रकार हैं, जिनको यह पुरस्कार मिला है। इससे पहले अमिताभ चैधरी 1961, बीजी वर्गीज 1975, अरुण शौरी 1982, आरके लक्ष्मण 1984, पी. साईंनाथ 2007 को यह पुरस्कार मिल चुका है।

किसी भी संस्थान के लिए उनके कर्मचारी को इतना बड़ा पुस्कार मिलना गौरव का पल होता है। एनडीटीवी ने भी लिखा कि ये उनके लिए गौरव का पल है। 1996 से रवीश कुमार एनडीटीवी से जुड़े हैं। शुरुआती दिनों में एनडीटीवी में आई चिट्ठियां छांटा करते थे। इसके बाद वो रिपोर्टिंग की ओर मुड़े और उनकी सजग आंख देश और समाज की विडंबनाओं को अचूक ढंग से पहचानती रही। रवीश की रिपोर्ट आम लोगों को आवाज बन गया था। वो प्रोग्राम टीवी पत्रकारिता की दुनिया का एक खास और अलग तरह का था। 

एंकरिंग में आए तो जहां एक और जोर-जोर से चिल्लाते। पैनल में आए गेस्ट को हड़काते और धमकाते, स्टूडियो में दौड़ लगाते, लोगों को चिल्लाकर अपनी सारी शर्म बेचकर बेशर्म कहने वाले एंकरों से बिल्कुल अलग। शांत। बिना शोर किए एक ऐसी परिभाषा गढ़ी, जिसके आसपा पहुंचना दूसरों के लिए शासद ही संभव होगा। जब भी किसी को लगता है कि उनकी आवाज सुनने वाला अब कोई नहीं है। उसे आखिर में रवीश कुमार से उम्मीद होती है। कई बार ऐसा भी हुआ, जो पहले उनको गाली देते थे। आज उनके बड़े फैन हैं। 

टीवी पत्रकारिता के इस शोर-शराबे की पत्रकारिता के बीच जहां चाटुकारिता ही सबकुछ है। वहां रवीश कुमार सरोकार वाली पत्रकारिता को जिंदा रखे हुए हैं। सत्ता के खिलाफ बेखौफ पत्रकारिता कर रहे हैं। करते रहेंगे। रवीश जी ये पुरस्कार हम सबका पुरस्कार है। सुनते ही हौसला कुलाचें मारने लगा है। सत्ता हमें भी डराना चाहती है। मगर हम डरने वालों में नहीं। डटकर सामना करने वालों में हैं।
बेआवाजों की आवाज बने रवीश कुमार, बेबाक पत्रकारिता को रेमन मैगसेसे पुरस्कार बेआवाजों की आवाज बने रवीश कुमार, बेबाक पत्रकारिता को रेमन मैगसेसे पुरस्कार Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Friday, August 02, 2019 Rating: 5

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