अधिकारियों के आगे मंत्रियों ने टेके घुटने...मुख्यमंत्री भी चुप

  • प्रदीप रावत (रवांल्टा)
टिहरी में हादसे में 10 बच्चों की मौत हो गई। ये महज बच्चों की मौत नहीं है, 10 परिवारों के भविष्य की मौत है। 10 परिवारों के चिराग बुझ गए। प्रदेश या देश के भविष्य की भी मौत है। हादसे का जिम्मेदार कौन है ? किसी को कुछ पता नहीं ? बस इतना कह दिया कि मोड़ आया चालक मोड़ नहीं पाया और वैन गिर गई। क्या इतना ही कारण है ? हादसे के बाद सरकार में परिवहन मंत्री यशपाल आर्य ने हादसे पर नाराजगी जताई। उन्होंने ये भी कहा कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुन रहे। सवाल परिवहन मंत्री से है कि अगर अधिकारी नहीं सुन रहे तो, उनको हटा क्यों नहीं देते ? दूसरा ये कि अगर अधिकारियों पर एक्शन नहीं ले सकते तो, फिर इस्तीफा क्यों नहीं दे देते ?


हैरानी देखिये। परिवहन मंत्री कह रहे हैं कि अधिकारी उनकी बात नहीं मानते। फिर किसकी बात मानते होंगे ? जनता की बात मानते होंगे ? सोचिये जो अधिकारी मंत्री की नहीं सुन रहे, वो जनता की बात क्या सुनते होंगे ? ये पहले बार नहीं है, जब सरकार के मंत्रियों ने अधिकारियों के आगे घुटने टेक दिए। पहले भी इस तरह की बातें सामने आ चुकी हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो, टिहरी जैसे हादसे और भी हो सकते हैं।

क्या समय रहते स्कूल वैनों, बसों की फिटनेस की जांच नहीं होनी चाहिए ? जिम्मेदारी तय होनी चाहिए कि हादसे का जिम्मेदार कौन है ? क्या केवल वैन चलाने वाले चालक को ही जिम्मेदार मानकर बात को समाप्त मान लेना चाहिए ? या परिवहन विभाग के अधिकारियों से लेकर स्कूल संचालकों और बदहाल सड़कों के लिए लोक निर्माण विभाग को जिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए ?

टिहरी में 9 मासूम बच्चों की मौत हो गई। क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। जिस वाहन कैब ने कई घरों के चिराग बुझा दिए। खुशियों को मातम में बदल दिया। उस बैक में 12 की जगह 19 बच्चे ठूंसे गए थे और पुलिस, परिवहन, स्कूल, शिक्षा विभाग से लेकर किसी को भी पता नहीं चला कि स्कूल कैब ओवर लोडेड है। जबकि दावा ये किया गया कि हर रोज चेकिंग की जाती है। फिर से कैसी चेकिंग थी। क्या चेकिंग अभियान का दावा करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए ? क्या हादसे के लिए जिला शिक्षा अधिकारी, स्कूल प्रबंधन, डीएम और एसपी जिम्मेदार नहीं हैं ? 

हाल ही में शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे ने भी कहा था कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते। यहां भी वही सवाल है कि अगर मंत्री की नहीं सुनते हैं, तो फिर किसकी सुनते हैं ? उन्होंने मुख्यमंत्री से अधिकारियों की शिकायत की बात कही। की या नहीं, ये वही जानें ? शिक्षा विभाग या दूसरे विभाग में मुख्यमंत्री की दखलअंदाजी की खबरें सामने आती रहती हैं। इनको भी गंभीरता से लेने की जरूरत है।

अधिकारी मंत्रियों की नहीं सुनते। सरकार के मुखिया अपने मंत्रियों की नहीं सुनते। ऐसे में काम कैसे चलेगा। जनता किसके पास जाएगी ? लोगों को अपने काम कराने के लिए अधिकारियों के पास ही जाना होता है, लेकिन जब अधिकारी मंत्रियों की ही नहीं सुन रहे हैं, तो जनता उनसे क्या उम्मीद कर सकती है। सरकार को इस बात को लेकर गंभीरता से चिंता करनी चाहिए कि अगर जनता की बातें ही अधिकारी नहीं सुनेंगे, तो फिर सरकार किस लिए। सरकार के मंत्री जनता के लिए होते हैं। अधिकारी उनकी नहीं सुनते, तो जनता कहां जाएगी ? सवाल सरकार से है। जवाब भी उनको ही देना होगा...।
अधिकारियों के आगे मंत्रियों ने टेके घुटने...मुख्यमंत्री भी चुप अधिकारियों के आगे मंत्रियों ने टेके घुटने...मुख्यमंत्री भी चुप Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Tuesday, August 06, 2019 Rating: 5

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