हेलीकाॅप्टर हादसा और इमरजेंसी लैंडिंग के बहाने...कुछ सवाल ?

आराकोट क्षेत्र में प्रकृति के क्रोध ने सबकुछ तहस-नहस कर दिया। भयंकर आपदा के बीच लोगों को बचाने का काम अब भी जारी है। हेलीकाॅप्टर हादसे के कारणों को तलाशा जा रहा है। कारणों का पता लगना भी चाहिए। इन अलग-अलग तरह की पड़तालों के बीच जो एक बात सामने आ रही है। वो यह है कि लोगों ने सेब की ढुलान के लिए खुद ही रोपवे बनाये हुए थे। उनकी तारों में उलझकर दोनों हादसे हुए हैं। क्या इन रोपवे को दोष दिया जाना चाहिए...? या फिर इन हादसों के लिए सीधेतौर पर सरकार जिम्मेदार है....? या फिर उड़ान भरते समय लापरवाही बरती गई...? ये सवाल उठाने का सही वक्त नहीं है, लेकिन सवाल उठने भी जरूरी हैं। सवालों से ही समाधान निकलता है। ये बात अलग है कि आजकल सवाल उठाने वालों को सवालों के बीच में लाकर खड़ा कर दिया जाता है। बहरहाल....। 


हेलीसेवा राहत-बचाव कार्य में वरदान साबित हुई। इसमें कोई दोराय नहीं है। जिन गांवों में नहीं पहुंचा जा रहा था। हेली सेवा के जबांज पायलटों ने इन जगहों पर राहत पहुंचाई। सबकुछ ठीक चल रहा था, फिर अचानक एक हादसा हुआ और हेलीकाॅप्टर क्रैश में एक जाबांज पायल, एक इंजीनियर और एक युवा राजपाल राणा की मौत हो गई। इस हादसे के बाद से ही सवाल उठने लगे थे। फिर एक दिन के अंतराल के बीच एक और हादसा। गनीमत रही कि पायलट हेलीकाॅप्टर की इमरजेंसी लैडिंग कराने में सफल रहा। इस हादसे के बाद सवाल और बडे़ भी हो गए और सवालों के पूछे जाने की रफ्तार भी तेज हो गई। 

हादसे के लिए यहां भी सेब की ढुलान के लिए लगाए गए तारों को ही दोषी ठहराया जा रहा है। सवाल यहीं से शुरू होते हैं। पहला सवाल इस बात पर है कि उड़ान भरने के लिए आदर्श ऊंचाई क्या होती है ? क्या पायलट ने वो आदर्श ऊंचाई हासिल की थी या फिर मानकों के नीचे उड़ान भऱ रहे थे ? अगर नीचे उड़ रहे थे, तो उसके पीछे के कारणों को जानना भी जरूरी है। आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि लो हाइट पर उड़ान भरनी पड़ी ? सवाल ये भी है कि जब हेलीपैड और हेली की उड़ान का रूट हेली कंपनियों के विशेषज्ञों के अनुसार तय किया गया था फिर हादसा क्यों हुआ ? एक दिन के अंतराल में दो हादसों का कारण भी एक जैसा कैसे हो सकता है ? वो भी तब, जब पायलट को पता हो कि एरिया में सेब की ढुलान के लिए लोगों ने तार से अस्थाई रोपवे बनाये हुए हैं। 


अब एक और पहलू पर बात करनी भी आवश्यक है। वो यह है कि लोगों की ऐसी क्या मजबूरी है कि उनको सेब की ढुलाई के लिए खुद से रोपवे बनाने पड़े ? क्यों सरकार ने ऐसी व्यवस्था नहीं कि जिससे लोगों को सेब की ढुलान के लिए जुगाड़ नहीं करना पड़ता ? कहीं ना कहीं हादसे के लिए सरकार भी बराबर की जिम्मेदार है। हम हिमाचल की बराबरी की बात करने की बातें करते हैं, लेकिन उनके जैसी व्यवस्थायें नहीं जुटा सकते। हिमाचल की तर्ज पर ही लोगों ने यहां ट्राॅली बनाई हैं, लेकिन हिमाचल में सरकार ने ही किसानों को व्यवस्थाएं दी हैं। हम ऐसी व्यवस्थाएं क्यों नहीं दे पाए ?
 
ये कोई पहला हादसा नहीं है। इससे पहले 17 हेलीकाॅप्टर क्रैश हो चुके हैं। कई लोगों की जानें जा चुकी हैं। फिर उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विभाग गंभीरता से काम क्यों नहीं करता ? सरकारें उत्तराखंड के हर जिले हो हवाई सेवा से कनेक्ट करने की बातें करती रही हैं। इसके लिए प्रदेश की 122 जगहों पर हेली सेवा और छोटे हवाई अड्डे बनाने की बातें करती है, लेकिन आज तक राज्य में एयर ट्रैफिक कांट्रोल सिस्टम तक डेवलेप नहीं कर पाये। देश के लगभग सभी राज्यों में एटीसीएस की व्यवस्था है। उत्तराखंड में क्यों नहीं ? जबकि हम हर साल चारधाम में हेली सेवा चलाते हैं। पिथौरागढ़ में हवाई सेवा शुरू कर चुके हैं। पतंनगर पहले से चालू है। जौलीग्रांट राज्य का सबसे बड़ा और व्यस्त हवाई अड्डा है। चिन्यालीसौड़ में हवाई पट्टी है। गौचर में हवाई पट्टी है। सीमाओं के हिलाज से भी उत्तराखंड राज्य अतिसंवेदनशील है। फिर क्यों नहीं एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम डेवलेप किया जा रहा है ? क्या हम और हादसों को इंतजार कर रहे हैं ? इस दिशा में तेजी से और गंभीरता से काम करने की जरूरत है।

....प्रदीप रावत (रवांल्टा)
हेलीकाॅप्टर हादसा और इमरजेंसी लैंडिंग के बहाने...कुछ सवाल ? हेलीकाॅप्टर हादसा और इमरजेंसी लैंडिंग के बहाने...कुछ सवाल ? Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Saturday, August 24, 2019 Rating: 5

No comments:

Powered by Blogger.