पहाड़ के एक नायक की याद...देखें फोटो

  • रामचंद्र गुहा
बात 1983 की है, जब अरविंद केजरीवाल हाफ पैंट पहनकर स्कूल जाते रहे होंगे, मेरे एक मित्र और मैंने एक संगठन बनाया था, जिसका नाम था, आप (एएपी)। इसका पूरा नाम था, (द) एसोसिएशन ऑफ अस्थमा पेशेंट्स। मेरे सह संस्थापक एक गढ़वाली वैज्ञानिक कमल जोशी थे। और पिथौरागढ़ कस्बे की पहाड़ी पर चढ़ते हुए सांस की तकलीफ होने पर हमें पता चला था कि हमें एक तरह की ही बीमारी है। 
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कमल और मैं इतिहासकार शेखर पाठक के बुलावे पर वहां गए थे, जिन्होंने हिमालय पर केंद्रित अपनी वार्षिकी पहाड़ (पीपुल्स एसोसिएशन फॉर हिमालय एरिया रिसर्च) का पहला अंक तैयार किया था। पत्रिका के औपचारिक विमोचन के बाद हमें देहात की ओर सैर के लिए ले जाया गया, जहां मैगनेसाइट खनन ने अपने गहरे निशान छोड़ रखे थे। पहाड़ के लंबे छरहरे और असंभव रूप से ह्रष्ट-पुष्ट संपादक तेजी से आगे बढ़ रहे थे, वहीं अस्थमा पीड़ित उनके दो दोस्त उनसे काफी पीछे रह गए थे।

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कमल जोशी और मेरे करीब आने की पहली वजह थी उत्तराखंड के पहाड़ों के प्रति हमारा प्रेम; और दूसरी वजह थी, शेखर पाठक के प्रति हमारा अनुराग, जोकि इतिहासकार होने के साथ ही ट्रेकर, कैम्पेनर, लेखक, संपादक और वक्ता हैं और जो उत्तराखंड का मूर्त रूप हैं, जिनके बारे में हम दोनों को पता था और हम उनसे प्रेम करते थे। लेकिन हम दोनों अस्थमा की पुरानी बीमारी से पीड़ित थे, जो कि हमारे अंतरंग संपर्क की तीसरी वजह बन गई। 
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कुछ लोगों को भांति-भांति के तंबाकू वाले पाइप आपस में जोड़ने का काम करते हैं; तो कुछ लोगों को सिंगल माल्ट व्हिस्की करीब लाती है। कमल और मुझे जोड़ने में सांस से संबंधित दवाएं एफेड्रीन और डेरिफाइलीन और सेरोफ्लो और फोरमोनाइड जैसे इनहेलर की भूमिका थी। हमारी संस्था आप (द एसोसिएशन ऑफ अस्थमा पेशेंट्स के लिए एक खुशी की बात यह भी थी कि पूरी तरह से स्वस्थ और तंदरूस्त शेखर पाठक को इसकी सदस्यता से पूरी तरह से बाहर रखा गया था।
कमल जोशी कोटद्वार में पैदा हुए थे और वहीं पले-बढ़े, जो कि हिमालय के छोर पर स्थित है और जहां से पहाड़ियों का तपते मैदानी इलाके से मिलन होता है। वह केमेस्ट्री के शानदार छात्र थे और यदि लेबोरेटरी के धुएं से उन्हें सांस की तकलीफ नहीं होती, तो वह शोध के क्षेत्र में अपना करियर बना सकते थे। स्नातकोत्तर में उच्च प्रथम श्रेणी की डिग्री के साथ वह अनुबंधित सरकारी सेवा में जा सकते थे; लेकिन न तो बंधी-बंधाई दिनचर्या और न ही दिखावे ने उन्हें आकर्षित किया, सो उन्होंने बाबू बनने से भी इनकार कर दिया। वह स्वतंत्र लेखक और फोटोग्राफर बन गए और अपने प्यारे पहाड़ों पर घूमने लगे और भौगोलिक परिदृश्य तथा जीवन को दर्ज करने लगे। अपनी शारीरिक मजबूरियों के बावजूद उन्होंने इच्छाशक्ति के दम पर ऊंचे पहाड़ों में चढ़ाई की, उनके पिट्ठू बैग में रखी दवाएं और इनहेलर्स उन्हें हौसला देते रहे।
1983 में पहाड़ के पहले अंक के प्रकाशन के बाद से इसके 17 अंक आ चुके हैं; इनमें से प्रत्येक सैकड़ों पेजों में है, जिनमें हिमालय की संस्कृति, पारिस्थितिकी, इतिहास, समाज, साहित्य और राजनीति पर मौलिक निबंध शामिल हैं। कमल जोशी इस पत्रिका के विजुअल हिस्से की जिम्मेदारी संभालते थे और साथ ही संपादन तथा फंड जुटाने जैसे कामों में भी मदद करते थे।
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1980 के दशक में कमल जोशी से मेरी अक्सर मुलाकात होती थी और 1990 के दशक में यदाकदा हम मिलते थे। बीमारियों और दुर्बलता के बावजूद उनमें असाधारण किस्म का जोश था। इसके बाद मैं बंगलुरू में बस गया था और वह कोटद्वार में, जिससे हमारा संपर्क टूट गया। 2017 में जब उनके निधन की खबर मिली, तो मुझे बहुत दुख हुआ था। जो लोग उन्हें मुझसे बेहतर तरीके से जानते थे और जिन्होंने उनके साथ ज्यादा वक्त गुजारा था, उन्हें उनके जाने से निश्चय ही अधिक दुख हुआ होगा। सौभाग्य से उन्होंने अपने शोक को 'कमल जोशी स्मृति' के रूप में एक सालाना आयोजन के जरिये रचनात्मक रूप दिया।

इसके पहले आयोजन में मैं शामिल नहीं हो सका था, लेकिन सौभाग्य से मुझे उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में इसी महीने की शुरुआत में हुए दूसरे आयोजन में जाने का अवसर मिला। टाउन हॉल में यह कार्यक्रम दिन भर चला, जिसमें वार्ता और विमर्श के साथ ही खेल हुए। सप्ताहांत न होने के बावजूद हॉल पूरा भरा हुआ था। श्रोताओं में विविधता थी, जिनमें शिक्षक, विद्यार्थी, नौकरशाह, व्यापारी और डॉक्टर इत्यादि शामिल थे। इनमें शेखर पाठक तो थे ही, दूसरे थे प्रोफेसर पुष्पेश पंत, जिन्हें कुछ लोग अंतरराष्ट्रीय मामलों के विद्वान के रूप में जानते हैं, तो बाकी लोग उन्हें भारत की पाककला के इतिहास के विशेषज्ञ के तौर पर, लेकिन वह यहां अपने मूल रूप में यानी एक ऐसे पहाड़ी के रूप में मौजूद थे, जिसकी अपने राज्य और वहां के लोगों में खासी दिलचस्पी है। 
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तीसरे थे, कमल के छोटे भाई डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, जिन्होंने पहाड़ों में जल संरक्षण और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए अनुकरणीय काम किया है। हालांकि कुछ गैर उत्तराखंडियों ने भी अपने विचार रखे, जिनमें जाने-माने सिनेमैटोग्राफर अपूर्ब कुमार बीर शामिल थे, जोकि कमल की स्मृति में युवा फोटोग्राफरों की एक प्रतिस्पर्धा का निर्णायक बनने के लिए मुंबई से आए थे।

जब तक वह जीवित थे, मुझे कमल जोशी को एक 'एक्टिविस्ट' मानने में झिझक होती थी, क्योंकि इस शब्द से परिहासरहित होने का भाव पैदा होता है और ऐसी प्रवृत्ति का भान होता है, जिसमें आप हर चीज को श्वेत-श्याम नजरिये से देखते हैं, जो कि मेरे मित्र के चरित्र से मेल नहीं खाती थी। और हां अपने मजाक और शरारतों के साथ कमल एक एक्टिविस्ट थे और अपने समाज से गहरे तक जुड़े हए थे और उसे अन्याय तथा तकलीफों से मुक्त करना चाहते थे। वह कई सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय थे, जिनमें बड़े बांधों और शराब के विरोध में होने वाले आंदोलन शामिल थे और इन सबसे ऊपर वह उत्तराखंड राज्य के निर्माण के आंदोलन में सक्रिय थे। 2000 में जब राज्य की स्थापना हुई, कई लोगों की तरह वह भी इसके लिए चुनी गई राजधानी को लेकर असंतुष्ट थे। उत्तराखंड के एक कोने में बसा देहरादून इस पहाड़ी राज्य की राजधानी के रूप में उपयुक्त नहीं था और कमल चाहते थे कि राजधानी को पहाड़ों में स्थानांतरित करना चाहिए, इसके लिए गैरसेण नामक गांव की तलाश भी की गई थी। 
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मीडिया में राष्ट्रीय नायकों को लेकर जुनून सवार है- मसलन वह प्रधानमंत्री और क्रिकेट टीम के कप्तान के रूप में महामानव चाहता है। भाषायी प्रेस का ध्यान भी फिल्म सितारे जैसे नायकों पर ही केंद्रित है। कमल जोशी जैसे खामोशी से समाज के लिए काम करने वाले लोग जिन्हें न धन की चाहत है न सत्ता या प्रसिद्धि की, उन पर मीडिया का ध्यान नहीं जाता। यह भी सच है कि वे खुद भी ऐसा नहीं चाहते। फिर भी ऐसे ही 'स्थानीय' नायक हमारे गणतंत्र में निहित लोकतंत्र और स्वतंत्रता की भावना को कहीं अधिक अच्छे से प्रस्तुत करते हैं। उस दिन देहरादून के टाउन हॉल में कमल जोशी की स्मृति को सम्मान देने के लिए मौजूद लोग इसे बखूबी समझते हैं।
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(नोट: ये लेख अमर उजाला से साभार लिया गया है। अमर उजाला के आज के संपादकीय पेज पर प्रकाशित भी किया गया है। लेख मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने लिखा है। रामचंद्र गुहा जी और कमल जोशी (कमल दा) के बीच गहरी दोस्ती थी। ऐसी दोस्ती जो एक बीमारी के बाद शुरू हुई। उन्होंने कममल दा को पहाड़ का नायक बताया है। सही मायनों में कमल दा पहाड़ के नायक थे। उन्होंने बगैर पब्लिसिटी के और अपने कामों का प्रचार किये बगैर चुपके से समाज को अपने हिस्से का बड़ा योगदान दिया और चले गए। उन्होंने महिलाओं के लिए भी काफी काम किये थे। पहाड़ की हर समस्या अपने फोटो के जरिए सामने लाते थे।)
पहाड़ के एक नायक की याद...देखें फोटो पहाड़ के एक नायक की याद...देखें फोटो Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, July 28, 2019 Rating: 5

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