अभी तो पहाड़ी सीएम पिटवा रहे हैं, जब मैदानी कर्णधार होंगे तब क्या होगा ?

  • चंद्रशेखर पैन्यूली
उत्तराखंड में आजकल कई बातों को लेकर आम जनमानस गुस्से में है। सबसे अधिक गुस्सा खानपुर विधायक कुंवर प्रणव सिंह के पूरे राज्य के अपमान किये जाने को लेकर है। दूसरा गुस्सा 108 के पूर्व कर्मियों के पिछले महीने से चल रहे आंदोलन में पुलिस के लाठीचार्ज में कई चोटिल हुए लोगों और सरकार के अड़ियल रवैये को लेकर है। तीसरा गुस्सा पिथौरागढ़ और नैनबाग के शिक्षक पुस्तक की मांग कर रहे छात्रों का है। चैथा गुस्सा देवप्रयाग विधान सभा में शराब की फैक्ट्री को लेकर है, तो वर्षो से राज्य की स्थाई राजधानी गैरसैण की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे आंदोलनकारियों का भी बड़ा गुस्सा देखने को मिल रहा है।

इसके अलावा पलायन, रोजगार के विषय पर तो हर व्यक्ति चिंतित है ही। रोजगार के लिए जून से अपनी मांगों को लेकर 108 के पूर्व कर्मियों की बात करना जरूरी है। सरकार ने उनकी मांगे तो मानी नहीं उल्टा उन्हें पुलिस से पिटवाया। जिसमें कई पूर्व कर्मी घायल हुए। समझ ये नहीं आ रहा कि पहाड़ी क्षेत्र पहले ही स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है। बहुत दूर-दूर तक पहाड़ो में कोई भी सुविधायुक्त अस्पताल नहीं ह। काफी हद तक 108 से लोगों को सुविधा मिल रही थी, लेकिन अब इनको भी हटाया दिया गया है। कारण किसी मध्यप्रदेश की कम्पनी को नया कांट्रेक्ट दिया जाना बताया जा रहा है। 
 
पिछले 10-12 सालों से इस उम्मीद के साथ कि कभी तो हम पक्के किये जायेंगे, अपनी सेवाएं दे रहे भाई-बहनों को सीधा घर बिठाया दिया। ऐसे हालात तब हैं, जबकि सीएम त्रिवेन्द्र रावत के पास ही स्वास्थ्य विभाग भी है। पूर्व में बीजेपी के बीसी खंडूरी सरकार ने ही निशंक के राज्य में स्वास्थ्य मंत्री रहते इस आपातकालीन 108 सेवा का शुभारंभ किया था, लेकिन आज इतनी लंबी सेवा देने के बाद इनपर जुल्म किया जा रहा है। पुलिस से पिटवाया जा रहा है, इन्हें भय दिखाया जा रहा है, जो बेहद ही दुःखद है। राज्य में आज रोजगार की स्थिति ऐसी है कि देव प्रयाग में खुल रही शराब की फैक्ट्री का स्थानीय लोग इसलिए विरोध नहीं कर रहे कि कुछ तो रोजगार घर बैठे मिलेगा।

108 के कर्मियों ने अपने 10-12 सालों तक लगातार शानदार सेवाएं दी, लेकिन अब इन्हें बाहर किया गया। विरोध स्वाभाविक है। पुलिस ने जो लाठीचार्ज उन पर किया वो सही नहीं ठहराया जा सकता। आखिर इनकी गलती क्या है? ये अपने रोजगार के लिए ही तो लड़ रहे हैं। क्या रोजगार मांगना गुनाह है? जरा सोचो इन 10-12 सालो में अधिकतर लोगों की शादी हो चुकी होगी, बच्चे भी होंगे। यानि घर की जिम्मेदारी उनके ऊपर है। ऐसे में किसी को कैसे बेरोजगार किया जा सकता है। कैसा अन्याय इनके साथ हो रहा है। मुख्यमंत्री जरूर इनकी समस्याओं का निदान करें, वरना इस तरह का गुस्सा राज्यवासियों के मन में फैलना सही नहीं है। आप जल्द मांगें पूरी नहीं कर सकते तो कम से कम पुलिस से तो न पिटवाओ।

उत्तराखंड के एक विधायक जो गाली गलौज बक रहा है। काश आपकी पुलिस के हाथ उस विधायक पर चलते। पर आपको तो शांतिपूर्वक धरना प्रदर्शन कर रहे पूर्व कर्मियों को पिटवाना था। इस पहाड़ी राज्य का दुर्भाग्य यही है कि इसकी अनदेखी हमारे ही नेता कर रहे हैं। आज जब ये स्थित्ति है कि एक पहाड़ी सीएम ही पहाड़ियों को पिटवा रहा तो आने वाले वक्त में क्या स्थित्ति होगी। जब पहाड़ के नेताओं का विधानसभा में प्रतिनिधित्व कम हो जायेगा और मैदानी क्षेत्रों के विधायक ही पहाड़ी राज्य के कर्णधार होंगे। इस तरह से अपने रोजगार के लिए धरना प्रदर्शन कर रहे पूर्व कर्मियों पर पुलिस बर्बरता कतई भी उचित नहीं है। डबल इंजन सरकार को इन पूर्व कर्मियों की मांगों को गम्भीरता से सुनना चाहिए।
अभी तो पहाड़ी सीएम पिटवा रहे हैं, जब मैदानी कर्णधार होंगे तब क्या होगा ? अभी तो पहाड़ी सीएम पिटवा रहे हैं, जब मैदानी कर्णधार होंगे तब क्या होगा ? Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Wednesday, July 17, 2019 Rating: 5

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