मेरे अधूरेपन की कहानी : डोबरा-चांठी पुल, क्या कभी मैं पूरा हो पाऊंगा

  • चंद्रशेखर पैन्यूली

मैं डोबरा चांठी पुल हूं, अरे हांं मैं ही हूंं, जो 2006 से भागीरथी के ऊपर निर्माणाधीन है। मुझे देश के बड़े पुलों की संज्ञा दी जाती है और साथ ही ऊंंचे पुल की भी, लेकिन मुझे खुद पे अपनी अधूरी कहानियां सुनते-सुनते अब शर्म आने लगी है। 2006 से 2020 आने को है। यानि 14 साल। पर मुझे नही जोड़ा जा सका। अरे मेरे कई कल पुर्जे भी वर्षो से पड़े-पड़े जंग खाने लगे हैं। 14 वर्ष में तो भगवान श्रीराम भी रावण पर फतह करके आयोध्या लौट गए थे। पर मेरा निर्माण मेरे देश के कर्णधार न कर सके।

आजकल ही चंद्रयान-2 का सफल प्रक्षेपण हुआ मुझे ख़ुशी हुई कि क्या पता मेरी तरफ भी अब नजर जाए। वैसे आपको बता दूं कि गत वर्ष प्रदेश कैबिनेट की बैठक मुझसे कुछ दूर ही हुई और तब सीएम साहब ने वादा किया था कि जल्द मेरा उदघाट्न होगा पर वो जल्द कब होता होगा ये भी मुझे नहींं पता।

आइये जरा आपको अपने निर्माण की जरूरत पड़ने की तरफ ले चलता हूंं। जैसा आप सभी जानते हैंं कि टिहरी में मांं भागीरथी और भिलंगना पर बांध बनने से टिहरी शहर सहित सैकड़ों गांव पानी में जलमग्न हो गए । जो डूब क्षेत्र में आये वो तो विस्तापित हो गए कोई देहरादून, कोई भानियावाला, कोई पशुलोक, कोई पथरी, कोई नई टिहरी, कोई ऋषिकेश पर अभागे प्रतापनगर, गाजणा वाले टिहरी बांध बनने के बाद एकदम अलग-थलग पड़ गए। इन लोगोंं को अभागा इसलिए कहा जा रहा कि यही तो है, जिनके लिए मेरा निर्माण हो रहा है। तकरीबन डेढ़ लाख की आबादी जो आज मुलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। उनकी उम्मीदों का एक सहारा मैं ही हूंं।

असल में भल्डियाना भारी वाहन पुल के झील में समा जाने से झील पार के लोगोंं को पचासों किमी लम्बे सफर को तय करके जाना होता है। ऐसे में यदि कोई प्रसूता हो, कोई दुर्घटना का शिकार हो। उसे जिला अस्पताल या ऋषिकेश देहरादून पहुंचाना हो तो जल्द नहींं पहुंचा सकते। लंबगांव से कोई निकलता है, या तो उसे भैंगा, स्यांसु होकर या पीपलडाली होकर लम्बे रूट से गुजरना होगा। स्वाभाविक है समय के साथ पैसा भी अधिक चाहिए। अब जरा बता दूं 2006 में आनन-फानन में तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित नारायण दत्त तिवारी और तत्कालीन प्रतापनगर विधायक फूल सिंह बिष्ट जी ने मेरे निर्माण की आधारशिला रखी थी।

तब मेरी लागत 90 करोड़ थी और मुझे 2009 तक बनना चाहिए था। नियति का खेल देखिये 2007 में प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ। विधायक बने तेज तर्रार छात्र नेता रहे, पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष विजय उर्फ़ गुड्डू भाई। गुड्डू भाई के आते मुझे बड़ी उम्मीद थी कि ये भाई जल्द मेरा निर्माण करवाएगा, लेकिन ऐसा न हो सका। मेरी लागत बढ़ाई गई। कई छोटे-मोटे ठेकेदारों के दिन भी मेरे नाम पर बहुरने लगे। किसी ने पुल की आड़ में अवैध रूप से स्टोन क्रशर लगाया, किसी ने बेवजह काम बंद करवाने की धमकी से ही अपने लिए कमाई देखी। वो तो भला हो सीए राजेश्वर पैन्यूली का जिन्होंने कई सूचना, अधिकार लगाकर जगह-जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर करके, मुझ तक इलेक्ट्रनिक मीडिया को लाकर वास्तविक स्थिति से सबको रूबरू करवाया।

क्या करें राजेश्वर को तीन बार विधायिकी में हार मिली। 2012 में पुनः प्रदेश की सत्ता कांग्रेस के हाथ लगी। विधायक बने एक पूर्व छात्र संघ अध्य्क्ष पूर्व प्रमुख रहे विक्रम नेगी से मुझे उम्मीद थी विक्रम नेगी जरूर पीपलडाली पुल की तरह जल्द मेरा निर्माण करवाएंगे, पर ये क्या विक्रम भाई भी ठेकेदारों के चंगुल से न बच सके। मेरे निर्माण की लागत एक बार फिर बढ़ाई गई। वही छोटे-मोटे ठेकेदार गाड़ी घोड़ों वाले हो गए। किसी ने मेरी की कृपा से नई टिहरी, तो किसी ने ऋषिकेश, दून में 2, 4 कमरे भी बना दिए। मेरा दुर्भाग्य तो देखिये कभी मेरा डिजाइन फेल बताया गया। कभी मेरी जगह को असुरक्षित कहा गया। लेकिन, चलते-फिरते 2017 में पुनः प्रदेश की सत्ता बीजेपी के पास आ गयी।

विधायक गुड्डू पंवार चुने गए। अब गुड्डू भाई ने जल्द मेरे निर्माण  होने की बात कही है,तमाम इंजीनियर ,स्पोर्ट स्टाफ,मजदूर भी तेजी से लगे है, असल में ऊंचाई पर होने और नीचे झील के कारण एक एक प्लेट जोड़ने में बड़ी परेशानी आती है हवा का रुख कब किस तरफ हो कुछ कह नही सकते खतरे से खेलते हैं मेरे लिए कार्य करने वाले,नेताओ का क्या है वो तो कोई नई डेट बता देंगे असल काम तो इन्ही बेचारों को करना है इसलिये इनकी सलामती की कामनाम मै सदैव माँ भागीरथी से करता हूँ,कि हे माँ कुछ वर्षों पूर्व एक इंजीनियर सहित कुछ लोग ट्रॉली टूटने से दुर्भाग्यवश आपके आगोश में आ गए थे,अब पुनः ऐसा न हो।

पर भाई सवाल तो यही है कि मेरा निर्माण पूरा होगा कब। कब सेम मुखेम के लिए रोडवेज मेरे ऊपर से गुजरे, कब प्रतापनगर के लिए पहले की तरह ऋषिकेश, देहरादून से विश्व्नाथ सेवा चले, कब श्रीनगर से प्रतापनगर, धारकोट रजाखेत की बस गुजरे, कब वाया लम्बगॉव, धौंत्री होकर उत्तरकाशी के लिए श्रीनगर से रोडवेज दौड़े, कब कोटालगॉव केमुंडाखाल के लिए देहरादून, दिल्ली से मेरे ऊपर से रोडवेज दौड़े, प्रवासी बन्धु कब अपनी महंगी महंगी गाड़ी लेकर मेरे ऊपर खड़े होकर सेल्फी खींचे। कब लम्बगॉव के लालाओं का सामान यहीं से होकर गुजरे, कब सरकारी कर्मचारी  ये न बोलेंं कि मैंं झील पार नहींं जाना चाहता, कब पहले की तरह लम्बगॉव का सुबह का चला मुसाफिर ऋषिकेश, देहरादून में अपना छोटा-मोटा काम निपटाकर शाम को वापस लम्बगॉव पहुंचे।

मेरा दुर्भाग्य तो देखो मेरा निर्माण जिस प्रतापनगर क्षेत्र को जोड़ने के लिए हो रहा है वहाँ के ठेकेदारों ने पूरे उत्तराखण्ड में जगह जगह विभिन्न निर्माण कार्य किये सड़क,अस्पताल,स्कूल आदि सभी काम तो लम्बगॉव के  ठेकेदारों ने किये और आज उन्ही के घर जाने के लिए भारी वाहन पुल नही है,शुक्री के कुड़ियाल हो या सौड़ के व्यास,रमोलगॉव के रमोला हो या पोखरियाल गॉव के पोखरियाल,जेबाला-वनकुण्डाली के रतूड़ी हो या भैंगा के बिष्ट,आदि सभी पुराने माने जाने ठेकेदारों की जन्मस्थली यही लम्बगॉव घाटी है। यहीं के लोगो ने अन्य लोगो को ठेकेदारी सिखायी पर आज खुद का पुल न बना सके,असल में एक दुर्भाग्य ये भी है कि इस क्षेत्र के लोग आपस में मिलकर काम करने के बजाय एक दूसरे की टांग खिंचाई करते हैं यदि राजेश्वर पैन्यूली ने कोई जानकारी पुल के सम्बन्ध में जाननी चाही तो लोगो ने उसे नकारात्मक रूप में लिया,कई युवा आज के शोशल मीडिया युग में समय समय पर इस पुल के बारे में कहते लिखते हैं उन्हें भी कहा जाता है इनका कुछ काम धाम नही, असल में एक बड़ा दुर्भाग्य ये भी हैंं कि जिस क्षेत्र के लिए मेरा निर्माण हो रहा है। यानि प्रतापनगर के लोग बड़ी संख्ता में पलायन कर गए, साथ ही स्व विधायक फूल सिंह बिष्ट के अलावा कभी किसी ने इस क्षेत्र के दर्द को नजदीक से महसूस भी नही किया,जबसे मैं बन रहा हूँ तबसे कई डीएम, कमिश्नर, इंजीनियर,सचिव सहित कई अधिकारी बदलते गये,कई प्रमुख,जिला पंचायत, बीडीसी प्रधान बदल गए पर कुछ न  बदला तो वो है मेरा निर्माण ,अब जब मेरा निर्माण बहुत तेजी से चल रहा है,तो कई नेता इसका श्रेय लेने की होड़ में जुट गये। 

मैंने करवाया,मैंने करवाया,अरे भाई पहले मुझे बनने तो दो कुछ प्लेटें लगी और तुम श्रेय लेना शुरू कर दिए हो,और जो लोग श्रेय ले रहे है उनसे सिर्फ मैं यही कहूंगा कि प्रिय बन्धुओ आप निर्माण का श्रेय तो ले रहे हो लेकिन इतने वर्षों की देरी के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है?जबकि बीजेपी,कांग्रेस दोनों की दलों के पास बारी बारी से सत्ता आती जाती रही।

मेरे अधूरेपन की कहानी : डोबरा-चांठी पुल, क्या कभी मैं पूरा हो पाऊंगा मेरे अधूरेपन की कहानी : डोबरा-चांठी पुल, क्या कभी मैं पूरा हो पाऊंगा Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Saturday, July 27, 2019 Rating: 5

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