मंत्री जी को पुरस्कार दिलाने के लिए भूख हड़ताल करें क्या...?

सरकार जाग जाओ। फिलहाल कुछ समय शेष है। सोचने का समय भी है। वैसे वक्त रेत की तरह होता है। मुट्ठी कितनी भी कसकर बांधो रेत फिसल ही जाती है। आपका वक्त भी फिसल रहा है...। पिथौरागढ़ और नैनबाग में किताब, गुरुजी और विषयों के लिए आंदोलन चल रहा है। पिथौरागढ़ का आंदोलन चर्चित और रचनात्मक है। पिथौरागढ़ के आंदोलन जितना नैनबाग का आंदोलन भले ही फेमस नहीं हो पाया, लेकिन उससे कम और अलग कतई नहीं है। एकदम उसी आंदोलन की तरह है। यहां पोस्टर, और स्लोगन थोड़े कम जरूर हैं, लेकिन जोश और जज्बा वही है। एक दम चट्टानी और फौलादी। ये मजबूत इरादे के छात्र आपसे वजीफा नहीं मांग रहे सरकार। खुद के लिए किताबें मांग रहे हैं। हम नैक रैंकिंग में भी सबसे पिछड़ों में हैं। ये छात्र तो आपका भला ही कर रहे हैं। जो आपको करना चाहिए, वो छात्र कर रहे हैं। काॅलेज सुधरेंगे तो रैंकिंग सुधरेगी। यूजीसी से ज्यादा अनुदान मिलेगा और अनुदान से दान का जुगाड़...है ना शानदार स्कीम।

नैनबाग में पिछले कई दिनों से छात्र-छात्राएं आंदोलन कर रहे हैं। छात्रसंघ अध्यक्ष छह दिनों से भूख हड़ताल पर है। सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ रहा। सरकार के बच्चे इन काॅलेजों में नहीं पढ़ते। फिर उनको क्यों फर्क पड़ेगा। सरकार के सरदार किसी की सुनते नहीं। धन दा, अब माननीय धन सिंह रावत जी कहलाने में फक्र महसूस करते हैं। और तो और वो इतने बलवान हो चले कि उनका विरोध करने वालों को मध्यप्रदेश वाले कैलाश विजय वर्गीय के बेटे से प्रेरित आपके पार्टी महामंत्री ने सरेराह पीट दिया और आप वहां से वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़ो चलो वाली चाल में निकल लिए। गजब हैं माननीय आप। पुस्कार वाली बात गहरी है। इसलिए उसे गहराई में लिख दिया माने सबसे आखिर में।
नैनाबाग के छात्र अपने लिए मास्टर, किताबें और कुछ सबजेक्ट मांग रहे हैं। अगर कुछ ऐसा जुगाड़ मांग रहे होते, जिससे कुछ वोट पट जाते, तो आप देरी नहीं करते। आप आॅफ दि रिकार्ड कुछ ज्यादा ही बोलने लगे हैं। कुछ दिनों पहले आपने पिथौरागढ़ वाले मामले में भी कुछ आॅफ दि रिकार्ड बोला था। आॅफ दि रिकार्ड इसलिए था क्योंकि आप झूठ बोल रहे थे। किसी एक का नहीं प्रदेश के हर काॅलेज का हाल बुरा है। कहीं मास्टर नहीं। विज्ञान विषय है। लाइब्रेरी नहीं। क्या करेंगे छात्र-छात्राएं। हमने तो मेंढक का आॅप्रेशन करना सीखा था। बहरहाल सरकार से किताबें मांग रहे हैं। 
नौकरी नहीं दे सकते तो कमसे कम किताबें तो दे ही सकते हैं। बेचारे पढ़-लिखकर बेरोजगारों की जमात में तो खड़े हो ही जाएंगे। उच्च शिक्षा की हालत आज प्राथमिक शिक्षा से भी बदत्तर है। ऐसा कम होता है कि सरकार बदहाली को भी उपलब्धि बताए। अपनी सरकार तो ऐसा ही कर रही है। किया कुछ नहीं, फिर भी महिमा मंडन क्यों...? आप काम कीजिए जनाब। महिमा क्या हम पूरी चालिसा ही गा देंगे, पर कुछ करिये तो सही। कुछ नहीं सबसे पहले किताबें और गुरुजी दिलावा दीजिए...बस। और हां अगर कुछ नहीं सकते, तो वो पुरस्कार वापस कर दीजिए, जो आपको दिल्ली में उच्च शिक्षा में युग परिवर्तन करने जैसे कामों के लिए मई में भारत ज्योमि अवार्ड दिया मिला था...नमस्कार।

...प्रदीप रावत (रवांल्टा)
मंत्री जी को पुरस्कार दिलाने के लिए भूख हड़ताल करें क्या...? मंत्री जी को पुरस्कार दिलाने के लिए भूख हड़ताल करें क्या...? Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Wednesday, July 17, 2019 Rating: 5

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