बस नाम की कमीश्नरी है पौड़ी, देहरादून में डेरा जमाए रहते हैं अधिकारी

सुना है सरकार पौड़ी जा रही है। इस बार कैबिनेट बैठक 29 जून को पौड़ी में होगी। सरकार कह रही है कि इससे लोगों को फायदा होगा। ठीक है। फायदा होना भी चाहिए, लेकिन सरकार को यह भी बताना चाहिए कि फायदा कैसा होगा। क्या पौड़ी में कैबिनेट कराए बगैर लोगों को फायदा नहीं हो रहा ? ये बड़ा सवाल है और इसका जवाब ना है। बहाना पौड़ी गढ़वाल कमिश्नरी के 50 साल पूरे होने का है।

क्या दूर होंगी जनता की समस्याएं

पौड़ी कमीश्नरी भी है। कमीश्नरी में जो कार्यालय होने चाहिए, वो भी हैं। उनके आलिशान भवन भी हैं, लेकिन उन भवनों में ना तो चमक बची है और ना उनको चमकाने वाले अधिकारी। हां कुछ कर्मचारी वहां जरूर मिल जाएंगे। अधिकारियों के चक्कर काटने वाली जनता भी कार्यालयों में भटकती नजर आ जाएगी। क्या सरकार के एक दिन वहां कैबिनेट बैठक करने से जनता की परेशानियां कम हो जाएंगी ? अगर होती हैं, तो ठीक है। वरना इस तरह से दिखावा करने से कुछ नहीं होने वाला।

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कैंप कार्यालयों में अधिकारी

पौड़ी में कमीश्नरी तो है, लेकिन कमीश्नरी के ज्यादातर कार्यालय देहरादून में शिफ्ट हो चुके हैं या उनके कैंप कार्यालय देहरादून में खोले गए हैं। अधिकारी भी ज्यादातर दिनों इन्हीं कैंप कार्यालयों में कैंप करते हैं। जनता को भी अधिकारी कभी देहरादून के कैंप कार्यालय तो कभी पौड़ी के कार्यालयों के चक्कर कटवाती रहती है। सवाल ये है कि सरकार के पौड़ी में कैबिनेट बैठक करने से लोगों को कैंप कार्यालयों के चक्कर काटने से मुक्ति मिल जाएगी ?

सरकार से सवाल

अगर कैबिनेट बैठक के बाद भी लोगों को कमीश्नरी में होने वाले कामों के लिए देहरादून के चक्कर काटने होंगे तो कैबिनेट बैठक किसी काम ? अगर अधिकारियों को देहरादून में ही रहना है फिर कमीश्नरी किसी काम की ? और कमीश्नरी की स्वण जयंती मनाने का क्या औचित्य ? क्यों कैबिनेट के नाम पर जनता को गुमराह किया जा रहा है ? 

कमिश्नर की व्यवस्था बड़ी सोच से की गई
कमिश्नर की व्यवस्था बड़ी सोच समझ से की गई है। इसका मकसद ही सत्ता के विकेंद्रीकरण का रहा है। सरकार भी वहीं कर रही है, लेकिन वर्तमान में जो स्थितियां हैं, वो कुछ और ही बयां कर रही हैं। कमिश्नर ब्रिटिशकालीन व्यवस्था है, जिसे आजादी के बाद खत्म कर दिया गया, लेकिन राज्यों ने इसकी अहमियत को समझते हुए फिर से इसे लागू किया था। कमीश्नर मुख्य रूप से शासन और प्रशासन का पुल होता है। जिसका काम पुलिस और राजस्व के कामों  की निगरानी करना तो है। सरकार के लिए कमिश्नर फीड बैक देने के साथ ही सलाहकार की भूमिका निभाने वाली संस्था भी होती है। इसके अलावा भी कई महत्वूपर्ण कार्य होते हैं। पौड़ी की बात करें तो पिछले करीब दो दशक में शायद ही कोई आयुक्त ऐसा होगा, 10 या 15 दिन लगातार वहां बैठा हो। कमिश्नरी नाम की पौड़ी है, लेकिन दफ्तर देहरादून में हैं। ऐसे में कैबिनेट से क्या उम्मीद की जा सकती है ?
                                                         

                                                          ...प्रदीप रावत (रवांल्टा)
बस नाम की कमीश्नरी है पौड़ी, देहरादून में डेरा जमाए रहते हैं अधिकारी बस नाम की कमीश्नरी है पौड़ी, देहरादून में डेरा जमाए रहते हैं अधिकारी Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Wednesday, June 19, 2019 Rating: 5

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