चैंस : सब खुणी पसंद, सैणी हो या मैस, बूढ़ी आमा का निराला स्वाद

चैंस कह लो, चैंसा या फिर चैंसू। नाम अलग-अलग अंचलों में कुछ फर्क के साथ अलग हों, लेकिन इसका स्वाद अस्कोट से बड़कोट तक पूरे उत्तराखंड में एक जैसा मिलेगा। थोड़ा उड़द की दाल का लसलसापन, कुछ इसको भूनकर बनाने के कारण इसमें आई क्रिस्पीनेस। मसालों में लहसुन और गंधरायण की महक और ऊपर से देसी घी में हींग और जम्मू के बघार की तैरती खुशबू।

उत्तराखंड का पहाड़ कैसे अपनी तमाम भौगोलिक प्रतिकूलताओं, सीमित संसाधनों और कम उपजाऊ जमीनों में मुट्ठी-दो मुट्ठी पैदावार के बावजूद हजारों-हजार साल तक अपनी अपनी अर्थव्यवस्था को बनाए व चलाए रख सका, इसमें चैंस का भी बहुत बड़ा योगदान है। चैंस में ऐसा गुण है कि थोड़ी मात्रा और लागत में भी ये फूल कर काफी मात्रा में बन जाता है, जा में कुटुम्ब समाए, साधु भी भूखा न जाए की तर्ज पर इसमें पूरा परिवार भी संतुष्ट हो जाता था और घर में आया मेहमान भी तर। अतिथि देव की सेवा सुश्रुषा के लिए बस चैंस के साथ खट्टे में घर में ही पड़े छांछ-मट्ठे या दही से झोई या ककड़ी का रायता बना लिया। टपकिया में घर के ही आगे-पीछे की बाड़ी-सागवाड़ी (किचन गार्डन) से राई, प्याज, मूली के पत्ते, लौंकी, तुरई, चचिंडा, कद्दू में से जो भी उपलब्ध हुआ, उसे तोड़कर तैयार कर लिया। गहरी थाली में भात और चैंस के एक किनारे पर टपकिया ने भी सम्मान के साथ अपना स्थान प्राप्त कर लिया। अब रह गई कसर सलाद की। सर्दी का मौसम है तो किचन गार्ड़न में मूली उग ही रही होगी, दूसरे मौसम में घर की रसोई में छत में झुंड के रूप में बंधी प्याज की ढेरियां होंगी ही। बस प्याज या मूली काटी साथ में थोड़ी सी भांग की या आग में भुने हरे टमाटरों व धनिया-लहसुन के पत्तों की चटनी टपकाई। लीजिए पूरी उत्तराखंडी भोजन थाली तैयार। कसम से ऐसा भोजन खिला दिया तो अतिथि देवता अगले दो-चार महीने तक सात गांवों में आपके भोजन की तारीफ के पुल बांधते रहेंगे।              

चैंस से मेरी याददाश्त का सिलसिला तब से जुड़ा है, जब मैं पांच या छह साल का बच्चा रहा होउंगा। उस साल हरिद्वार में महाकुंभ हो रहा था। हम कोटद्वार में रहते थे। पड़ोस में ही सजवाण परिवार की जीएमओयू में चलने वाली एक बस थी। पूरे मोहल्ले को निशुल्क सेवा में बस में हरिद्वार चलने का न्योता मिला। अपने माता-पिता के साथ मैं भी उस कुंभ में गया था। चंडीघाट के पास ही वहां कुमाऊं मंडल से गया एक परिवार कल्पवास कर रहा था। कल्पवास का मतलब पूरे कुंभ के दौरान इस परिवार को वहीं वास करना था और रोज गंगा स्नान करना था। ये परिवार कल्पवास के दौरान खुद खाना बनाकर बुला-बुलाकर दूसरे लोगों को भी खिलाता था। हम उनके शिविर के आगे से गुजरे तो उस परिवार ने हमें भी खाने का न्योता दिया। उनके आग्रह पर हम खाना खाने शिविर में पहुंचे। मुझे याद है खाने में चैंसा, बारीक खुशबूदार चावलों का भात और आलू-गोभी की सब्जी बनी थी और साथ में किनारे पर चम्मच से थोड़ा सा दही भी टपकाया गया।

उन लोगों की बातचीत से पता चला कि वो परिवार रामनगर के आसपास कहीं का रहने वाला था और घर पहुंचकर पिताजी ने ये राज खोला कि शिविर में बने खुशबूदार भात बिंदुली चावलों से बना था। बिंदुली एक दौर में रामनगर और काशीपुर के आसपास पैदा होने वाला स्वाद और खुशबू से भरपूर देसी नस्ल का बेहतरीन धान होता था। मुए पंतनगर यूनिवर्सिटी वालों के हाईब्रिड के झांसे में आकर इस इलाके के किसानों ने बिंदुली को छोड़ दिया और पूसा-1121 व शरबती जैसी नस्लों को अपना लिया। तब से बिंदुली धीरे-धीरे मिट गई। चार साल पहले भाई विनोद पपने की मदद से रामनगर में बिंदुली ढूंढने की बहुत कोशिश की, पर एक दाना भी नहीं मिल सका। खैर बिंदुली के स्वाद, खुशबू और गुणों पर फिर कभी अलग से। उस दिन तो हरिद्वार के कुंभ में मुझे वो खाना बहुत ही स्वादिष्ट लगा और मैंने खूब खाया। मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने कभी इससे ज्यादा स्वादिष्ट चैंसा कहीं और खाया होगा। काश इस परिवार का कोई सदस्य मुझे फिर कहीं और मिल पाता और मैं उससे पूछता, इतना स्वादिष्ट चैंसा कैसे बना लेते हो यार....। 

इसके बाद से चैंसा हमेशा मेरे जेहन में रचा-बसा रहा। खाता रहा, खिलाता रहा। पिछले दिनों भाई अशोक पांडे ने कहा कि अकेले-अकेले ही खाते हो। भाई इस लजीज पहाड़ी व्यंजन को तो सबको बनाना, खाना और खिलाना सिखाओ।... तो उनके हुक्म की तामील में चैंसा बनाने और सपोड़-सपोड़ कर खाने की विधि पेश-ए-खिदमत है।  

आवश्यक सामग्री (चार-पांच लोगों के लिए)

200 ग्राम उड़द की साबुत दाल

दो चम्मच गेहूं का आटा

आधा चम्मच लाल मिर्च पाउडर  

थोड़ी सा हल्दी पाउडर

एक चम्मच धनिया पाउडर

चौथाई चम्मच जीरा पाउडर

गंधरायण (चोरू) एक लोबिया के दाने बराबर  

तीन से चार कली लहसुन

नमक स्वादानुसार

सरसों का तेल लगभग 30-40 मिली

जखिया आधा चम्मच

हींग चुटकी भर

गार्निशिंग के लिए हरे धनिया की पत्ती

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बनाने की विधि

गंदरायणी और लहसुन को एक खरल में थोड़े से पानी में भिगाकर रख लीजिए। दूसरी तरफ सबसे पहले उड़द की दाल को सिलबट्टे पर या ग्राइंडर पर दरदरा पीस लीजिए। ध्यान रहे ये लगभग सूजी के आकार का हो। न ज्यादा मोटा और न इससे बारीक। ज्यादा मोटा होगा तो ये ढंग से गल नहीं पाएगा और अगर ज्यादा बारीक होगा तो फिर आपका चैंसा लप्सी जैसा लसलसा बनेगा। चैंसा का मजा तो तभी है, जब इसमें पड़ी दाल थोड़ी क्रिस्पी लगे और थोड़ी गली हुई।

इस दरदरी पिसी हुई दाल को एक बाउल में निकाल लीजिए। इसमें हल्दी, मिर्च, धनिया व जीरा पाउडर मिला लीजिए। इसके साथ ही इसमें दो चम्मच गेहूं का आटा भी मिला लीजिए। इन सबको खूब अच्छी तरह आपस में मिला लीजिए। अब गैस चूल्हे पर कड़ाही चढ़ा लीजिए। अगर कड़ाही लोहे की हो तो कहना ही क्या। लोहे की कड़ाही में चैंसे का कलर काला जरूर होगा, लेकिन इसमें आयरन की मात्रा बढ़ जाएगी और स्वाद भी कुछ डिफरेंट होगा। हां, इतना ध्यान जरूर रहे कि लोहे की कड़ाही में पके चैंसा को आप पूरी तरह पकने के बाद किसी दूसरे बरतन में निकाल लें। वरना आपकी कड़ाही से चैंसा में लोहे की महक आने लगेगी।

गैस चूल्हे पर कड़ाही के गरम होने पर इसमें सरसों का तेल डाल कर उसे गरम भी कर लीजिए। तेल गरम होने पर उसमें जखिया और हींग डाल लें। हींग की खुशबू उठने पर आंच को हल्का कर लें और  कड़ाही में चैंसा पाउडर डाल लें। इस पाउडर को तेल में लगातार भूनते रहें। हमारी करछी लगातार चलती रहनी चाहिए ताकि पाउडर बिल्कुल भी जलने न पाए। हमें इसे तब तक भूनते रहना है, जब तक ये एक भीनी-भीनी सी खुशबू न छोडंने लगे। हमारे चैंसा पाउडर में से भीनी-भीनी खुशबू उठने लगी है। भीनी-भीनी खुशबू उठने का मतलब है चैंसा अच्छी तरह भुन कर अगले एक्शन के लिए तैयार हो चुका है। अगला एक्शन है इसमें पानी मिलाना। लेकिन ध्यान रहे. इसमें पानी बहुत धीरे-धीरे मिलाएं। बिल्कुल उस तरह जैसे सूजी का हलवा बनाते हुए मिलाते हैं। अगर हमने बहुत सारा पानी एक साथ डाला तो इसमें गांठें पड़ जाएंगी। इसलिए धीरे-धीरे पानी डालते हुए इसे घोलते रहिए और जब यह एकसार सा हो जाए तो बाकी सारा पानी इसमें डाल दीजिए। पानी की मात्रा लगभग चार गुनी रखिए। अब इसमें स्वादानुसार नमक भी डाल दीजिए। चैंसा को लगभग 15 मिनट तक खौलने दीजिए। बीच-बीच में इसे करछी से चलाते रहिए, ताकि इसमें थक्के न जमने पाएं। 15 मिनट बाद चैंसा गाढ़ा होकर आधे से भी कम हो जाएगा और इसके ऊपर मलाई जैसी परत जमने लगेगी तो समझ लीजिए ये बनकर तैयार है। गैस को बंद कर लीजिए और तैयार चैंसा को किसी डोंगे में पलट दीजिए। ऊपर से बारीक कटे हरे धनिए से गार्निश कर लीजिए।

अब इस चैंसा को गहरी थालियों में गरमागरम भात के साथ परोसिए। ऊपर से थोड़ा सा देसी घी भी डालिए। आराम से पालथी मार कर बैठ जाइए। चैंस व भात को आपस में मिलाइए और सपोड़-सपोड़ कर तब तक खाइए, जब तक मन छपछप न हो जाए। बस ये ख्याल रखें इसको खाने का मजा गहरी थाली में हाथ से खाने में ही आएगा। मेलामाइन की प्लेटों में चम्मच से खाने में वो मजा नहीं आएगा।
चैंस : सब खुणी पसंद, सैणी हो या मैस, बूढ़ी आमा का निराला स्वाद चैंस : सब खुणी पसंद, सैणी हो या मैस, बूढ़ी आमा का निराला स्वाद Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Tuesday, June 04, 2019 Rating: 5

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