संस्कृति पर करारा प्रहार, बाबा केदार के दर पर नहीं सुनाई दी ढोल की थाप, भांगड़ा खूब हुआ

  • चंद्रशेखर पैन्यूली 
किसी भी देश प्रदेश या समाज की पहचान उसके रीति रिवाजों, उसकी संस्कृति से होती है, हमारा देश एक विशाल देश है। जहां कई तरह की संस्कृति रीति-रिवाज, बार-त्यौहार देखने को मिलते हैं। हमारे छोटे से प्रदेश उत्तराखंड में भी कई ऐसे रीति-रिवाज और संस्कृति है, जो हमें एक विशेष पहचान दिलाती है। कुछ पहचान हमें हमारे वाद्य यंत्र दिलाते हैं। उन्ही वाद्य यंत्रों में एक है ढोल-दमाऊ। ढोल-दमाऊ हमारी प्राचीन संस्कृति के द्योतक हैं। किसी भी मांगलिक कार्य, शुभ कार्य या किसी भी अवसर पर हमारे समाज में ढोल-दमाऊ की थाप पर कार्यक्रम होते हैं। लेकिन, बेहद दुःख तब हुआ जब इस बार विश्व प्रसिद्ध बाबा केदारनाथ के कपाट खुलते वक्त पहाड़ की पहचान ढोल-नगाड़ों के बजाय वहां पर देशी ढोल की थाप पर मन्दिर कपाट खुले।इस बड़ी भूल के लिए सीधे तौर से बीकेटीसी, राज्य सरकार, धर्म और संस्कृति मंत्रालय जिम्मेदार हैं। साथ ही ये स्थानीय बाजगियों की बड़ी अनदेखी है। क्योंकि सदियों से हमारे बाजीगर अपने ढोल-नगाड़ों की थाप के लिए जाने जाते हैं। कई बाजीगर (औजी) शामवेद के महान ज्ञाता हुए। लेकिन, जब केदार धाम जैसी पवित्र जगह पर ढोल-नगाड़ों के बजाय देशी ढोल को प्रमुखता मिलेगी तो साफ है कि इससे बाजीगरों का मनोबल टूटेगा। हमारी संस्कृति भी प्राभावित होगी। केदार नाथ में पहाड़ की संस्कृति के द्योतक ढोल-नगाड़ों का न होना बेहद दुर्भग्यपूर्ण है।

ढोल-दमाऊ हमारे लिए एक वाद्य यंत्र मात्र नहीं हंै। ये हमारी प्राचीन संस्कृति के द्योतक हैं। हमारे पूर्वजों की निशानी है। ये सिर्फ 4-6 किलो का ढोल मात्र नहीं है। ये हमारे देवी-देवताओं की निशानी होती है। देवी-देवताओं का वास ढोल पर माना जाता है। गढ़वाल के अधिकांश गांव में अपने-अपने आराध्य देवी-देवताओं के नाम पर ढोल बना होता है। जैसे नागराजा का ढोल, कोटेश्वर का ढोल, ओणेश्वर का ढोल, बटुक भैरव का ढोल, देवी मां का ढोल,  राजा रघुनाथ का ढोल आदि। ढोल सिर्फ मनोरंजन के साधन मात्र नहीं हैं, ये हमें अहसास कराते हैं, हमारी श्रेष्ठ संस्कृति का। किसी भी शुभ कार्य में ढोल बजने का मतलब देवी देवताओं को बुलावा होता है। लोग भले ही आज पहाड़ों से बड़ी संख्या में पलायन कर गए हों, लेकिन, अपने घर पर आज भी किसी भी शुभ कार्यों में वो अपने पैतृक गांव के देवी-देवताओं के ढोल को विधिवत न्योता देता है और ससम्मान बुलाता है। ये सम्मान हमारे बाजीगरों के प्रति भी अपनत्व और पारिवारिक सम्बन्धों को भी प्रगाढ़ करता है। क्योंकि जब ढोल आएगा तो स्वाभाविक है कि उसको बजाने वाला भी साथ ही होगा। ढोल मात्र नाचने-गाने या मनोरंजन का साधन नहीं है। ढोल हमें हमारी संस्कृति से रू-ब-रू करवाते हैं। 
ढोल की अलग-अलग धुनें दिन और समय का वर्गीकरण भी करते हैं। कहते हैं कि पहले के समय जब घड़ी नहीं थी, तो गांव में सार्वजनिक जगह पर गंव का बाजगी ढोल बजाकर समय की तरफ इशारा करता था। ये परम्परा आज भी जारी है। जैसे नपती लगाना, धुंयल बजाना, आदि। किसी भी मंडाण, थौले, पूजा, अनुष्ठान, मंन्दिरों में ढोल की थाप पर ही कार्यक्रम सम्पन होते हैं। ढोल हमारे कई रीति-रिवाजों का प्रतिनिधि है। जैसे चैत्र के महीने विवाहिता लड़कियों के यहां मायके पक्ष के औजी जाकर मायके की खुशखबरी देते थे और ससुराल से उनको ससम्मान विदा किया जाता है। जिसे हम लगमानी कहते हैं। साथ ही जब किसी दूर दराज के देवी देवता का ढोल हमारे घर गंव में आता है तो स्थानीय बाजीगर उसको पूर्ण सम्मान दिलवाता है। बाकायदा उसको सगुन देकर, पिठांई लगाई जाती है। अपने घर पर भी किसी भी शुभ कार्य में ढोल के घर पर आते ही सबसे पहले उसको नमन करते हुए उसको तिलक लगाकर सम्मान से आदरपूर्वक आमंत्रित किया जाता है।

हैरानी की बात है कि इस बार केदारनाथ धाम में स्थानीय ढोल-नगाड़ों का न दिखना बेहद दुःखद है। एक तरफ तो हम ढिंढोरा पीटते हैं कि हम संस्कृति और रीति-रिवाजों के सच्चे हितैषी हैं। हम पीएम मोदी के सामने इन्वेस्टर सम्मिट में मांगल गीत का बड़ा कार्यक्रम रखते हैं। वहीं, करोड़ांे लोगों की आस्था के केंद्र स्थल भगवान केदार के धाम में हम स्थानीय संस्कृति की पहचान ढोल-दमाऊ के बजाय देशी ढोल को बजाकर अपना कार्य पूर्ण समझ रहे हैं। 

केदारनाथ में भांगड़ा की धुन नहीं बल्कि, देवी देवताओं के आह्वान की धुन बजनी चाहिए। वो कोई पिकनिक स्पॉट नहीं बल्कि धार्मिक आस्था का केंद्र है। ये नहीं कि भांगड़ा बजवा दिया। 10-20 लोग थिरकें और हम खुश। ऐसा न हो बल्कि, ढोल दमाऊ की थाप पर देवी-देवताओं के आह्वान के साथ हम झूमें वो अधिक अच्छा होगा। साथ ही हमारे ढोल-दमाऊ से हमारे देश के विभिंन हिस्सों के साथ-साथ विदेशी श्रदालु भी परिचित हों। हमारे श्रेष्ठ रिवाजों और संस्कृति का प्रचार प्रसार हो।


संस्कृति पर करारा प्रहार, बाबा केदार के दर पर नहीं सुनाई दी ढोल की थाप, भांगड़ा खूब हुआ संस्कृति पर करारा प्रहार, बाबा केदार के दर पर नहीं सुनाई दी ढोल की थाप, भांगड़ा खूब हुआ Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, May 12, 2019 Rating: 5

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