मेरे घर आई एक नन्हीं चिड़ी

  • देवेन मेवाड़ी 

तपती गर्मी में कल शाम मेरे घर की बालकनी में पानी पीने आई एक नन्हीं-सी प्यारी चिड़िया ‘बबूना’। अंग्रेजी में लोग इसे ‘ओरियंटल ह्वाइट आइ’ कहते हैं क्योंकि इसकी आंख के चारों ओर एक सुंदर, सफेद घेरा होता है। गौरेया से छोटी और पतले, छरहरे शरीर की बबूना जब पानी से भरी मिट्टी की ट्रे के किनारे पर बैठी तो लंबी पूंछ और आंख के सफेद घेरे से पता लग गया कि यह अक्सर आने वाली दर्जिन तो कतई नहीं है। 


बेटी ने जब तक चुपचाप उसका फोटो शूट लिया, मैंने पक्षी विज्ञानी सालिम अली और असद रहमानी की पुस्तकों के पन्ने पलट डाले। पढ़ कर और देख कर इत्मिनान हो गया कि यह सफेद सुरमे वाली चिड़िया बबूना ही है। तभी तो पंजाब में इसे प्यार से सुनाक्खी, गुजराती में श्वेतनयना और मराठी में चश्मेवाला बोलते हैं। मध्य प्रदेश में तो और भी प्यारा नाम है- मोतीचूर। यों, पक्षी विज्ञानी इसे जोस्टेराप्स पल्पेब्रोसस कहते हैं। अब, बताइए ‘नाम में क्या रखा है’ का क्या मतलब? हर नाम में इस नन्हीं प्यारी चिड़ी के लिए कितना प्यार छलकता है। है ना? 

अपनी कई साथिनों के साथ इस पेड़ से उस पेड़ की टहनियों पर फुदकती, बतियाती बबूना भोजन के लिए कीट-पतंगे और उनके अंडे तलाशती हैं। फूलों पर जा-जा कर उनका रस चूसती हैं। छोटे-छोटे मीठे, कोमल, रसीले फल भी इन्हें खूब पसंद हैं। लेकिन, जानते हैं, झुंड में ये आपस में बतियाती क्यों रहती हैं? मैं भी नहीं जानता था पहले। यह तो रहमानी साहब की किताब से पता लगा कि पेड़ों की पत्तियों से भरी टहनियों के बीच कहीं कोई नन्हीं जान रास्ता भटक कर खो ना जाए, इसलिए वे बतियाती रहती हैं। इस तरह पता लगता रहता है कि कौन साथिन कहां है। इन दिनों ये हमारी बालकनी से सटे अमलतास पर आ रही हैं। 

एक मजेदार बात सुनिए। ये सदा पेड़ पर ही रहना पसंद करती हैं। जमीन पर उतरना इन्हें पसंद नहीं। तो फिर इस चिलचिलाती गर्मी में पानी? ये पेड़ों की पत्तियों पर जमा ओस की बूंदों से ही अपनी प्यास बुझा लेती हैं। उसी से स्नान भी कर लेती हैं। लेकिन, सैंतालिस डिग्री तापमान पर दिल्ली की अथाह गर्मी में ओस कहां? इसलिए जमीन पर नहीं, बालकनी में पानी पी रही हैं। पतली काली चोंच, हरी-पीली पीठ, पीला सीना और सफेद पेट। बहुत सुंदर है यह नन्हीं चिड़ी। लो, वह इसका चिड़ा भी आ गया पानी पीने। 

बबूना को पता है, प्रचंड गर्मी पड़ रही है तो मानसून दूर नहीं। इसलिए इनकी प्यार की ऋतु शुरू हो गई है। मानसून आने से पहले-पहले घर बसा लेना है। इसलिए मादा चिड़ी को रिझाने के लिए नर बबूना प्यार का सुरीला गीत गाने लगे हैं। गौर से सुनिएगा कभी, बहुत धीमी आवाज में गीत शुरू करके आरोह में सुर ऊपर उठता जाता है और फिर अवरोह में धीमा पड़ते-पड़ते रूक जाता है। प्रिया के दिल को छू लेता होगा यह प्यारा गीत। घर बसाने के लिए ये दो-शाख वाली टहनी के बीच तिनका-तिनका, रेशा-रेशा चुन कर, कप के आकार का घोंसला बना लेती हैं। उसे मकड़ी के जाले से लपेट कर कस देती हैं। घोंसला टहनी के सिरे के पास बनाती हैं ताकि वह झूलता भी रहे तो बचा रहे और वहां तक दुश्मन भी न पहुंच सके। 

फिर मादा उसमें दो-तीन अंडे देगी। दस-बारह दिन अंडे सेने के बाद उनसे नन्हे चूजे निकल आएंगे। और, यह सब काम मानसून से पहले। क्योंकि, अगर मानसून आ गया तो तेज हवा और बारिश के झौंके घोंसलों को झकझोर सकते हैं। घर बस गया तो फिर आता रहे मानसून। चिड़ी, चिड़ा और चूजे तो अब रिमझिम वर्षा की फुहारों का इंतजार करेंगे।


(देवेन मेवाड़ी जी विज्ञान प्रख्यात कहानी लेखक हैं ) 
मेरे घर आई एक नन्हीं चिड़ी मेरे घर आई एक नन्हीं चिड़ी Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Wednesday, May 29, 2019 Rating: 5

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