बड़ा सवाल...सरकार नाम की चीज है क्या उत्तराखंड में...?

सरकार नाम की चीज है क्या उत्तराखंड में...? यह एक सवाल है। कोई मामूली सवाल नहीं है। इस सवाल के कई मायने हैं। इस सवाल के कई अर्थ है। इस सवाल का जवाब जनता के पास तो होगा, लेकिन सरकार के पास नहीं। जनता से पूछोगे तो नाममात्र की सरकार का जवाब मिलेगा। सरकार पूछोगे तो, सरकार कोई जवाब ही नहीं दे पाएगी। 

सवाल का जवाब कुछ इस तरह भी है। जवाब में सवाल ही छुपा है। ...सरकार होती तो इतनी बेरोजगारी होती ? 108 वाले धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। कोई सुनवाई नहीं हो रही है। नई नौकरी का विज्ञापन कब से नहीं निकला ? सभी जानते हैं। पहले जीबीके ने सरकारों के साथ मिलकर हमेशा पहाड़ियों, स्थानीय लोगों को छला। ये जो एमओयू पर दस्तखत करने की बातें कर रहे हैं। ये अपनी पीठ थपथपाने और अपने आकाओं की नजर में अपने नम्बर बढ़ाने के लिए किये गए ड्रामे हैं, ताकि कुर्सी सलामत रहे। 

मुख्यमंत्री जी भयंकर अहंकारी हो चुके हैं। वो अपने ही करीबियों को ठिकाने लगाने पर तुले हैं। उन्हें पता है कुर्सी की डोर तो ऊपर ही है। यहां जनता को बेवकूफ बनाओ। कोई दिक्कत नहीं। अगर बीजेपी लोकसभा में 5 सीटंे जीत भी जाये तो, इसे प्रदेश सरकार की उपलब्धि से जोड़ना बेमानी होगा। लगाता नहीं है कि प्रदेश की जनता ने प्रदेश सरकार की उपलब्धि पर वोट किये होंगे। वोट सिर्फ पीएम मोदी के नाम पर पड़े होंगे, ये बात तय है।  मुझे भी भक्त श्रेणी में रखा जाता है। खैर ये उनका अधिकारी है। हां हम सच्चाई कहने भी जज्बा रखते हैं। बीजेपी अब दो-तीन लोगों को हो गई है। वहां सामूहिकता के बजाय मैं ही श्रेष्ठ की राजनीति पर काम चल रहा है। आज के लिए तो ठीक हो सकते हैं, वोट मिल जाये पर संगठन की दृष्टि से ये भविष्य के लिए खतरनाक संकेत हैं। 

सब छल कर रह हैं। एक एनआईटी हमसे बना नहीं। नौकरी हम लगा नहीं सकते। गैरसंैण हम जाना नहीं चाहते। ऊपर से आम आदमी के लिए सचिवालय में 2 घंटे का नियम। क्या है ये सब ? सचिवालय से बाहर करना है तो उन चोरों को करो जो नंगे आते हैं और यहां गाड़ी बंगला बनाकर यहीं के होकर हम पर रौब झाड़ते हैं। बिहार, सहरानपुर, मुज्जफरनगर, मेरठ से आने वाले दलालों को बाहर करो। हां उसके लिए हिम्मत चाहिए। खैर क्या कहें। ज्यादा कहने का डर भी है। सरकार पुलिस से भी डराती है। पर सच्चाई और वास्तविकता सभी जानते हैं। बस कहना कोई नहीं चाहता। 

ये सही है कि बीजेपी को भले ही 2017 में 57 विधायक मिले हों। लेकिन, बीजेपी सरकार उत्तराखंड में इसी तरह काम करती रही तो, 2022 में 56 मेसे 20, 21 तक ही जीतकर आएंगे। आम आदमी या आम जनता को ये मतलब नहीं रहता कि क्या कुछ हो रहा है। राज-काज में उसे रोजी-रोटी के लिए रोजगार चाहिए। जब इतने सारे एमओयू साइन हुए हैं, तो क्यों नहीं रोजगार दे रहे हो ? आखिर युवा को क्यों अपनी रोजी-रोटी के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है ? राज्य सरकार को प्रदेश में रोजगार मुहैया करवाना चाहिए न कि बेरोजगारी बढ़ानी चाहिए। जनता हर बार मोदी के नाम पर वोट नहीं कर सकती। कुछ काम नहीं होंगे तो शायद कैडर वोट भी खिसक जाये। क्योंकि कैडर कार्यकर्ताओं की बदौलत होता है और कार्यकर्ता आम जनता के बीच से ही होता है। यदि जनता ही नाराज तो वोट देने के लिए कार्यकर्ता कहेंगे भी कैसे और किसे। 

उत्तराखंड का विकास सिर्फ मैदानी भागों को चमकाने या मैदानी भागों में ही अधिक बजट खर्च करने से हो जायेगा। क्योंकि जनता ने पलायन कर दिया उनको खुश करने के लिए मैदान में ही बजट खपाया जा रहा है। अधिक क्षेत्रफल पहाड़ी भूभाग ही है और इसी भूभाग के लिए प्रदेश की जनता ने आंदोलन किये, कुर्बानी दी। ये भी एक सच्चाई है कि यदि राज्य न बनता तो कई विधायक जो आज खुदे को बड़े सुरमा और धुरन्धर मान रहे हैं। न वो बीडीसी होता, ना जिला पंचायत सदस्य। प्रदेश सरकार को आम जनता और बेरोजगारों की आवाज को अनसुना नहीं करना चाहिए। वरना जनता सदैव बड़ा उलटफेर करने का दम रखती है। ये न भूलें लोकतन्त्र में जनता को ही जनार्दन कहा जाता है।
बड़ा सवाल...सरकार नाम की चीज है क्या उत्तराखंड में...? बड़ा सवाल...सरकार नाम की चीज है क्या उत्तराखंड में...? Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Saturday, May 11, 2019 Rating: 5

No comments:

Powered by Blogger.