दो महिलाओं ने एक-दूसरे के पतियों की जान बचाने के लिए एक्स्चेंज कर लिए लीवर

नई दिल्ली: जिंदगी आपको ऐसे रंग लिखाती है कि आप जिंदगी के रंगों को पहचानने औ समझने में ही जीवनभर उलझ कर रह जाते हैं। जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं सामने आती है, जो लोगों को बहुत बड़ा सबक दे जाती हैं। कुछ ऐसा साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में देखने को मिला। दो महिलाओं ने अपने-अपने पति की जान बचाने के लिए एक-दूसरे के पति को लीवर डोनेट कर नई जिंदगी दी। लीवर स्वैप ट्रांसप्लांट के जरिए इस सर्जरी को किया गया। एक साथ चार ऑपरेशन थिअटर में चार सर्जरी की गई।

अस्पताल के दो ऑपरेशन थिअटर में डोनर के शरीर से लीवर निकालने के लिए सर्जरी शुरू हुई तो, दो ऑपरेशन थिएटर में मरीज में लीवर ट्रांसप्लांट की सर्जरी शुरू हुई। 12 घंटे की मैराथन सर्जरी के बाद यह ट्रांसप्लांट सफल हुआ। दरअसल, योगेश शर्मा और हरमिंदर सिंह दोनों मरीज लीवर फेल होने की वजह से जिंदगी और मौत के बीच बची जिंदगी की उम्मदों की सांसें गिन रहे थे। लीवर ट्रांसप्लांट ही एक मात्र इलाज बचा हुआ था। मैक्स साकेत में लीवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉक्टर सुभाष गुप्ता की अगुवाई में दोनों मरीजों का इलाज चल रहा था।

एनबीटी की खबर के अनुसार डॉक्टर गुप्ता ने बताया कि लीवर ट्रांसप्लांट के लिए डोनर का ब्लड ग्रुप मरीज से मिलना चाहिए, लेकिन इन दोनों मामले में डोनर का ब्लड ग्रुप मैच नहीं हो रहा था। योगेश शर्मा को उनकी पत्नी अन्नु शर्मा अपना लीवर डोनेट करने को तैयार थीं, लेकिन ब्लड ग्रुप मैच नहीं होने से ट्रांसप्लांट नहीं हो पा रहा था। पिछले छह महीने से वह इंतजार कर रहे थे। इसी तरह हरमिंदर सिंह की भी स्थिति ऐसी ही थी। उनकी पत्नी गुरदीप कौर उन्हें अपना लीवर देने को तैयार थीं, लेकिन उनका भी ब्लड ग्रुप मैच नहीं था।
पिछले तीन महीने से वो भी इंतजार कर रहे थे। दोनों न्यूक्लियर फैमिली में रहते हैं, इसलिए उनके रिश्तेदार भी इसके लिए सामने नहीं आ रहे थे। दोनों की बीमारी बढ़ती जा रही थी। ऐसे में दोनों की पत्नियों ने एक-दूसरे के पतियों के लिए लीवर डोनेट करने का निर्णय लिया। डाॅक्टर गुप्ता ने एक पैनल तैयार किया, जिसमें चार आॅपरेशन थियेटर तैयार किए गए। डोनर और मरीज चारों को एक साथ आॅपरेशन कर लीवर ट्रांसप्लांट कर दिया गया है। अब वो स्वस्थ्य हैं।
कैसे होता है लिवर ट्रांस्प्लांट 
इसकी सामान्य प्रक्रिया यह है कि जिस व्यक्ति को लिवर प्रत्यारोपण की जरूरत होती है उसके परिवार के किसी सदस्य (माता/पिता, पति/पत्नी के अलावा सगे भाई/बहन) द्वारा लिवर डोनेट किया जा सकता है। इसके लिए मरीज के परिजनों को स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन काम करने वाली ट्रांस्प्लांट ऑथराइजेशन कमेटी से अनुमति लेनी पडती है। यह संस्था डोनर के स्वास्थ्य, उसकी पारिवारिक और सामाजिक स्थितियों की गहन छानबीन और उससे जुडे करीबी लोगों से सहमति लेने के बाद ही उसे अंग दान की अनुमति देती है। लिवर के संबंध में सबसे अच्छी बात यह है कि अगर इसे किसी जीवित व्यक्ति के शरीर से काटकर निकाल भी दिया जाए तो समय के साथ यह विकसित होकर अपने सामान्य आकार में वापस लौट आता है। इससे डोनर के स्वास्थ्य पर भी कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। इसके अलावा अगर किसी मृत व्यक्ति के परिवार वाले उसके देहदान की इजाजत दें तो उसके निधन के छह घंटे के भीतर उसके शरीर से लिवर निकाल कर उसका सफल प्रत्यारोपण किया जा सकता है। इसमें मरीज के लिवर के खराब हो चुके हिस्से को सर्जरी द्वारा हटाकर वहां डोनर के शरीर से स्वस्थ लिवर निकालकर स्टिचिंग के जरिये प्रत्यारोपित किया जाता है। इसके लिए बेहद बारीक िकस्म के धागे का इस्तेमाल होता है, जिसे प्रोलिन कहा जाता है। लंबे समय के बाद ये धागे शरीर के भीतर घुल कर नष्ट हो जाते हैं और इनका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। ट्रांस्प्लांट के बाद मरीज का शरीर नए लिवर को स्वीकार नहीं पाता, इसलिए उसे टैक्रोलिनस ग्रुप की दवाएं दी जाती हैं, ताकि मरीज के शरीर के साथ प्रत्यारोपित लिवर अच्छी तरह एडजस्ट कर जाए। सर्जरी के बाद मरीज को साल में एक बार लिवर फंक्शन टेस्ट जरूर करवाना चाहिए।
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दो महिलाओं ने एक-दूसरे के पतियों की जान बचाने के लिए एक्स्चेंज कर लिए लीवर दो महिलाओं ने एक-दूसरे के पतियों की जान बचाने के लिए एक्स्चेंज कर लिए लीवर Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Thursday, April 18, 2019 Rating: 5

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