पौड़ी के नेगी सिख और मुसलमान गावों की कहानी...ना उज्ज्वला का फायदा मिला ना शौचालय का पैसा

वे ठेठ गढ़वाली बोलते हैं और रहन-सहन भी बिल्कुल पहाड़ियों सरीखा. पहाड़ की रीति रिवाजों में ऐसे रच बस गए हैं कि किसी के लिए ये अंदाज़ा लगाना क़त्तई आसान नहीं होगा कि वो सिख हैं या मुसलमान. उत्तराखंड में पौड़ी गढ़वाल में ऐसे ही तक़रीबन आधा दर्जन गांव हैं, जहाँ बहुसंख्यक आबादी सिख या मुसलमान हैं. मुसलमानों का ऐसा ही एक गांव है कोटद्वार से तक़रीबन 30 किलोमीटर दूर. नाम है रामा गांव. गांव मुख्य सड़क से तक़रीबन 150 मीटर नीचे है, लेकिन रास्ता खोज-खोजकर जाना पड़ता है. 'नज़र हटी, दुर्घटना घटी'. गांव में घुसते ही दूसरा घर गांव की प्रधान रज़िया बेगम का है. इससे पहले कि उनसे दुआ-सलाम होती, दरवाज़े पर उनके पिता मोहम्मद सईद अहमद ने हमारा परिचय लिया और फिर बोले, "मैं 74 साल का बूढ़ा हूँ. ये रास्ता ऐसा है कि जे गिर जाए न तो सीधे गदेरे (बरसाती नदी) में पड़ेगा. आपने तो देख लिया, ख़ुदा न करे किसी का..."
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पिपली गांव पौड़ी

उन्होंने कहा, "मेरी तो पैदाइश ही यहाँ की है. भाषण दे रहे हैं न, डिजिटल गांव बना हुआ है. एक लड़की दो साल पहले यहाँ गिरकर मर गई, अभी तक वो रास्ता नहीं बना. मैं दिल्ली जाऊंगा और मोदी जी को दिखाऊंगा कि कितना विकास हुआ है. मेरी लड़की प्रधान है, मैं ज़्यादा नहीं बोल सकता." रज़िया बेगम पांच साल पहले निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में गांव की प्रधान चुनी गई थी. रज़िया बेगम के दो बेटे हैं और दोनों ही कई साल पहले नौकरी करने के लिए दिल्ली चले गए. गांव में लगभग हर परिवार की यही कहानी है. कुछ मकानों पर ताले लटके है, जो यहां से हमेशा के  लिए  पलायन कर गए हैं. रज़िया कहती हैं, "रोज़गार नहीं है, कभी इस गांव में 350 के लगभग मुसलमान परिवार रहते थे, लेकिन अब 250 परिवार ही अपने घरों में रह रहे होंगे. "उज्जवला स्कीम समेत कई सरकारी योजनाओं का लाभ न मिलने को लेकर भी प्रधान समेत गांववालों में ग़ुस्सा है. रज़िया कहती हैं, "उज्जवला में तीन दफ़े 45 लोगों के फ़ॉर्म भरे, लेकिन मिला सिर्फ़ चार को. कनेक्शन भी मुफ्त नहीं है 1617 रुपये की रसीद मिली है. अब हाल ये है कि जिन्हें सिलेंडर नहीं मिला वो हर दूसरे-चौथे रोज़ मुझे खरी-खोटी सुना जाता है और कहता है- अब तू भी तो मोदी वाली हो गई है." प्रधानमंत्री मोदी अक्सर अपने भाषणों में उज्जवला स्कीम की सफलता का ज़िक्र करते हैं और दावा करते हैं कि इस स्कीम से देशभर के एक करोड़ से अधिक परिवारों को फ़ायदा हुआ है. गांव में शौचालय तो ख़ूब बने हैं, लेकिन लोगों की शिकायत है सरकार ने जो 12 हज़ार देने का वादा किया था, वो इक्का-दुक्का लोगों को छोड़कर किसी को नहीं मिला.

अब्दुल रहीम टेलरिंग का काम करते हैं और उनका मकान पिछले साल टूट गया था और अब वो एक छोटे से कमरे में गुज़र-बसर कर रहे हैं. अब्दुल कहते हैं, "मैं झूठ नहीं बोलूंगा, किसान सम्मान निधि का दो हज़ार मुझे मिला है (वो मोबाइल में 11 मार्च को बैंक से आया मैसेज दिखाते हैं), गेहूं-चावल (खाद्य सुरक्षा योजना) भी मिल रहा है, लेकिन शौचालय का पैसा अब तक नहीं मिला. रही मकान की हालत तो वो आप देख ही रहे हो." अब्दुल रहीम, बतुला बेगम, ज़ैबुन्निसा बेगम की भी यही पीड़ा है. गांव में साल 1836 में बनी एक मस्जिद है, पर ये भी नाज़ुक हालत में है.
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प्रधान रज़िया बेगम कहती हैं, "मुझे पता चला है कि धरगांव समेत कई आस-पास के गांवों में मंदिर बनाने के लिए सरकार ने अनुदान दिया है. मस्जिद के बाहरी क्षेत्र (इबादतगाह के लिए अनुदान की इजाज़त नहीं है) की मरम्मत के लिए सरकार हमारी भी मदद कर सकती थी, लेकिन कोई मदद नहीं मिली."गांव का कोई भी व्यक्ति खुलकर तो नहीं कहता, लेकिन इशारों-इशारों में बताता है कि सरकारी योजनाओं को लागू करने में उनके गांव के साथ भेदभाव किया जाता है. अब्दुर्रहीम कहते हैं, "पिछली बार बीजेपी को वोट दिया था कि मोदीजी कुछ करेंगे लेकिन कुछ नहीं हुआ." उत्तराखंड में 11 अप्रैल को लोकसभा की पाँचों सीटों के लिए वोट डाले जाने हैं. पौड़ी लोकसभा सीट से बीजेपी ने पूर्व विधायक तीरथ सिंह रावत को मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता रहे भुवन चंद्र खंडूरी के बेटे मनीष खंडूरी पर दांव लगाया है. मनीष खंडूरी हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए है.

रामा गांव के निवासी सरकार से नाराज़गी को छोड़ दें तो रामा गांव के मुसलमानों को अपने हिंदू पड़ोसियों से कोई शिकवा-शिकायत नहीं है. सईदा बेगम, साइरा बेगम समेत कई महिलाएं एक सुर में कहती हैं, "पूरा भाईचारा है. हम एक-दूसरे के घर आते हैं. चाय-पानी, खाना-पीना साथ होता है. एक-दूसरे के शादी-विवाहों हम जाते हैं. दुख में एक आवाज़ में सब साथ होते हैं."

रामा गांव से तक़रीबन 60 किलोमीटर दूर गढ़वाली सिखों का अनूठा गांव है हलूणी. हलूणी मुख्य सड़क से तक़रीबन दो किलोमीटर दूर है और गांव को जोड़ने के लिए कच्ची सड़क बने हुए भी तीन साल हो गए हैं, लेकिन अभी तक ये पक्की नहीं हुई है. हलूणी में एक गुरुद्वारा है और 90 फ़ीसदी से अधिक सिख धर्म को मानने वाले हैं. इस गांव में लगभग 60 परिवार सिख नेगी हैं, गांव में कुल मिलाकर 85 परिवार हैं. हालाँकि सिख नेगी कहलाने वाले ये लोग न तो पगड़ी पहनते हैं और न ही सिखों के पांच ककार- कंघा, कड़ा, कच्छा, कृपाण और केस का पूरी तरह तरह पालन करते हैं. सेना से रिटायर जगदीश सिंह नेगी कहते हैं, "हमें पूर्वजों से ये पता लगा है कि दयाल सिंह नाम के सरदारजी ने इस गांव को बसाया था. ये हमसे आठ-नौ पीढ़ी पहले की बात रही होगी. गांव में कुछ परिवार ब्राह्मण, ठाकुर और दलितों के भी हैं."जगदीश सिंह नेगी कहते हैं, "पंजाब से हमने गुरु ग्रंथ साहिब मंगवाया. ये हिंदी में है. ग्रंथी भी हैं और सेवादार भी हैं. शादियों में गुरुद्वारे में आते हैं और मत्था टेकते हैं."

नेगी सिखों को अपने सिख धर्म से संबंधित होने पर गर्व तो है, लेकिन इस समुदाय ने कभी उत्तराखंड सरकार के सामने ख़ुद को अल्पसंख्यक दर्जा देने की मांग नहीं की और न ही उत्तराखंड में गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी से जुड़ने का इरादा दिखाया. ख़ैर, बात चुनावों की आई तो सिख नेगी समुदाय ने भी सरकारी योजनाओं के मामले में सब तक़रीबन वहीं गिनाया जो रामा गांव के मुलसमानों ने बताया था. गांव के प्रधान एमएस नेगी बताते हैं, "15-20 लोगों ने उज्जवला स्कीम का फॉर्म भरा था, लेकिन मिला किसी को नहीं. अब अधिकारी कह रहे हैं कि चुनाव ख़त्म होने के बाद ही काम होगा." गांव में तक़रीबन हर परिवार चूल्हे का इस्तेमाल करता है और जिनके पास सिलेंडर है भी वो इसका इस्तेमाल ख़ास लोगों के आने पर ही करते हैं. रीठाखाल के पास के गावं पिपली गाव में भी सिख नेगी रहते हैं.

बीपीएल श्रेणी में आने वाले मनोहर नेगी सिख कहते हैं, "मनरेगा में मेरी पत्नी का जॉब कार्ड है. उसे चार-पाँच महीने में काम मिलता है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के तहत गेहूं-चावल मिलता है. लोन लेकर साल भर पहले शौचालय बनाया, लेकिन अभी तक मुझे सरकार से इसका पैसा नहीं मिला." मनोहर की पत्नी बबीता एक चार फ़ीट ऊंचे घर में चूल्हा फूंक रही हैं. उज्जवला स्कीम की जानकारी उन्हें भी है, लेकिन सिलेंडर नहीं मिला. वो गढ़वाली में कहती हैं, "आप देख ही रहे हैं हाल. चूल्हे में आंखे फोड़ रहे हैं". बबीता की बेटी रितु ने 12वीं की परीक्षा दो साल पहले पास की थी. वो आगे की पढ़ाई रेग्युलर करना चाहती थी, लेकिन इसके लिए पैसा नहीं था. रितु कहती हैं, "मन क्यूँ नहीं करता. मैं भी चाहती हूँ कि अच्छी पढ़ाई करूँ, लेकिन हमारी स्थिति वैसी नहीं है. 23 रुपये महीना फ़ीस से जैसे-तैसे 12वीं तक की पढ़ाई की है. अब आगे प्राइवेट में पढ़ रही हूँ."

साभार...source: bbc.com/hindi

पौड़ी के नेगी सिख और मुसलमान गावों की कहानी...ना उज्ज्वला का फायदा मिला ना शौचालय का पैसा पौड़ी के नेगी सिख और मुसलमान गावों की कहानी...ना उज्ज्वला का फायदा मिला ना शौचालय का पैसा Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Tuesday, April 09, 2019 Rating: 5

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