जनांदोलनों के पुरोधा के साथ एक युग का अवसान

 पहाड़ समाचार
आज बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की जयंती है। बाबा साहेब की जयंति पर बाबा साहेब के जीवन दर्शन को वास्तविक रूप में आत्मसात करने वाले पूर्व सांसद महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिपूर्णानंद पैन्यूली आज हमसे हमेशा के लिए दूर चले गए। उनका पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनकी अंतिम विदाई से पहले सलामी दी गई। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह, पूर्व सीएम रमेश पोखरियाल निशंक, हरबंश कपूर और अन्य लोगों ने उनको श्रद्धांजलि दी। लेकिन, हैरान करने वाली और दुख पहुंचाने वाली बात यह रही कि उनके पार्थिव शरीर को जब अस्पताल की एंबुलेंस से घर लाया गया। उस दौरान ना तो सरकार का कोई प्रतिनिधि मौजूद था और ना कोई प्रशासनिक अधिकारी वहां पहुंचा। और तो और पुलिस के जवानों और तहसीलदार के अलावा कोई आला अधिकारी उनको श्रद्धांजलि देने तक नहीं पहुंचा। यह बात तब और परेशान करती है, जब सूबे का मुखिया वहां आया हो और कोई आला अधिकारी ना पहुंचे। जबकि उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जाना पहले से ही तय था।

परिपूर्णानंद पैन्यूली फिर से शायद ही जन्म लें, लेकिन उन्होंने राजशाही से मुक्ति दिलाने के लिए जो किया, उसके बारे में हर किसी को जानना चाहिए। परिपूर्णानंद पैन्यूली को लोगों ने उत्तराखंड के इतिहास के पन्नों में जरूर पढ़ा होगा, लेकिन वास्तव में लीविंग लीजेंड को जानने का किसी ने प्रयास ही नहीं किया। किताब के दो पन्नों में उनके जीवन दर्शन को जानना और समझना मुश्किल है। उनको जानने के लिए उनके हर एक आंदोलन के बारे में जानना होगा। तभी हम सही मायने में जान पाएंगे कि वो वास्तव में क्या थे। समाज भी कुछ ऐसा ही हो चला है कि किसी के अनंत यात्रा पर जाने के बाद ही उनके व्यक्तित्व को जानने का काम शुरू होता है। 

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के नाम पर आज भले ही लोग दलितों का हितैषी होने का ढौंग कर रहे हों, खुद को दलितों का नेता बताने वालों की भी लंबी कतारें लगी गई हों। लेकिन, दलितों के वास्तविक नेता परिपूर्णानंद पैन्यूली थे। उन्होंने दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलाने के लिए कई बड़े आंदोलन किए। अछूत समझे जाने वाले लोगों को उन्होंने मंदिरों में प्रवेश दिलाया था। दलितों और वंचितों के बच्चों के लिए उन्होंने गांधी जी के दर्शन को बाबा साहेब के दर्शन के साथ घोलकर हरिजन आश्रम स्थापित किया। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर टिहरी के आंदोलन तक उनके नाम अनगिनत आंदोलन हैं। संघर्षों की एक पूरी किताब है। दबे-कुचले लोगों को आगे बढ़ाने के लिए उनके किए कार्यों के कई उदाहरण आज भी मौजूद हैं। उन्होंने अपने जीवन को अपने नाम की तरह परिपूर्ण जिया। यही उनके जीवन की सार्थकता थी। आजीवन कभी किसी पर निर्भर नहीं रहे।
पैन्यूली जी की चार बेटियां हैं। बेटों के लिए बेटियों को मार देने वालों के सामने उनकी बेटियों ने आज एक उदाहरण पेश किया। उनके दामादों ने महसूस ही नहीं होने दिया कि उनका कोई बेटा नहीं है। उनकी बेटियों और दामादों ने अंतिम संस्कार की तैयारियों से लेकर घर पर आने-जाने वाली जिम्मेदारी को बेटों की तरह निभाया। पत्रकार चंद्रशेखर पैन्यूली ने इस बार भी साबित किया कि क्यों उनको सबका प्यार और सम्मान मिलता है। शेखर दिल्ली से उनके अंतिम संस्कार के लिए पहुंचे। देहरादून पहुंचते ही शेखर का फोन आया और हम बसंतविहार पहुंच गए। लेकिन, वहां स्व. पैन्यूली जी के बेटी और दामादों के अलावा दूसरा कोई नहीं था। उसके बाद पार्थिव शरीर आया। हमने जो भी रश्में और जरूरी तैयारियां होती हैं। उनको निपटाया। इसे संयोग ही कहा जाए कि स्व. पैन्यूली जी की अंतिम यात्रा से पहले उनको नये कपड़े पहनाने का सौभाग्य हमें मिला। जन संघर्षों के पुरोधा के हम थोड़े काम आ सके। यह हमारा सौभाग्य है।
...प्रदीप रावत (रवांल्टा)

जनांदोलनों के पुरोधा के साथ एक युग का अवसान जनांदोलनों के पुरोधा के साथ एक युग का अवसान Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, April 14, 2019 Rating: 5

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