आम चुनाव का ऐलान हो चुका है....टिहरी लोकसभा पर रिपोर्ट

...चंद्रशेर पैन्यूली
हमारे पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में पहले चरण में 11 अप्रैल को वोटिंग होगी। आज या कल तक या बमुश्किल 3,4 दिन में सभी पार्टियों के उम्मीदवारों का ऐलान भी हो जायेगा। बहरहाल मैं यहां बात करता हूं टिहरी लोकसभा क्षेत्र की। ये सीट टिहरी जिले की 4 विधानसभाओं, उत्तरकाशी जिले की 3 विधानसभाओं और देहरादून जिले की 7 विधानसभाओं से बनी है। 2009 से पूर्व ये सीट पूरा टिहरी, उत्तराकाशी जिला और ऋषिकेश, डोईवाला, विधानसभा भी इसी में आते थे, लेकिन अब ऋषिकेश, डोईवाला हरिद्वार में तो टिहरी जिले की नरेन्द्रनगर, देवप्रयाग विधानसभा गढ़वाल (पौड़ी) संसदीय सीट में शामिल है। इससे साफ है टिहरी के लोग अब अलग-अलग सांसदों के वोटर बन चुके हैं।

 
 
अब जरा बात करता हूं इस सीट से प्रतिनिधित्व की तो यहां पर सर्वाधिक 8 बार सांसद बनने का रिकॉर्ड बोलांदा बद्री के नाम से मशहूर महाराजा मानवेंद्र शाह के नाम है। इनके अलावा इस सीट पर सबसे पहली सांसद इनकी माता कमलेन्दुमति शाह रही, वर्तमान की यदि बात करें तो 2012 के उपचुनाव के बाद यहां से मानवेंद्र शाह की बहू राज्यलक्ष्मी शाह सांसद है। राजपरिवार ने इस सीट से 13 बार अभी तक चुनाव लड़ा है, जिनमें से 11 बार उन्हें सांसद बनने का अवसर मिला, लेकिन बड़े दुर्भाग्य की बात है कि टिहरी लोकसभा क्षेत्र की आवाज संसद में नहीं के बराबर गूंजी।

राजनीति भी कितने रंग बदलती है। देखिये कितना विरोधाभास है कि जिन टिहरी के राजाओं के अत्याचार, शोषण से टिहरी की जनता ने बेहद कठिन जीवन जिया, इनके शासन को उखाड़ने के लिए बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी। आजादी और टिहरी की आजादी के बाद भी वही राजशाही इस क्षेत्र के प्रतिंनिधि बनकर संसद जाते रहे। ये वही टिहरी है, जहां के अमर बलिदानी श्रीदेव सुमन ने राजशाही के खिलाफ लड़ते लड़ते जेल में 84 दिन की भूख हड़ताल करते हुए अपने प्राण त्याग दिए पर टिहरी के राजशाही को उखाड़ फेंकने के लिए सदैव बड़ा संघर्ष किया। ये वही टिहरी है जहां के विक्टोरिया क्रॉस विजेता गब्बर सिंह नेगी के शौर्य और वीरता को पूरा देश नमन करता है। टिहरी के लोग ये भूल गए कि ये वही राजपरिवार है, जिन्होंने 1930 में तिलाड़ी के कांड में सैकड़ांे बेकसूरों को मरवा दिया था। ये वही राजपरिवार है, जिन्होंने मोलू भरदारी, नागेन्द्र सकलानी को मरवाया। ये वही राजपरिवार है, जिन्होंने कई तरह के टैक्स लगाकर टिहरी के लोगों को खून के आंसू रुलाये थे। मैं ये सब इसलिए बता रहा हूं क्योंकि बीजेपी हो या कांग्रेस, इन्होंने तो राजपरिवार को ही टिकट देकर उन्हें सांसद बनने का मौका दिया।
1971 में परिपूर्णानन्द पैन्यूली ने मानवेंद्र शाह को चुनाव में करारी शिकस्त दी। उस हार से मानवेंद्र शाह इतने भयभीत हुए कि अगले 20 वर्ष तक वो चुनाव ही न लड़े और जब लड़े तो 1991 में पार्टी बदलकर बीजेपी में शामिल होकर लड़े। इससे पूर्व तीन बार मानवेंद्र शाह और एक बार उनकी माता कमलेंदुमति शाह कांग्रेस से लोकसभा पहुंच चुकी थी। 1991के बाद लगातार दिसंबर 2006 अपने आखिरी समय तक मानवेंद्र शाह बीजेपी में बने रहे और साथ ही लगातार सांसद भी बने रहे। न बीजेपी ने उनका टिकट काटा न जनता ने उन्हें हराया। 2007 के उपचुनाव में विजय बहुगुणा ने मनुजयेंद्र शाह को हराकर एक नया इतिहास परिपूर्णानन्द पैन्यूली के बाद राजपरिवार को हराने का लिखा। बहुगुणा 2009 में भी जीते पर तब राजपरिवार नहीं मशहूर निशानेबाज जसपाल राणा बीजेपी से प्रत्याशी थे। टिहरी से 2012 में बहुगुणा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने और सांसदी के उपचुनाव में अबकी बार बीजेपी ने चला राजपरिवार और महिला का दांव। मानवेंद्र शाह की बहू राज्यलक्ष्मी शाह को टिकट दिया और जनता ने भी बहुगुणा के बेटे साकेत के बजाय राज्यलक्ष्मी शाह को संसद में भेजा। फिर 2014 की मोदी लहर में साकेत हारे और राज्यलक्ष्मी जीतकर पुनः लोकसभा पहुंची। लेकिन बड़ा दुर्भाग्य रहा कि सदन में राज्यलक्ष्मी शाह ने टिहरी की समस्याओं को लेकर या पहाड़ को लेकर कोई बात नहीं रखी।

टिहरी बांध विस्थापितों, प्रभावितों की कोई बात उन्हें संसद में रखते हुए नही सूना गया। हां जो डेली रूटीन के काम होंगे, वही उनकी उपलब्धि होगी। उन्हें न तो क्षेत्र में देखा गया न सदन में न ही उनका लगाव पहाड़ों से रहा, न पहाड़ियों से। बस वोट मांगते वक्त ही ये लगाव सुना और देखा गया। उसके बाद वो वास्तविक महारानी की तरह जनता से दूर कहीं पर्दे में ही ओझल रही। हो सकता है इससे पूर्व लोगों के अंदर अधिक जागरूकता न रही हो। जिस कारण लगातार राजपरिवार को मौके मिलते रहे पर 2019 का ये चुनाव पहला ऐसा चुनाव है। जिसका वोटर 21 वीं सदी में ही पैदा हुआ। वो एक नया परिवर्तन देखना चाहता है। बीजेपी को भी अब अपने वोटरों के मन के हिसाब से परिवर्तन कर इस बार टिकट किसी अन्य चेहरे को देना चाहिए न कि राजपरिवार को। राजपरिवार ने टिहरी के विकास में कोई दिलचस्पी नहीं रखी। यही कारण है कि टिहरी आज काफी पिछड़ चुका है। श्रीदेव सुमन समेत अनेकों बलिदानी महापुरुषों के कातिल इस राजपरिवार को अब बीजेपी को भी अलविदा कहना चाहिए। यदि बीजेपी नही चेंज करती है तो जनता को अपने वोट से इन्हें नकार देना चाहिए। हमें सासद चाहिए ऐसा जो संसद में गोबर गणेश न बना रहे। हमें सांसद चाहिए ऐसा जो हमारे दुःख-दर्द को महसूस करता हो, जो पहाड़ और पहाड़ियों के कठिन जीवन के दुःख दर्द को महसूस कर सकें हमे ऐसा सांसद नहीं चाहिए जो एक डोबरा चांठी पुल न बना सके, जो टिहरी के भूगोल को ही न जानता हो। ऐसे सांसद की जरूरत नहीं है, जो जनता के बीच में दिखे ही ना। टिहरी लोकसभा वासियों बीजेपी पर दबाव बनाए और कहें टिहरी से किसी योग्य व्यक्ति को टिकट दे न कि राजपरिवार को। 

अमर बलिदानी श्रीदेव सुमन का बलिदान हम सभी को सदैव याद रखना चाहिए। परिपूर्णानन्द पैन्यूली, त्रेपन सिंह नेगी के संघर्ष को नहीं भूलना चाहिए। टिहरी की जनता को रुलाने वालों को सांसद अब नहीं बनाना होगा ऐसा सभी लोग जरूर विचार करें। क्या कोई नया नेतृत्व हमारे बीच से नही पनप सकता? कोशिश करो जरूर नेतृत्व मिलेगा। देश के 71 साल की आजादी के बाद अब समय है कि टिहरी के राजशाही को नकारने का। क्योंकि जिन्होंने शोषण किया हो ,जिन्होंने जनता को नजरअंदाज किया हो उन्हें सत्ता में रहने का कोई हक नहीं, बीजेपी जरूर टिहरी सीट से कोई नया चेहरा दे, पीएम मोदी के नाम पर राजपरिवार को दुबारा न थोपा जाये, टिहरी की जनता पर। वरना जनता को जनार्दन भी कहा जाता है। वो परिवर्तन करना भी जानती है।

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