चला फुलारी फूलों क, सौदा-सौदा फूल बिरौला

चंद्रशेखर पैन्यूली
भगवान सूर्य नारायण के कुंभ राशि से मीन राशि में प्रवेश करने के साथ ही चैत्र मास की संक्रांति की आपको बहुत बहुत बधाई। चैत्र मास प्रकृति में एक नयी ऊर्जा का संचार करता है। पेड़-पौधों में नए फूल आ रहे होते हैं, नयी हरियाली जन्म ले रही होती है, ठंड का मौसम लगभग खत्म हो चुका होता है। सभी जीव-जंतुओ में एक नई खुशी और ऊर्जा का संचार होता है। चैत्र मास से ही हिन्दू नववर्ष, विक्रमी संवत भी शुरू होता है, जो कि मातारानी के नवरात्रि के साथ शुरू होता है। उत्तराखंड में चैत्र मास का विशेष महत्व है। आज से ही फूलदेई का त्यौहार भी शुरू होता है। छोटी-छोटी बालिकाएं, बच्चे सुबह-सुबह घरों की चैखट पर ताजे फूल लेकर, फूलों से हर दरवाजे को सजातें हैं। जससे उनको सम्मान के रूप में लोग दाल, चावल और नकदी में दक्षिणा देकर उनका उत्साहवर्धन करते हैं। फूलदेई उत्तराखंड के पहाडों में खुशहाली के प्रतीक का त्यौहार है, जो आज से यानि चैत्र संक्रांति से शुरू होता है।


फूलदेई पर्व इसलिए मनाया जाता है, क्यूंकि इस पर्व के बारे में यह कहा जाता है कि एक राजकुमारी का विवाह दूर काले पहाड़ के पार हुआ था, जहां उसे अपने मायके की याद सताती रहती थी। वह अपनी सास से मायके भेजने और अपने परिवार वालों से मिलने की प्रार्थना करती थी, किंतु उसकी सास उसे उसके मायके नहीं जाने देती थी। मायके की याद में तड़पती राजकुमारी एक दिन मर जाती है और उसके ससुराल वाले राजकुमारी को उसके मायके के पास ही दफना देते हैं। कुछ दिनों के बाद एक आश्चर्यजनक तरीके से जिस स्थान पर राजकुमारी को दफनाया था। उसी स्थान पर एक खूबसूरत पीले रंग का सुंदर फूल खिलता है और उस फूल को “फ्योंली” नाम दे दिया जाता है। उसीकी याद में पहाड़ में “फूलों का त्यौहार यानी कि फूलदेई पर्व” मनाया जाता है और तब से “फुलदेई पर्व” उत्तराखंड की परंपरा में प्रचलित है।

चैत्र मास में एक पुरानी परंपरा भी पहाडों के गांवो में शुरू होती है, जो अब लगभग विलुप्ति की कगार पर है। लगमानी में विवाहित लड़कियों (ध्याणियों) के घरों में  उनके मायके के (औजी) ढोलवादक जाकर, मायके की खुश खबरी देकर ध्याणी को खुश खबरी देते हैं। साथ ही ढोल-दमाऊ से खुशहाली के गीत गाकर उसके परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। जिससे खुश होकर अपने मायके के औजियों को ध्यांण और उसके ससुराल वाले सम्मान सहित विदा करते हैं। आज से चैत्र महीना शुरू हो गया है। शादीशुदा महिलाओं को अपने मायके की याद अधिक आती है। प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने इस बारे में एक भावनात्मक गीत भी लिखा है। घुघुती घुरण लैगी मेरा मैत की, बौड़ि-बौड़ि ऐगे ऋतु-ऋतू चैत की, मतलब स्प्ष्ट है की चैैत्र के महीने से सभी को विशेष लगाव है। फूलदेई का त्यौहार जहां हमें प्रकृति के विभिन्न रंगों के साथ खुशहाली का संदेश देता है। वहीं, शादी शुदा महिला की मायके के प्रति अपनी यादंे भी ताजा होती है। 

गढ़वाल विवि श्रीनगर में अध्ययन के दौरान साथी पत्रकार पंकज मैंदोली, दीवान सिंह, मनोज सुन्दरियाल मन्नी, राजन, दीपक आदि ने एक बार इस फूलदेई को विवि में मनाने का फैसला किया था। इसमें पत्रकारिता जनसंचार केंद्र के कुछ छात्र-छात्राओं की सराहनीय भूमिका रही। हमारे इस कार्यक्रम का श्रेय पंकज मैंदोला को निर्विवाद रूप से देना सही रहेगा। चैरास कैंपस के तब के निदेशक प्रो. एसडी काला ने सराहना की थी। केंद्र निदेशक प्रो. एआर डंगवाल, डा. विक्रम वर्तवाल, डा. मनोज सुन्द्रियाल, डा. दिनेश भट्ट, डा. वन्दना नौटियाल आदि शिक्षकों ने भी इसके लिए हमारा प्रोत्साहन और मार्गदर्शन किया था। श्रीनगर में ही कई अन्य सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग इस पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। हमे तब श्रीनगर के कई लोगों के साथ इस फूलदेई कार्यक्रम में सहभागिता करने का सुअवसर मिला। विवि के वरिष्ठ सेवानिवर्त प्रो. डीआर पुरोहित, डा. राकेश भट्ट, डा. संजय पांडेय, दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार डा. उमाशंकर थपलियाल, डा. थपलियाल होली के गीतों और होली मिलन के विशेषज्ञ है। दुःखद यह है कि कि वो अब इस दुनिया में नही हंै। गंगा असनोड़ा, अनूप बहुगुणा, गणेश भट्ट, गिरीश पैन्यूली और दिवंगत भवानी शंकर थपलियाल आदि अनेक लोगों के मार्गदर्शन में हमें फूलदेई कार्यक्रम को हर्षोलास के साथ मनाने का सौभाग्य मिला। 

मान्यता है कि चैत्र के महीने में बसंत ऋतु के आगमन पर रंग-बिरंगे फूलों को देखकर पहाड़ो में आछरी (देवपरियां) भी दिखाई देती हैं। श्रीनगर के ही अमित सागर ने चैता की चैतवाल्या इसी थीम को लेकर गाना गाया है। गढ़वाल विवि के ही छात्रों के ग्रुप पांडवाज, डोभाल बन्धुओं ने भी इसी फूलदेई पर शानदार वीडियो भी बनाया, जो काफी लोकप्रिय हुआ। इस वर्ष भी यह त्यौहार हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। कई जगह आज तो कई जगह कल से फूलदेई शुरू होगी। इस वर्ष देहरादून के राजभवन और मुख्यमंत्री आवास में वरिष्ठ पत्रकार शशिभूषण मैठाणी की टीम फूल डालकर इस लोकपर्व को धूमधाम से मनाएगी। आज पहाड़ो में बड़ी तेजी से पलायन हो रहा है। हमारे पलायन कर चुके लोगों के घरों में ताले लटके हुए हैं।  

पहाड़ो में फूलदेई भी विलुप्त की कगार पर खड़ा है। बढ़ते पलायन के कारण इसको मनाने वाले बच्चे गंव में बहुत कम हैं। मैं अपने उत्तराखंडी, पहाड़ी भाई बहनों से निवेदन करता हूं कि आप जहां भी रहें, अपने तीज-त्यौहारों को ना भूलें। अपने बच्चों को अपने रीति-रिवाजों, अपनी संस्कृति से सदैव रू-ब-रू करवाएं। भगवान बदरी-केदार, मां भगवती की कृपा हम सभी पर बनी रहे। सभी के घरों में उमंग, खुशहाली और प्रसन्नता का भाव बना रहे। आपको प्रकृति के इस खूबसूरत महीने की बधाई। माता शीतला आपके तन-मन को शीतल बनाये रखें। प्रकृति का आशीर्वाद हम सभी को अविरल रूप से मिलता रहे। साथ ही आपसे अपने तीज-त्योहारों और मान्यताओं को न भूलने की भी गुजारिश भी है।
चला फुलारी फूलों क, सौदा-सौदा फूल बिरौला चला फुलारी फूलों क, सौदा-सौदा फूल बिरौला Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Thursday, March 14, 2019 Rating: 5

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