पता करो आपके खाली घर पर किसीका कब्जा तो नहीं...?

पुलवामा के शहीदों को सलाम...जय हिन्द...। पता नहीं सरकार कुछ करेगी भी या नहीं। सेना को खुली छूट दी है या नहीं इसका सच्चाई भी वक्त आने पर पता चल पाएगी। सेना को खुली छूट की बात सरकार ने पहले भी कही थी, लेकिन हुआ क्या...? सेना के हाथ बंधे रहे। आलम ये है कि हर सैनिक को आज भी गोलियों का हिसाब देना पड़ता है। गोलियों का हिसाब मांगना बंद कर दीजिए। बहरहाल, अब उत्तराखंड की बात कर लेते हैं। हमारा ये राज्य भी कश्मीर बनता जा रहा है। राजधानी देहरादून आतंकियों का सबसे सरल और आसान ठिकाना बना है। कश्मीरी छात्रों के रूप में तीन-चार आतंकी प्रामाणिकता पर साबित हो चुके हैं। कई यहां खुले घूम रहे हैं। हम अपने राज्य में आतंकियों को पनाह दे रहे हैं। ये तो रही एक बात। दूसरी बात पलायन से जुड़ी है, जो सबसे गंभीर और चिंता की बात भी है। 

दरअसल, पहाड़ के जो घर खाली पड़े हैं। उन घरों पर अब कब्जा होने लगा है। पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक लघु फिल्म काफी वायरल हुई थी। उसमें नेपाली को प्रधान बना दिखाया गया था। किसी हद तक बात सही भी थी, लेकिन पहाड़ से अब नेपाली भी पलायन कर चुके हैं। नेपालियों की जगह बाहरी मजदूर व उत्तर प्रदेश और दूसरी जगहों से आए मुस्लिम लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। गांव के छोटे-छोटे कस्बों और बाजारों में मुस्लिमों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। किसी छोटे से बाजार में 20-30 नाई की दुकानें आसानी से मिल जाएंगी। पहले इनकी संख्या बहुत कम होती थी।

रेहड़ी/ठेली लगाने वाले भी यही लोग मिलेंगे। इसके अलावा लोहे का काम और कबाड़ी का काम करने वाले भी पहाड़ों में तेजी से बढ़ रहे हैं। नतीजा ये हो रहा है कि पहाड़ में अपराधों को ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। लोग खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। इस असुरक्षा के भाव को सरकार को समझना चाहिए। सोई हुई सुरक्षा एजेंसियों को जागने की जरूरत है। वरना बहुत देर हो जाएगी। पौड़ी के खाली पड़े घरों में कश्मीर से चिरान करने आने वाले और मजदूरी करने आने वाले बाहरी लोग छह महीने से लेकर सालभर तक रहकर चले जा रहे हैं और किसी को कानों-कान खबर भी नहीं लगती। 


एक ट्रेंड और बढ़ रहा है, वो है मजदूरी। हमारे लोग पहाड़ छोड़कर मैदान में वर्तन धोने को तैयार हैं, लेकिन पहाड़ में रहकर अपना काम करने को तैयार नहीं हैं। मेहनत और मजदूरी करने हमें शर्म लगने लगी है। जिसका लाभ बाहर वाले उठा रहे हैं। देहरादू से लेकर पहाड़ तक के चैहारों पर बाहर से आये मजदूर और कारीगर अपनी दुकान सजाए नजर आते हैं। आज 500 रुपये से कम में कोई मजदूरी करने को तैयार नहीं है। त्योहारों पर सरकार का उनको पूरा समर्थन भी मिलता है। होता क्या है कि मजदूरी करने यहां आया हुआ बाहरी व्यक्ति एक साल के बाद ठेकेदर बन जाता है। संपत्ति जुटा लेता है। कल तक मजदूरी करने वाला, कुछ दिनों बाद 12 से लेकर 17 रूपये प्रजति स्क्वायर फुट के हिसाब से काम करने की बात करने लगता है। उसे पूछने वाला कोई नहीं है। अगर गंभीरता से जांच की जाएगी तो सच्चाई सामने होगी और चैंकाने वाली होगी। 

दूसरा ट्रेंड और खतरनाक है। असल में पिछले पांच-सात सालों में पहाड़ी हिस्सों में जहां मुस्लिम लोग पहले से थे, लेकिन कम थे। उनका लोगों के साथ अच्छे से उठना-बैठना भी था। कुछ लोगों का आज भी है और शायद आगे भी रहेगा, लेकिन ज्यादात्तर लोग कटरता की ओर बढ़ चले हैं। हमारे आस-पास और साथ के ही कुछ लोग ऐसे थे, जो पहले हमारी तरह ही सामान्य ढंग से रहते थे, लेकिन अब अचानक से जींस पैंट पहनने वाला हमारे साथ का वो लड़का मौलवी नहीं होने के बावजूद चौड़ी मोरी वाला और छोटा सलवार पहनने लगा है। उसको पहले दाढ़ी पसंद नहीं थी, लेकिन अब वो दढ़ी इस्लाम की शान बताता है। बाजार में किसी मुस्लिम महिला का बुर्का नजर नहीं आता था। आज बगैर बुर्का पहने कोई घर से नहीं निकलता। जबकि ये वही लोग हैं, जिनको हमने बचपन से बड़ा होते देखा और हमारे साथ रहते देखा है। आखिर ये बदलाव क्यों हो रहा है। जिन शहरों में मस्जिदें नहीं थी। कुछ जगहों पर बन गई। कुछ जगहों पर बनाने की तैयारी है। आखिर क्यों...? क्या कोई इनको रोकने वाला नहीं है।

ये किसी सरकार की गलती नहीं है। सरकार तो सरकार है। उसे सरकार होने से ही मतलब है। आप और हम उसके लिए केवल वोट हैं। हमारी और आपकी कमी है। पहाड़ आएं और अपने घरों को देखें, कहीं उसमें किसी ने कब्जा तो नहीं कर रखा है। कहीं आपका घर किसी और का तो नहीं हो गया। अगर अभी नहीं जागे, तो फिर जागने का मौका नहीं मिलेगा। आपका घर आपका नहीं रहेगा और आप कुछ नहीं कर पाएंगे। दरअसल, कश्मीर में भी यही हुआ था। पहले-पहले मुस्लिम लोग बाहर से मजदूरी करने ही आए और धीरे-धीरे कश्मीर की आजादी के नाम पर जेहाद के नाम पर कश्मीरी हिन्दुओं के घरों और संपत्ति पर कब्जा कर लिया। मंदिर को मस्जिद में तब्दील कर दिया। समाधियों को मजारों में बदल दिया गया। हमारे राज्य में भी ऐसा ही हो रहा है। जागिए...इस उत्तराखंड को कश्मीर मत बनने दीजिए...।
                                                                                                                                                                                                                                                                      ...प्रदीप रावत (रवांल्टा)

पता करो आपके खाली घर पर किसीका कब्जा तो नहीं...?  पता करो आपके खाली घर पर किसीका कब्जा तो नहीं...? Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, February 17, 2019 Rating: 5

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