देवेन मेवाड़ी जी का शानदार ब्लॉग...पक्षियों का शीत स्नान

ब्लॉग...
अभी-अभी खूब चहक कर बालकनी में दो बुलबुलें शीत स्नान करके गई हैं। ह्वाइट आई यानी बबूनाएं अपनी बारी का इंतजार कर रही थीं। बुलबुलों के जाने के बाद अब वे भी एक-एक करके स्नान कर रही हैं। सामने अमलतास की शाखों और पत्तियों में न जाने कहां छिपी रहती हैं ये नन्हीं वासंती बबूनाएं। बुलबुलें तो नहाने से पहले लगातार इतना तेज चहक रही थीं कि लगा वे भी अपनी भाषा में हमारी तरह ‘गंगे च यमुने, चैव गोदावरी, सरस्वती, नर्मदे, सिंधु, कावेरी!’ गुनगुना रही हों। लेकिन, क्या करें, खग ही जाने खग की भाषा! अगर हम उनकी भाषा समझते तो उन्हें बताते कि प्यारे पंछियो, हम नहाते समय अपने देश की सदानीरा नदियों को नमन करते हैं। क्या कंक्रीट के इस शहर में तुम्हें भी नदियां याद आती हैं? और, लगे हाथ यह भी बता देते कि जैसे हमारे पुरखे वानर कपि थे, वैसे ही तुम्हारे पुरखे डाइनोसॉर थे। 

स्नान के लिए एक-एक करके आती नन्हीं, पीली बबूनाएं शीत ऋतु में भी हमारी बालकनी में वसंत ले आती हैं। कहीं पत्तियों की ओट से शायद टेलर बर्ड यानी हमारी दर्जिन भी उन्हें देखती रहती है। उनके जाते ही पूंछ की लांग हिलाती दर्ज़िन भी आकर दो-एक हलकी डुबकियां मार लेती है। लेकिन, अपने शाही स्नान के समय मैनाओं को किसी और की दखलंदाजी बिल्कुल पसंद नहीं है। इसलिए बुलबुलों का जोड़ा थोड़ी दूर से उन्हें स्नान करते हुए देखता रहता है। मिट्टी की ट्रे का स्नानागार खाली होते ही वहां आकर दो-चार डुबकियां मार लेती हैं। आते तो जंगल बैबलर यानी सतभैय्या भी हैं। वे भी एक भाई को चौकीदारी पर बैठा कर अपनी भाषा में लगातार ‘पैक-कैक’ बोलते हुए बारी-बारी स्नान कर लेते हैं। फिर वह भाई भी नहा-धो लेता है। हरी डालियों के बीच छिपा बैठा शर्मीला बसंता भी हम आदमियों की नज़र से बच कर चुपचाप स्नान करता है। उस पर एक दिन यों ही नज़र पड़ गई तो वह नज़र चुरा कर डालियों की हरियाली में जाकर छिप गया और बोलने लगा- कुटरू-कुटरू! आसपास के काक दम्पतियों को अपनी बालकनी में काक-स्नान करते तो नहीं देखा लेकिन वे बारिश की फुहार में पेड़ों के ऊपर बैठ कर खूब नहाते हैं। हमारा मिट्टी की ट्रे का स्नानागार उनके लिए छोटा पड़ता है। इसमें तो वे बस कभी-कभी सूखी रोटी वगैरह के टुकड़े भिगोने आते हैं और खूब जानते हैं कि वह टुकड़ा कितनी देर में खाने लायक हो जाएगा। 
मगर बालकनी के आसपास के निवासी पारावतों यानी कबूतरों को इन बाकी पंछियों का यहां आकर स्नान करना बिल्कुल पसंद नहीं है। वे इन्हें देखते ही गला फुला कर, गुटरगूं-गुटरगूं की आवाज में इन्हें वहां से खदेड़ देते हैं। फिर भी मैनाएं, बुलबुलें, बबूनाएं और सतभय्ये उन्हें चकमा देकर स्नान कर ही लेते हैं। स्नान के शौकीन ये सभी पंछी स्नान करने के दौरान और उसके बाद भी खूब पंख फड़फड़ाते हैं। फिर खुली हवा और धूप में बैठ कर चोंच से पंख संवारते हैं। 
कड़ाके की सर्दी में भी आखिर क्यों नहाते हैं ये पंछी? शरीर को जमा देने वाला ठंडा पानी, फिर भी ये उसमें डुबकियां लगाती हैं। क्या है यह- इनका शौक या मजबूरी?
मजबूरी ही कह सकते हैं क्योंकि अगर पंछी नहाएं नहीं तो उनका जीवन खतरे में पड़ सकता है। हमारी तरह उनके पास अपने बचाव के लिए कोई हथियार तो हैं नहीं, दुश्मन से बचने का उनके पास एक ही रास्ता है- फुर्ती से उड़कर भाग जाना। और, भागने के लिए उड़ना जरूरी है। फुर्ती से वे तब उड़ पाएंगे, जब उनके पंख साथ देंगे। पंख साथ तब देते हैं, जब वे साफ-सुथरे हों, चिपचिपे न हों और बेतरतीब भी न हों यानी उनके नन्हे-नन्हे जिप अच्छी तरह बंद हों। समझे आप? कभी ज़मीन पर गिरा कोई पंख उठा कर देखिए। उसके बीच में एक शॉफ्ट होती है। उससे बारीक शाखाएं निकलती हैं। वे बारीक शाखाएं बहुत पतली ज़िप से कसी रहती हैं। उस पर हाथ फेरिए तो जिप खुल जाती है। ऐसा होने पर पंख बेतरतीब हो जाता है। पंख अगर करीने से संवारे न गए तो पक्षी फुर्ती से उड़ नहीं सकते और तब शिकारी उन्हें दबोच सकता है। तेल से पंख चिपचिपे हो जाएं, तब भी वे नहीं उड़ सकते। समुद्रों में जहां तेल फैल जाता है, वह समुद्री पक्षियों के लिए जानलेवा साबित होता है।  
इसलिए जरूरी है कि पंख साफ और संवारे हुए हों। उन पर तेल वगैरह का चिपचिपापन न रहे। स्नान करने से पंखों और चमड़ी की सफाई हो जाती है। धूल, गंदगी निकल जाती है और चमड़ी पर चिपके हुए परजीवी भी बाहर आ जाते हैं। नहाने के बाद पक्षी अपनी चोंच से पंखों को अच्छी तरह संवार लेते हैं। सर्दियों में गंदगी और चिपचिपापन अधिक होता है, इसलिए कड़ाके की सर्दी में भी पक्षियों के लिए स्नान करना जरूरी है। यह उनके जीवन-मरण का प्रश्न होता है। 
कभी गौर से किसी पक्षी को नहाते हुए देखिए। नहाने की उनकी अपनी-अपनी अदाएं होती हैं। जिन पंछियों के पैर मजबूत होते हैं, वे उथले पानी या ट्रे आदि में खड़े होकर डुबकी मारते हैं और फिर पंख झाड़ लेते हैं। ऐसी दो-चार डुबकियां लगाते हैं ताकि सारे पंख और उनके भीतर चमड़ी भीग जाए। कुछ पक्षी तालाब में तैरते समय डुबकी लगा कर पंख फटफटा लेते हैं। कुछ पक्षी पहले सिर की ओर से पानी में शरीर को डुबाते हैं और फिर सिर और गर्दन को पीछे की ओर मोड़ कर, पूंछ के पंखों को ऊपर उठाते हैं। इस तरह शरीर नाव की तरह हो जाता है। अगले पंखों और सिर का पानी पीठ को भिगो देता है। स्विफ्ट या स्वालो यानी अबाबीलें ज्यादातर उड़ती रहती हैं। वे नदी-तालाब के पानी में उड़ते हुए ही तेजी से डुबकी मार कर उड़न-स्नान कर लेती हैं। 
उड़न-स्नान से याद आया, पक्षी तीन तरह का स्नान करते हैं: जल-स्नान, धूल स्नान और धूप स्नान! धूल स्नान से भी फालतू तेल का चिपचिपापन हट जाता है और पंख तथा चमड़ी साफ हो जाती है। धूप-स्नान में धूप की गर्मी से परजीवी जूं वगैरह चमड़ी से बाहर निकल आते हैं। पंख फड़फड़ाने से वे बाहर गिर जाते हैं। 
तो, यों ही नहीं करते पक्षी शीत-स्नान, इससे उनके जीवन की रक्षा होती है। कंक्रीट के जंगलों में हरियाली भी नहीं, पेड़ों के रैन बसेरे भी नहीं और न पोखर-तालाब। पक्षी नहाएं तो कहां नहाएं। न नहाने के कारण उनके पंख चिपचिपे और बेतरतीब हो जाते हैं और वे आसानी से दुश्मनों का शिकार हो जाते हैं। शहरों में पक्षियों की संख्या घटने का एक कारण यह भी है। इसलिए, पक्षियों को पीने और नहाने के लिए पानी दीजिए। तभी हमारे आसपास पक्षी चहचहाएंगे और मधुर गीत गाएंगे।

                    (देवेंद्र मेवाड़ी जी की फेसबुक वाल से साभार, मेवाड़ी जी देश-दुनिया के मशहूर विज्ञान कहानी लेखक हैं)
देवेन मेवाड़ी जी का शानदार ब्लॉग...पक्षियों का शीत स्नान देवेन मेवाड़ी जी का शानदार ब्लॉग...पक्षियों का शीत स्नान Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, February 10, 2019 Rating: 5

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