बालिकाओं को घर-घर जाकर स्कूल तक पहुंचाते हैं शिक्षक संतोष नेगी...स्कूल आने के लिए भेंट कर रहे साईकिल

कोटद्वार...    
    कल अंतराष्ट्रीय बालिका दिवस है। ये दिन बालिकाओं का है। सेमिनार हो या फिर बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ का नारा। और भी कई तरह के नारे लगते रहेते हैं, पर बातें और दावे अक्सर हवाई होते हैं। कम ही लोग होते हैं, जो धरातल पर काम करते हैं। कुछ ऐसा ही काम कोटद्वार के शिक्षक संतोष नेगी कर रहे हैं। सतोष नेगी दिव्यांग हैं। लेकिन, उनकी सोच और सपने दिव्य हैं। उनके कामों की धमक दिल्ली तक सुनी जा चुकी है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मन की बात कार्यक्रम में उनकी तारीफ कर चुके हैं। संतोष नेगी के नाम कई पुरस्कार दर्ज हैं। कई स्ट्रीय में डिग्री हासिल कर चुके हैं। उन्होंने कभी अपनी दिव्यांगता को लाचारी और मजबूरी नहीं बनने दिया। उन्होंने अपनी दिव्यांगता को दिव्य बनाया और खुद के लिए कामयाबी की भव्य इमारत खड़ी कर डाली। संतोष नेगी ने बालिका दिवस पर बालिकाओं को साइकिल भेंट की है। अब तक क्षेत्र की जरूरतमंद बालिकाओं को डेढ़ लाख से ज्यादा कीमत की साइकिलें भेंट कर चुके हैं...। 

श्रेष्ठ विज्ञान शिक्षक का अवार्ड हासिल कर चुके संतोष नेगी को श्रेष्ठ दिव्यांग कर्मी अवार्ड से भी राज्य सरकार से नवाजा जा चुका है। संतोष नेगी सत्र शुरू होने के बाद अलग-अलग स्कूलों में संपर्क करते हैं, ताकि बच्चे उनके स्कूल में पढ़ने को प्रेरित हो सकें। इस दौरान जरूरतमंद बालिकाओं को पढ़ाई ना छोड़ने को प्रेरित करते हैं। साथ ही उनसे वादा भी करते हैं कि वे उनकी फीस, ड्रेस, जूते, बैग, कॉपी और किताबों का खर्च भी वहन करेंगे। बालिकाओं को स्कूल आने में किराए की दिक्कतें ना हों, इसके लिए साइकिल देने का आइडिया आया। कुछ बालिकाओं के लिए तीन ऑटो का इंतजाम भी कर दिया। 

2017 में नवरात्रों में किया शुभारंभ

संतोष नेगी अपने विद्यालय की एक मेधावी और जरूरतमंद बालिका मीरा को दुर्गा अष्टमी के दिन एक बढ़िया उच्च गुणवत्ता की साइकिल खरीद कर प्रदान की, जिससे उसके स्कूल आने-जाने और घर के काम करने में सहुलियत हो। इसके बाद लोगों के साथ ही विभिन्न माध्यमों के जरिये अपील की। सिलसिला जारी है और आगे भी चलता रहेगा। संतोष नेगी उन्हीं दानदाताओं के जरिये साइकिल दिलवाते हैं, जो साइकिल भेंट करते हैं। 


National Girl-Child Day
राष्ट्रीय बालिका दिवस (National Girl-Child Day) 24 जनवरी को मनाया जाता है। 24 जनवरी के दिन इंदिरा गांधी को नारी शक्ति के रूप में याद किया जाता है। इस दिन इंदिरा गांधी पहली बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठी थीं। इसलिए इस दिन को राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। आज की बालिका जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ रही है चाहे वो क्षेत्र खेल हो या राजनीति, घर हो या उद्योग। राष्ट्रमण्डल खेलों के गोल्ड मैडल हो या मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति के पद पर आसीन होकर देश सेवा करने का काम हो सभी क्षेत्रों में लड़कियां  समान रूप से भागीदारी ले रही हैं।

  
मनाने का कारण
आज बालिका हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है लेकिन आज भी वह अनेक कुरीतियों का शिकार हैं। ये कुरीतियों उसके आगे बढ़ने में बाधाएँ उत्पन्न करती है। पढ़े-लिखे लोग और जागरूक समाज भी इस समस्या से अछूता नहीं है। आज हज़ारों लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है या जन्म लेते ही लावारिस छोड़ दिया जाता है। आज भी समाज में कई घर ऐसे हैं, जहाँ बेटियों को बेटों की तरह अच्छा खाना और अच्छी शिक्षा नहीं दी जा रही है। भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5 प्रतिशत (क़रीब आधी) औरतें ऐसी हैं, जिनकी शादियाँ 18 साल के पहले हुईं हैं। इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22 प्रतिशत (क़रीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं, जो 18 साल के पहले माँ बनी हैं। इन कम उम्र की लड़कियों से 73 प्रतिशत (सबसे ज़्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं। इन बच्चों में 67 प्रतिशत (दो-तिहाई) कुपोषण के शिकार हैं। कन्या भ्रूण हत्या की वजह से लड़कियों के अनुपात में काफ़ी कमी आयी है। पूरे देश में लिंगानुपात 933:1000 है।

वृद्धि दर में गिरावट
1991 की जनगणना से 2001 की जनगणना तक, हिन्दू और मुसलमानों दोनों की ही जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आई है। 2001 की जनगणना का यह तथ्य सबसे ज़्यादा हैरान करता है कि 0 से 6 साल के बच्चों के लिंग अनुपात में भी भारी गिरावट आई है। यहाँ कुल लिंग अनुपात में 8 के अंतर के मुक़ाबले बच्चों के लिंग अनुपात में अब 24 का अंतर दर्ज है। यह उनके स्वास्थ्य और जीवन-स्तर में गिरावट का अनुपात भी है। यह अंतर भयावह भविष्य की ओर भी इशारा करता है। एशिया महाद्वीप में भारत की महिला साक्षरता दर सबसे कम है। गौरतलब है कि ‘नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रंस राइट्स’ यानी एनसीपीसीआर की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में 6 से 14 साल तक की ज़्यादातर लड़कियों को हर दिन औसतन 8 घंटे से भी ज़्यादा समय केवल अपने घर के छोटे बच्चों को संभालने में बिताना पड़ता है। इसी तरह, सरकारी आँकड़ों में दर्शाया गया है कि 6 से 10 साल की जहां 25 प्रतिशत लड़कियों को स्कूल छोड़ना पड़ता है, वहीं 10 से 13 साल की 50 प्रतिशत (ठीक दोगुनी) से भी ज़्यादा लड़कियों को स्कूल छोड़ना पड़ता है। 2008 के एक सरकारी सर्वेक्षण में 42 प्रतिशत लड़कियों ने यह बताया कि वे स्कूल इसलिए छोड़ देती हैं, क्योंकि उनके माता-पिता उन्हें घर संभालने और अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने को कहते हैं। लोगों को इसके दुष्परिणामों के प्रति आगाह करने और लड़कियों को बचाने के लिए 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है।






बालिकाओं को घर-घर जाकर स्कूल तक पहुंचाते हैं शिक्षक संतोष नेगी...स्कूल आने के लिए भेंट कर रहे साईकिल बालिकाओं को घर-घर जाकर स्कूल तक पहुंचाते हैं शिक्षक संतोष नेगी...स्कूल आने के लिए भेंट कर रहे साईकिल Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Wednesday, January 23, 2019 Rating: 5

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