जिन्दगी जीने का नजरिया : बेसन के लच्छे और शांति

...बेसन के लच्छे जितने उलझे होते हैं उससे भी ज्यादा उलझी है शांति कश्यप की कहानी, लेकिन उसने जिंदगी में आए मुसीबतों के पहाड़ को ऐसे ही तोड़ दिए जैसे कोई बेसन के लच्छेदार लछों को मुट्ठी में लेकर उसका चुरा बना देता है। फिर पहले से ही नमक मिर्च मिले लछों में थोड़ा और मसाला ऊपर से नींबू का रस निचोड़ कर हरा धनिया पत्ती, बारीक कटा प्याज और हरी मिर्च डालकर उसका स्वाद लिया जाता है। मानो जुबां पर बिना घी-तेल के स्वाद का तड़का लगा दिया हो। शांति भी कुछ इसी तरह सबकुछ भूलकर उलझी-उलझी सी जिंदगी को अपनी मेहनत से सुलझाकर खट्टा-मीठा स्वाद ले रही है।


65 वर्ष की शांति की 40 साल पुरानी कहानी गुंथी है बेशन के इन लछों मे। पति गणेश लाल की मौत के बाद बेशन के इन्हीं लछों ने शांति को तीन बच्चों की परवरिश और जीने का हौसला दिया। तब बच्चे छोटे थे, रोजगार का कोई जरिया नहीं था।  पति गणेश लाल विरासत में शांति को बेसन के लच्छे दे गए। दोनों बेटियां बीए तक पढ़ी, लेकिन बेटे ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी। हल्द्वानी के रामलीला मैदान में होने वाले मेले, नुमाइश, रामलीला और किसी भी तरह के उत्सव आयोजन में शांति मैदान के कोने पर अपना ठेला लगाकर बेसन के लच्छे बेचती है।

मैं और कुछ खरीदूं या ना खरीदूं, लेकिन शांति से लच्छे खरीद कर जरूर खाता हूं, क्योंकि इस प्रोडक्ट में मुनाफे की मिलावट नहीं, विपरीत परिस्थितियों में भी जीने का जज्बा और शांति कश्यप का हौसला मिला है। शहर में और भी कई लोग हैं जो बेसन के लच्छे बेचते हैं। ऐसे लोगों को थोड़ा मदद देकर उनके उत्पादों को और बेहतर बनाया जा सकता है। जिससे बाजार में बड़ी मल्टी नेशनल कंपनियों के पैकेट और डिब्बा बन्द उत्पादों के बीच हमारे देशी उत्पाद अपनी जगह बना सके।
                                                                                 ...सतेंद्र डंडरियाल 
जिन्दगी जीने का नजरिया : बेसन के लच्छे और शांति जिन्दगी जीने का नजरिया : बेसन के लच्छे और शांति Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, January 06, 2019 Rating: 5

No comments:

Powered by Blogger.