जिंदगी के रंग बगड़ में...

मनोज लोहनी
...सीधे बागेश्वर से 
    बहुत सालों बाद इस बार बागेश्वर उत्तरायणी मेले में जाने का अवसर मिला सीढ़ी से नीचे उतरते ही बगड़ में राजनीतिक दलों के आमने-सामने लगे मंचों में आवाजों का काकटेल भी सामने था.। कांग्रेस के ठीक सामने भाजपा, पीछे उक्रांद और फिर पीछे बसपा। भाषण उगल रहे सारे दलों के लाउड-स्पीकर। शर्त यह कि जिस दल का भाषण सुनना है तो फिर उसका ही होना होगा, मतलब उसी पंडाल के सामने खड़ा होना या बैठना होगा, क्योंकि इधर-उधर फिर वही माइकों का शोर और आवाजों का काकटेल..। इस राजनीति के थोड़ा नीचे खिसकते ही शुरू होता है पूरा बगड़ यानि उबड़-खाबड़ जमीन और रेता-बजरी और बड़े-बड़े पत्थर। राज करो की नीति के मंच के ठीक बाद इस असली बगड़ पर बिछा संस्कार का बिछौना। 

उपनयन, मुंडन के लिए आए भुला लोग और इस संस्कार के लिए त्याड़ ज्यू के मुख से निकल रहे मंत्र..। उधर आवाजें 120 की दो, दस का एक ले लो..। अगल-बगल सारा बगड़ ठसाठस दुकानदारों और लोगों से भरा। कहीं पर पानी के ऊपर दुकान तो यह दुकान बिलकुल सरयू के धारदार कोने पर..। थोड़ा और आगे फिर उपनयन संस्कार, मुंडन और फिर दुकानें, पीछे से मंत्रों की फिर आवाज। थोड़ा और आगे फिर मंत्रों की आवाज, मगर.... वह मंत्र इंसानी जिंदगी के लिए पढ़े जाने वाले आखिरी मंत्र। पंडित जी भी वही, मंत्र भी और जिंदगी को नमस्कार कर चुके व्यक्ति के लिए चिता तैयार..। 

सामने नुमाइश खेत में पहाड़ी गाना बज रहा है..उठ सुवा उज्याव हैगो, चमचमै गो घामा..। थोड़ा ऊपर फिर दुकान जहां बिक रहे हैं बच्चों के खिलौने, फिर तमाम तरह के रंग-बिरंगे पिठ्या के प्रकार। बगल में पेठे की दुकान। बगड़ की एक ही चादर पर जिंदगी के इतने सारे रंग..। है ना गजब की बात..। फिर ऊपर की तरफ आ गए, यहां बहुत विशाल भगोना और उसमें बन रही खिचड़ी में डाला जा रहा गाय मार्का देशी घी का पैकेट। डिब्बे को पीछे से पिचकाकर करीब-करीब जमे हुए घी को बाहर निकलते देख खिचड़ी खाने की इच्छा तो होनी ही थी, थोड़ा इंतजार और फिर हाथ में प्लास्टिक की प्लेट, खिचड़ी, बह रहा घी, लाल रंग की पकी हुई मिर्च..। शशशशश....। यह ठैरा बागेश्वर का उत्तरायणी मेला और उसकी छोटी सी झलक।
जिंदगी के रंग बगड़ में... जिंदगी के रंग बगड़ में... Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Wednesday, January 16, 2019 Rating: 5

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