ना संविधान संशोधन का समय बचा है, ना सरकार का, फिर 10 प्रतिशत आरक्षण कैसे..?

पहाड़ समाचार...
...स्वर्ण जातियों को 10 प्रतिशत आर्थिक आधार पर आरक्षण का क्या है? संवैधानिक आधार  क्या है? संवैधानिक चुनौतियां ? अवसर की समानता अर्थात किसी भी प्रकार की सरकारी सेवा में चुने जाने का भारत के प्रत्येक नागरिक को समान अवसर प्राप्त हो यह संविधान प्रदत मूल अधिकार है। जिसकी व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 16 में की गई है। अनुच्छेद 16 (1) प्रत्येक नागरिक को अवसर की समानता का अधिकार प्रदान करता है। इसमें विभिन्न प्रकार के अवसरों में नौकरी का अवसर भी शामिल है। अनुच्छेद 16 (2) अवसर की समानता को धर्म, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर वंचित अथवा विभेदकारी नहीं किया जा सकता है। अनुच्छेद 16 (3) यदि केंद्र सरकार या राज्य सरकार आवश्यक समझे तो, समाज के किसी वर्ग विशेष अथवा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति जो कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हों, उनके उन्नयन के लिए विशेष प्रावधान (आरक्षण) कर सकती है। अनुच्छेद-16 (4) सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी) के लिए भी सरकार विशेष प्रावधान कर सकती है।

इस प्रकार संविधान का अनुच्छेद 16 जो, कि हमें अवसर की समानता प्रदान करता है। वहीं, अनुच्छेद 16 उपबंध 3 व उपबंध 4 में आरक्षण के प्रावधान शामिल किए गए हैं। इनमें किसी भी प्रावधान में आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ापन ही ह,ै ना कि आर्थिक रूप से पिछड़ापन। क्योंकि मूल अधिकार संविधान के भाग-3 के अंतर्गत आते हैं, जिन्हें केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1967 और मिनर्वा मिल्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने इस अध्याय में संशोधन के संसद के अधिकार को प्रतिबंधित किया है। मिनर्वा मिल्स में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि यदि संसद इसमें किसी प्रकार का संशोधन करती है तो, उक्त संशोधन को भी न्यायिक पुनरीक्षण से गुजरना होगा। 

अब जबकि संसद के सत्र का आखिरी दिन बचा है और सरकार के पास उच्च सदन में अनिवार्य 162 सदस्यों के बहुमत के विपरीत मात्र 86 सदस्यों का ही समर्थन हासिल है, ऐसे में 10 प्रतिशत आर्थिक आधार पर आरक्षण के विधायक को क्या संसद मंजूरी दे पाएगी। यह एक बड़ा प्रश्न है। साथ ही यह भी कि नई लोकसभा गठन के लिए आचार संहिता लागू किए जाने के लिए 60 दिन से कम का समय बचा है। क्या संविधान के अध्याय 3 को संशोधित करने वाला कोई कानून धरातल पर उतर पाएगा।

पहले भी आर्थिक आधार पर आरक्षण असंवैधानिक करार दिया गया है। वर्ष 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमिशन की रिपोर्ट लागू कर ओबीसी वर्ग के लिए 27 प्रतिशत अतिरिक्त आरक्षण की व्यवस्था किए जाने से समाज में जिस प्रकार का उद्वेग उत्पन्न हुआ था। उसे शांत करने के लिए नर सिम्हा राव सरकार को स्वर्ण जातियों को 10 प्रतिशत अतिरिक्त आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था वर्ष 1991 में शासनादेश से की गई थी। वर्ष 1992 में ही सर्वोच्च न्यायालय के 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ के एक फैसले में असंवैधानिक घोषित करते हुए आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय कर दी थी। इसी लड़ाई में ही यह व्यवस्था दी गई थी कि आरक्षण का लाभ नियुक्ति में तो दिया जा सकता है। लेकिन, प्रमोशन में नहीं। अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षण दिए जाने के लिए सरकार को क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू किए जाने की व्यवस्था करनी चाहिए। यह भी कहा गया था कि इस आरक्षण वर्ग में आर्थिक आधार पर पात्रता खोजी जानी चाहिए।

इस प्रकार उपरोक्त संवैधानिक आधार और चुनौतियों को देखते हुए सरकार की ओर से घोषित स्वर्ण जातियों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा क्या वास्तव में अमली जामा पहन पाएगी। यह एक बहुत संशय भरा प्रश्न है। इस संशय का सबसे महत्वपूर्ण आधार समय को लेकर ही है। क्योंकि सरकार के पास अब इतना समय नहीं है कि वह लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने से पहले उन समस्त संवैधानिक चुनौतियों का समाधान कर सके। कुलमिलाकर देखा जाए तो, सरकार का यह फैसला फिलहाल हवाई ही नजर आ रहा है। संवैधानिक जटीलताओं और कानूनी प्रावधानों के चलेत सवर्णों के लिए 10 प्रतिशित आरक्षण होना फिलहाल असंभव है। 

ना संविधान संशोधन का समय बचा है, ना सरकार का, फिर 10 प्रतिशत आरक्षण कैसे..? ना संविधान संशोधन का समय बचा है, ना सरकार का, फिर 10 प्रतिशत आरक्षण कैसे..? Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Tuesday, January 08, 2019 Rating: 5

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