राष्ट्रीय व्यंजन बनने से चूक गई थी खिचड़ी, हम भी बना रहे हैं और बीरबल ने भी बनायीं थी

नई दिल्ली : बेचारी खिचड़ी भारत का राष्ट्रीय व्यंजन बनने से भले ही चूक गयी हो पर मकर संक्रांति के पर्व पर वह मूर्धन्य बनी रहती है. इस अवसर पर माश (उड़द की दाल) और चावल की खिचड़ी प्रसाद के समान मानी जाती है. घी में भुनी यह खिचड़ी खुद ही इतना स्वादिष्ट होती है कि 'दही, पापड़, घी, अचार' आसानी से बिसराए जा सकते हैं. इसका मज़ा दुर्गा पूजा के पंडालों में बंटने वाली बंगाली खिचुड़ी से कम नहीं होता- पर यह सब समझ हमें ज़रा देर से आई. बचपन में मां यह कह कर डराती थीं कि अगर आज के दिन स्नान नहीं किया और माश की खिचड़ी नहीं खाई तो अगले जन्म में घोंघा बनोगे. खिचड़ी का महत्व अब नेता भी समझने लगे हैं.

आज पर्व का दिन है. हम बाथरूम में नहां के फारिक हो लिए. कुछ गनगा जी नहा आये होंगे, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो वाले स्नान के दिन भी पांच प्रतीकात्मक छींटों से काम चल जाता थे, उस परजाति के मनुष्य आज भी मोजूद हैं. जिस खिचड़ी को हम मरीजों का भोजन समझते थे, उसका इतिहास आज से कोई हज़ार साल पहले से है, जब अल बरूनी ने भारत की यात्रा की थी. तब यह देखा था कि खिचड़ी ही आम किसान का रोज़मर्रा का भोजन थी. दाल-चावल को एक साथ उबाल दलियानुमा खिचड़ी खाई जाती थी. कुछका मानना है कि वेदों में जिस 'क्षिरिका' का ज़िक्र मिलता है. वह खिचड़ी का ही पुरखा है. भला बीरबल की खिचड़ी को कोई कैसे भूल सकता है, जिसे पकने में घंटों लग गए थे?

दिलचस्प बात यह है कि जब शहज़ादा सलीम गुजरात को फ़तह कर लौटे तो उनके पिता ने उनके स्वागत भोज में 'लज़ीज़ा' नामक सामिष (मांसाहारी) खिचड़ी पकवाई थी. शायद इस खुशी में कि सलीम ने उस गुजरात को निगल लिया है, जहां का प्रिय भोजन खिचड़ी है. गुजरात और राजस्थान में बाजरे की खिचड़ी बड़े चाव से खाई जाती है. जब अंग्रेज़ भारत पहुंचे तो उनको भी खिचड़ी का चस्का लग गया. वह नाश्ते के वक्त जो 'केजरी' शौक से खाते-खिलाते थे, उसमें बीती रात की बची मछली, अंडे वगैरह बेहिचक शामिल कर लिए जाते थे. करी पाउडर वाला मसाला इसका कायाकल्प कर देता था. हौब्सन जौब्सन की एंग्लो इंडियन डिक्शनरी में इसका वर्णन किया गया है.

तामिलनाडु का 'पोंगल' सात्विक खिचड़ी का दाक्षिणात्य अवतार ही है, जिसने जीरे और काली मिर्च की जुगलबंदी से अपना जादू जगाया है. हाल में कुछ दिलेर प्रयोगातुर शैफों ने 'मशरूम खिचड़ी' तथा 'राजमा खिचड़ी' को भी मंच पर उतारा है, पर यह पारंपरिक व्यंजन को पछाड़ने में कामयाब नहीं हो सकी है. महाराष्ट्र की साबूदाना खिचड़ी नाम की ही खिचड़ी है, उसमें न तो दाल रहती है और न चावल.

हैदराबाद, दिल्ली और भोपाल में खिचड़ा पकाया जाता है, जिसमें गेहूं तथा दाल के अलावा बोटी रहित मांस पड़ता है. कुछ लोग इसी का नामभेद शोला खिचड़ी बताते हैं जो किसी पुलाव से कमतर नहीं समझा जा सकता.बुरा हो खिचड़ी सरकारों का जिन्होंने बेमेल भानुमति के अवसरवादी राजनीतिक कुनबे को ही खिचड़ी का पर्याय बना दिया.चलिए मकर संक्रांति के बहाने ही सही, घोंघा बनने के डर से ही सही माष की खिचड़ी की याद तो आई.

                                                                             संदर्भ: bbc.com/hindi और इतिहास के पन्ने

राष्ट्रीय व्यंजन बनने से चूक गई थी खिचड़ी, हम भी बना रहे हैं और बीरबल ने भी बनायीं थी राष्ट्रीय व्यंजन बनने से चूक गई थी खिचड़ी, हम भी बना रहे हैं और बीरबल ने भी बनायीं थी Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Tuesday, January 15, 2019 Rating: 5

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