सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट में मिली चुनौती

नई दिल्ली: सामान्य वर्ग के लोगों को आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण देने के लिए भारतीय संसद में पारित 124वें संविधान संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. यूथ फॉर इक्वलिटी नाम के एक संगठन ने यह याचिका दायर की है. इस संगठन ने अपनी याचिका में यह दावा किया है कि यह संशोधन संविधान की मूल भावना का उल्लंघन करता है. यूथ फॉर इक्वलिटी ने दायर याचिका में इस मुद्दे पर तत्काल सुनवाई की मांग की है और आर्थिक आधार पर नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण दिये जाने वाले इस संशोधन पर स्टे लगाने की मांग की है.
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई अभी नहीं हुई है. माना जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय में इस पर अगले हफ्ते सुनवाई हो सकती है. याचिका में दावा किया गया है, ष्यह संविधान संशोधन पूरी तरह से उस संवैधानिक मानदंडों का उल्लंघन करता है जिसके तहत इंदिरा साहनी केस में नौ जजों ने कहा था कि आरक्षण का एकमात्र आधार आर्थिक स्थिति नहीं हो सकती. इस तरह यह संशोधन कमजोर है और इसे निरस्त किए जाने की जरूरत है क्योंकि यह केवल उस फैसले को नकारता है.

यूथ फॉर इक्वलिटी के अध्यक्ष डॉ. कौशलकांत मिश्रा ने बीबीसी संवाददाता दिलनवाज पाशा से कहा, ष्आर्थिक रूप कमजोर सामान्य वर्ग को आरक्षण की जरूरत है और हम उसका समर्थन करते हैं. लेकिन यह संशोधन वर्तमान आरक्षण की सीमा जो 50 फीसदी है उसके अलावा 10 फीसदी है, हम इसका विरोध कर रहे हैं. सामान्य वर्ग को दिया जाने वाला 10 फीसदी कोटा, 50 फीसदी की सीमा के भीतर ही होना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि धीरे धीरे जाति आधारित आरक्षण को ख़त्म कर आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना चाहिए.

इससे पहले बुधवार को सामान्य वर्ग के लोगों को आर्थिक आधार पर नौकरियों और शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण देने के लिए संविधान में संशोधन संबंधी 124वां संशोधन विधेयक 2019 भारतीय संसद के उच्च सदन राज्यसभा में पारित हो गया. मंगलवार को लोकसभा में भी यह आवश्यक तीन चैथाई बहुमत से पारित हुआ था. राज्यसभा में इस बिल के समर्थन में कुल 165 मत पड़े जबकि सात लोगों ने इसका विरोध किया. वहीं लोकसभा में इसके समर्थन में 323 मत पड़े जबकि विरोध में केवल 3 मत डाले गए. 

सामान्य वर्ग को आरक्षण दिए जाने से जुड़े 5 अनसुलझे सवाल?
राज्यसभा में इस बिल में संशोधन के तमाम प्रस्ताव गिर गए, यानी ये बिल उसी रूप में पारित हुआ है, जिस रूप में सरकार ने इसे पेश किया था. विधेयक पास होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके इसे ऐतिहासिक बताया. उन्होंने लिखा, ष्संविधान (124वां संशोधन) विधेयक, 2019 लोकसभा में पास होना हमारे देश के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण है. यह समाज के सभी तबकों को न्याय दिलाने के लिए एक प्रभावी उपाय को प्राप्त करने में मदद करेगा.

उन्होंने लिखा कि उनकी सरकार श्सबका साथ, सबका विकासश् के सिद्धांत को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है और उनका प्रयास है कि किसी भी जाति, पंथ के गरीब व्यक्ति को गरिमा से जीवन जीने और संभावित अवसरों का मौका मिले. वहीं विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने जहां इसका समर्थन किया वहीं इसे जल्दबाजी में लिया गया फैसला भी बताया. कांग्रेस के सांसद केवी थॉमस ने कहा, ष्ये जल्दबाजी में लिया गया फैसला है. सरकार ने वादा किया था कि वो देश के युवाओं को नौकरियां देगी. लेकिन पांच साल का कार्यकाल ख़त्म होने आया है और अब तक कुछ नहीं किया गया है.

प्रमोशन में आरक्षणरू क्या बदला और क्या नहीं
जब नौकरी के नए आयाम बनाए ही नहीं गए हैं तो ये बिल लाने का मतलब क्या है. इसके पहले भी कई बार प्राइवेट मेंबर बिल लाकर अनारक्षित वर्ग के लिए आरक्षण संबंधी सुविधाएं देने की मांग हुई है. नरसिंह राव सरकार ने 1992 में एक प्रावधान किया था पर संविधान संशोधन नहीं होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया. अभी देश में कुल 49.5 फीसदी आरक्षण है. अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी, अनुसूचित जातियों को 15 फीसदी और अनुसूचित जनजाति को 7.5 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था है.
sorc.. bbc.com/hindi 
सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट में मिली चुनौती सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट में मिली चुनौती Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Thursday, January 10, 2019 Rating: 5

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