जरूर पढ़ें...किसान दिवस पर चन्द्रशेखर पैन्यूली की खरी-खोटी


चन्द्रशेखर पैन्यूली...
आज किसान दिवस है। किसान का सीधा मतलब हमे भोजन मुहैया कराने वाला, सीधे तौर पर कहें तो अन्नदाता। सभी सरकारें किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की बड़ी-बड़ी बातें करती है, लेकिन बड़े दुखी मन से कहना पड़ रहा है कि किसानों की स्थिति दिनों दिन बदतर होती जा रही है। किसानों की आत्महत्या के साल दर साल बढ़ते आंकड़े एक खौफनाक तस्वीर पेश करते है। किसानों की दयनीय स्थिति के लिए कांग्रेस, बीजेपी, सपा, बसपा आदि सभी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है क्योंकि केंद्र में और राज्यों में लगभग सभी दल या तो सरकार में शामिल रहे हैं या उनकी सरकारें रही है।

आज चीख चीख कर कहा जा रहा है कि हमने कर्ज माफी कर दी,हमने बिजली फ्री कर दी, हम 5000 रुपये देंगे. किसानों को ये सब नही चाहिए, किसान की वास्तविक पीड़ा को समझये, किसान की कर्जमाफी तो आप चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं, लेकिन क्या कभी आपने ये भी सोचा कि हमारे देश के किसान आखिर क्यों दिनों दिन दयनीय हालात की तरफ बढ़ रहा है? आखिर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक सरकारें किसानों के हित में फैसले क्यों नही लेती है? आखिर हरित क्रांति को हम क्यों भूलते जा रहे हैं। कितनी बड़ी विडंबना है कि बड़े जोर शोर से एक तरफ किसानों की कर्जमाफी, MSP बढ़ाने की बात होती है लेकिन दूसरी तरफ धरातल पर किसानों की फसलें सड़ रही होती है, किसानों के गन्ना, आलू, प्याज, धान, गेहूँ आदि का उन्हें समय पर सही रेट नही मिलता है, दूसरी विकट स्थिति उत्पादन के बाद बाजार के प्रबंधन की है,किसान पैदावार तो अच्छी करते हैं लेकिन सरकार द्वारा सही समय पर उनकी फसलों को नही खरीद जाता या उन्हें बाजार उपलब्ध नही हो पाता है, जिसका कारण है किसानों का दुखी होकर कृषि से ऊब जाना।

आज उत्तरप्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणामहाराष्ट्र, बंगाल, मध्य्प्रदेश, आदि सभी कृषि प्रदान राज्यों में किसानों की दयनीय हालात है,देश में कभी सूखे,तो कभी भारी वर्षा तो कभी मानसून का समय पर न आना तो कभी समय पर बीज, खाद न मिलने से किसान बेहद दुखी होते हैं, ऊपर से सरकारों द्वारा भी किसानों को उचित सहयोग नही मिल पाता है। अपनी जमापूंजी लगाकर और कर्ज लेकर फसल उगाने वाले किसानों को जब उनकी पैदावार की दुर्दशा दिखती है और सरकार से जब उनकी अनदेखी होती है तो मजबूरन उन्हें आत्महत्या जैसा वीभत्स कदम उठाना पड़ता है,हालाँकि किसान भाइयों को समझना चाहिए कि आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नही है, लेकिन किसानों के प्रति बहरी हो चुकी सरकारों को जगाने के लिए जरूर आवाज बुलंद करनी ही पड़ती है। 

आज हजारों की संख्या में किसान कभी महाराष्ट्र से तो कभी यूपी, हरियाणा से अपनी माँगो को लेकर दिल्ली कूच करते हैं, लेकिन बेहद दुःखद बात है कि उन पर किसी पार्टी समर्थक का दलाल होने का चिट चस्पा किया जाता है,जैसे ये वामपंथी है,ये कांग्रेसी है ये फलाने है,आदि,लेकिन राजनीत्तिक नफे नुकसान में वास्तविक बात को सभी भूल जाते है कि आखिर किसान क्यों मजबूर हो रहा है? बार बार किसानों को भरोसा मिलता है और फिर विश्वासघात भी,सरकारों को समझना चाहिए किसानों की यदि इसी तरह अनदेखी होती रही तो वो दिन दूर नही जब हम सबको खाने के लिए तरसना होगा। क्योंकि हम पैसे पैदा कर सकते हैं, सोना ,चांदी, कम्प्यूटर,मोबाइल,कपड़ा,मशीन सभी पैदा कर सकते हैं लेकिन जिन्दा रहने के लिए हम सबको अन्न की जरूरत होती है जिसको किसान ही पैदा करता है।

भारत को किसानों का देश भी कहा जाता है लेकिन यदि इसी तरह किसानों की अनदेखी होती रही तो शायद हम सब अन्न के लिए तरस रहे होंगे,सरकारों को ये भी समझना चाहिए कि कर्जमाफी जैसा शिगूफा किसानों की समस्या का समाधान नही है,बल्कि किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनकी फसल को समय पर बुवाई,कटाई से लेकर बाजार तक पहुंच की सरकार को अच्छी व्यवस्था करनी चाहिए उन्हें,अच्छा बीज मिले,समय पर खाद मिले, सिंचाई की व्यवस्था सुदृढ़ हो, उनकी फसलों का अच्छा रेट उन्हें मिल सके और सब्सिडी का सारा पैसा उनके खातों में जाए। किसानों का बकाया जल्द चुकाया जाये ताकि किसान की आर्थिक हालात मजबूत हो।

मैं पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड का निवासी हूँ, मेरे राज्य में भी जोत की खेती लगातार घट रही है, पहाड़ो से भारी पलायन का ही असर है कि पहाड़ो की खेती तो बंजर हो रही है, और मैदानी, भाबर में कृषि योग्य भूमि कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रही है। पहाड़ो के सीढ़ीनुमा खेतो में पैदावार कम जरूर होती है लेकिन यहाँ पर मंडुवा,चौलाई,भांग ,गहत, सोयाबीन, झंगोरा आदि नगदी फसलों की खेती होती है,लेकिन बढ़ते पलायन,जंगली सुअरों,बंदरो ने पहाड़ो में काम करने वाले किसानों की कमर तोड़ कर रख दी जिसका नतीजा ये है कि पहाड़ो की खेती कम होती जा रही है।

सरकारों को राष्ट्रीय स्तर पर किसानों की समस्याओं के समाधान हेतु बेहद गम्भीर होकर सोचना चाहिए वरना ये भाषणों,और घोषणाओं से न तो किसानों की समस्याओं का समाधान होगा और न ही पेट भरने वाला है,आज किसानों की समस्या के लिए लड़ने वाले नेताओं की कमी भी है,असल में जो लोग किसानों के लिए शुरू में लड़ते हैं वो बाद में बड़ा नेता बनकर उनकी अनदेखी करते है, अब एसी कमरों में बैठने वाले गर्मी, लू, वर्षा, कोहरा, ठण्ड, आँधी आदि में काम करने वाले किसानों की बात को कम ही महसूस करते हैं आज पूर्व प्रधानमंत्री स्व चौधरी चरण सिंह जैसे किसान नेता नही रहे, जो स्वयं हल लगाते थे, खेत जोतते थे, फसल काटते थे, इसीलिए उन्हें किसानों का दर्द पता था। 

आज न तो चौधरी चरण सिंह रहे, न महेंद्र सिंह टिकैत और न ही ताऊ देवी लाल जैसे किसान नेता। चौधरी चरण सिंह जी की 116वीं जयंती है, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और बाद में देश के प्रधानमंत्री रहते उन्होंने किसानों के कल्याण हेतु कार्य किये, उन्हें किसानों का मसीहा कहा जाता है,किसान दिवस पर किसानों और मजदूरों के नेता चौधरी चरण सिंह जी को नमन करते हुए ,सत्ता में बैठे सभी राज्यों की सरकारों और केंद्र सरकार से ये अपेक्षा करता हूँ कि आप किसानों की अनदेखी न करें, क्योंकि किसान ही हम सबको पालने वाले अन्नदाता है, अन्नदाता की खुशहाली में ही देश की खुशहाली और स्मृद्धि है। सभी किसान भाइयों को किसान दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

जरूर पढ़ें...किसान दिवस पर चन्द्रशेखर पैन्यूली की खरी-खोटी जरूर पढ़ें...किसान दिवस पर चन्द्रशेखर पैन्यूली की खरी-खोटी Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, December 23, 2018 Rating: 5

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