pahadsamachar.com : जनसहभागिता से ही निकल पायेगा गंगा स्वच्छता का समाधान

देहरादून...
गंगा स्वच्छता को लेकर हर कोई चिंतित है। तमाम तरह की योजनाएं चलाई जा रही हैं। बावजूद इसके गंगा में प्रदूषण लगातार बढ़ता ही जा रहा है। केंद्र सरकार ने नमामी गंगे के लिए न केवल अलग मंत्रालय बनाया, बल्कि गंगा स्वच्छता के लिए अब तक 21 हजार करोड़ का बजट भी दे दिया है। इसके बाद भी हालात सुरधने के बजाय बिगड़ते जा रहे हैं। यह सब हम और आप लोगों के कारण ही हो रहा है। सरकार पूरा प्रयास कर रही है, लेकिन लोग जागरूक और पढ़े-लिखे होने के बावजूद कूड़ा-कचरा गंगा में ही डाल रहे हैं। गंगा स्वच्छता को लेकर एडवोकेट विपिन कैंथाला भी काफी चिंतित नजर आते हैं। ओ इसको लेकर क्या सोचते हैं। तमाम मसलों पर उन्होंने अपने इस लेख में सभी बातों को काफी विस्तार से लिखा है।
 
...विपिन कैंथोला (एडवोकेट) 
..आज हम बात करें प्रदूषण की तो हमारे पूरे देश का अधिकांश हिस्सा आज जल, वायु, ध्वनि और भूमि प्रदूषण की समस्या से ग्रसित है, हमारे जीवन मे जल, वायु, भूमि अत्यधिक महत्त्व रखते हैं आज जल प्रदूषण की समस्या भयावह स्वरूप लेती जा रही है, पानी हमारे जीवन की अहम आवश्यकता है ओर जल मिलता है हमे नदियों और स्रोतों से। गंगा नदी का नाम आते ही सबसे पहले मां शब्द ही निकलता है। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि मां गंगा ना केवल हमें पानी उपलब्ध कराती है। बल्कि उससे कहीं अधिक गंगा हमारी आस्था का केंद्र बिंदु है। पूरे देश के अधिकांश हिस्से को गंगा पीने का पानी तो देती ही है साथ ही अधिकांश भू भाग को सिंचित करती है, लेकिन आज प्रदूषण रुकने के बजाय ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। 

आज प्रदूषण नियंत्रण को लेकर सरकारी व गैर सरकारी, संस्थाओं द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन अक्सर किया जाता है लेकिन, परिणाम देखें तो स्थिति वहीं पर है जहां पर पहले थी, गंगा की इस दशा और प्रदूषण की भयावह स्थिति को देखकर ही हमारे देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी ने पूरे देश मे स्वच्छ भारत अभियान चला रखा है। गंगा को साफ करने को लेकर नमामि गंगे अभियान भी शुरु किया है। प्रदूषण से आज गंगा का पावन स्वरूप लगातार बिगड़ता जा रहा है। गंगा हमारे देश के पर्यावरण का विश्वनीय बैरोमीटर है, हमने अपने दादाजी व माता, पिताजी से सुना कि जब सात-आठ दशक पूर्व में वातावरण साफ था, शुद्ध हवा थी, उस समय पर गंगा का प्रवाह भी पावन था। यहां तक कि मैदानी क्षेत्रों में तो लोग खुले आसमान के नीचे सो जाया करते थे व निसंकोच होकर स्रोत, नदियों, छोटी-छोटी सम्पर्क नहरों व हेण्डपम्पों का पानी बिना प्यूरीफाई के पी जाय करते थे, लेकिन तब से लेकर अब के  तक के समयान्तराल में गंगा व सहयोगी नदियों का पर्यावरणीय ह्रास बहुत तेजी से हुआ है।

आज गंगा एक्शन प्लान के तहत नमामि गंगे को सक्रिय किया गया है, लेकिन इससे  पूर्व में भी गंगा प्लान को लेकर 1984 से कार्य प्रारंभ हुवा था। इस अंतराल में प्रदूषण और तेजी से बढ़ा और फिर 2014 में मोदी सरकार ने इस ओर ध्यान दिया। हम अगर 1984 से 2014 तक के दौरान किये गए विभिन्न सरकारी गैरसरकारी प्रयासों की बात करें तो हम लक्ष्य के कितने नजदीक पहुंचे हैं, यह आप खुद ही आंकलन कर सकते हैं। अगर हम देखें तो गंगा में प्रदूषण मैदानी इलाकों में ही नहीं होता, बल्कि गंगा उद्गम स्थल से ही गंगा प्रदूषण की शिकार होना शुरू हो जाती है। हम उद्गम स्थल से नीचे की ओर चलंे तो देखेंगे कि अनेकों छोटे नाले व छोटी नदियां गंगा में प्रवाहित हो रही हैं। इन सभी सम्पर्क नदियों व नालों के किनारे पहाड़ों में कस्बे बसे हैं। इन कस्बों की गंदगी व गंदा पानी इन नदियों व नालों में प्रवाहित होता है और ये सभी नदियां कहीं न कहीं आकर गंगा में समाहित हो जाती हैं। 
 
हम पहाड़ों से उतर कर जैसे ही मैदान की ओर आयेंगे तो ऋषिकेश व हरिद्वार से मैदानी भू भाग शुरू हो जाता है। यहां हम प्रदूषण की बात करें तो वस्तुस्थिति आपको स्वयं पता चल जाएगी। ऐसा नहीं है कि सरकार इस ओर ध्यान न दे रही हो, सरकार के जितने भी संशाधन हैं वह उन संशोधन से गंगा को प्रदूषण मुक्त करने को लेकर ततपरता से कार्य कर रही है। सैकड़ो नदियां व हजारों नालों में बहाया जा रहा मल, कचरा, जहरीला औद्योगिक राशायनिक, कृषि अवशेष गंगा व सहायक नदियों और नालों में गिराया जा रहा है। ऐसे में कितने भी शोधन यंत्र लगाने का कोई फायदा दिखता नजर नहीं आ रहा। इसके लिए विशाल गंगा बेसिन को पूरे देश के लगभग 27 प्रतिशत बह कर आने वाली गन्दगी के स्रोतों को नियंत्रित व शोधित करना होगा।

यह समस्या आज बहुत संवेदनशील मुद्दा बनता जा रहा है, लेकिन इस भयावाह हालात को देखते हुवे खुद समाज को गम्भीर चिंतन व आत्ममंथन करना जरूरी है, जरा सोंचे की हम गंगा, नदियों व नालों के साथ क्या-क्या ज्यातीय नही कर रहे है ,आज आस्था के नाम परहम गंगा को कितना गन्दा करते जा रहे हैं आज आप गंगा के घाटों की ओर नजर दौड़ाएंगे तो चारो ओर हर किनारे पर सड़े गले फूल, पत्ते, चुनर, मृत पड़े पशू व गंगा के किनारे बड़े आयोजनों की समाप्ति के बाद वहां पड़े पुराने वस्त्र, नायलान, प्लास्टिक की पन्नियां, प्लास्टिक की बोतल , तमाम विषैले तत्वों, असंख्य छोटी मूर्तियां, पूजा की बची सामाग्री, किनारों पर बने अंतिम संस्कार घाटों पर अधजली लकड़ियों अधजले शवों व धार्मिक अनुष्ठानों की अवशेष बची हुई सामाग्री को हम गंगा व नदियों में प्रवाहित कर देते हैं।

गंगा में आने वाले आस्था के इस प्रदूषण की मात्रा का अनुमान लगभग 25 प्रतिशत लगाया गया है, इन सभी के दुष्परिणाम हमारे आने वाकई पीढ़ी को भुगतने होंगे , जिस पीढ़ी के सुनहरे भविष्य के लिए हम अपना पूरा जीवन लगा देते है, उसको हम देकर जाएंगे तो प्रदूषित वातावरण, गंगा को साफ करने के लिए समाज को आगे आना होगा हमे खुद इस मुहिम से जुड़ना होगा गंगा व सहयोगी नदियों, नालों को स्वच्छ करना अपनी प्राथमिकता में रखना जरूरी होगा व जागरूक होकर अपने आप से शुरुआत करनी होगी प्रशासन को भी कड़ाई से नदियों को मृतप्राय बनाने वाली उपरोक्त गतिविधियों पर कड़ाई से नियंत्रण करते हुवे जनसहयोग लेकर जो भी कचरा, मल रासायनिक अवशेष गंगा और अन्य नदियों में बह रहा है, उन पर समुचित संयंत्रों को लगाकर शोधन कर जल गंगा में प्रवाहित करवाया जाए, साथ ही प्रवाह क्षेत्र में हो रहे अवैध अतिक्रमण पर भी शक्ति से कार्रवाई करनी होगी। जब तक हम उपरोक्त बिन्दुआंे पर तुरंत कार्य नहीं करेंगे, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान हो पाना संभव नहीं। इसका स्थायी समाधान यही है कि शक्ति से हम सुधार के उपरोक्त बिन्दुओं का पालन करें और करवाएं, तभी हम इस विकराल होती समस्या पर जीत हासिल कर सकते हैं।
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