दो अक्टूबर 1994...24 साल...इंसाफ का इंतजार...।

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देहरादून...
दो अक्‍टूबर 1994, 24 साल और इंसाफ का इंतजार...। शहीद आंदोलनकारि‍यों काेे इंसाफ, राज्‍य की परि‍कल्‍पना काेे साकार करने का इंसाफ। रारामपुर तिराहा (मुजफ्फरनगर) कांड को 24 साल हो गए। शहीदों की कुर्बानी से उत्तराखंड बना। बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस इस राज्य में राज कर रही हैं। लेकिन, आंदोलनकारियों का बर्बर दमन करने वाले तत्कालीन पुलिस-प्रशासन, कर्मचारी और अधिकारियों को अभी तक सजा नहीं मिल पायी है। सरकारें चाहे जो भी रही हों, सभी ने आंदोलनकारियों के नाम की रोटी सेकने का कोई मौका नहीं गंवाया। आलम यह है कि राजनीतिक दल सत्ता हासिल कर राज कर रहे हैं और जो मामूली रूप से आंदोलन में शामिल हुए थे, वो सरकारी नौकरियों पर सरकारी दामाद बने हुए हैं। जिन लोगों ने कुर्बानी दी, उनकी चि‍ंता कुछेक लोगों को छोड़कर ना तो सरकार को है और ना राज्य आंदोलन के नाम पर नौकरी पाने वालों को। ऐसी बेरुखी को क्या कहा जा सकता है...? क्या कभी किसी ने शहीदों की स्मृति में फूल चढ़ाने के अलावा कुछ किया है...? किसी ने कुछ नहीं किया...राज्य आंदोलन और राज्य के लिए कुर्बानी देने वालों को ढपली बनाकर हर कोई अपनेेेे-अपने राग अलाप रहेे हैंं...।


राज्य सरकार हर साल दो अक्तूबर को आंदोलनकारियों का दमन करने वाले गुनहगारों को सजा दिलाने की बात करती है लेकिन, शहीदों को न्याय दिलाने के लिए कोई प्रभावी कदम आज तक नहीं उठाए गए। शायद सरकारें भी यही चाहती होंगी कि मसला चलता रहे और वो हर साल 2 अक्टूबर को फिर से अपना गला फाड़ सकें। मुख्यमंत्री जो भी रहा हो, बेझिझक होकर पांच साल सत्ता के दौरान हर साल न्याय दिलाने का भाषण पिलाकर मुजफ्फरनगर से मुहं लटकाए वापस लौट आते हैं। क्या ऐसे में इंसाफ मिल पाएगा...? क्या कभी उत्तराखंड राज्य निर्माण की जो परिकल्पना थी, वो पूरी हो पाएगी...?

हम उस वक्त छोटे जरूर थे, लेकिन हमें उत्तराखंड आंदोलन की यादें अच्छी तरह से याद हैं। एक अक्टूबर 1994 की रात से दो अक्टूबर की सुबह तक आंदोलनकारियों पर पुलिस का लाठीचार्ज और गोलियां बरसीं। पुलिस ने करीब चार सौ उत्तराखंडी गिरफ्तार कर पुलिस लाइन भेज दिए। गांधी जयंती पर सुबह पुलिस की फायरिंग में सात आंदोलनकारियों की मौत हुई। पुलिस ने लाठीचार्ज और फायरिंग के दौरान खेतों में भाग रही महिलाओं की अस्मत से खिलवाड़ किया। सीबीआई ने जांच में इस बात की पुष्टि हुई। ऐसे दो मामले कोर्ट में चल रहे हैं। पर मलला इस बात का है कि आज तक किसी को इंसाफ नहीं मिल पाया। आज भी इंसाफ की मांग को लेकर आंदोलनकारी हर साल अलग-अलग टुकड़ों और धड़ों में आंदोलन कर रहे हैं। 
आज दो-अभी दो उत्तराखंड राज दो का नारा अब बदल चुका है। नारा अब...आज दो, अभी दो...शहीदों को इंसाफ दो। असल आंदोलनकारी असल में दुखी भी हैंं। राजधानी गैरसैंण का मसला आज तक अस्थाई है और अस्थाई राजधानी स्थाई बनने की ओर है। हैरानी इस बात की है कि गैरसैंण में विधानभवन खड़ा होने के बाद और सत्र आयोजित कराने के बावजूद राजधानी को लेकर कोई फैसला नहीं लिया जा रहा। राजनीतिक दल खासकर भजपा-कांग्रेस हर बार राजधानी गैरसैंण को अपने एजेंडे में रखते हैं। घोषण पत्र में शामिल करते हैं। लेकिन, आज तक राजधानी को लेकर कोई भी सरकार और दल निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंच पाए, या यूं कहें कि कोई पहुंचाना ही नहीं चाहता...। जरूरत फि‍र से एक जोरदार आंदोलन और भाजपा-कांग्रेस जैसे राजनीति‍क दलों के वि‍कल्‍प की भी है। 
                          
                                   ...प्रदीप रावत(रवांल्‍टा)

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