अन्‍न जहां का हमने खाया...वस्‍त्र जहां के हमने पहने...

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प्रदीप रावत (रवांल्टा)
अन्‍न जहां का हमने खाया..., वस्‍त्र जहां के हमने पहने..., यह है प्‍यारा देश हमारा..., उसकी रक्षा कौन करेगा..., हम करेंगे..., हम करेंगे..., भारत माता की...वंदे मातरम...आजादी के हमर शहीद....अमर रहे। सुभाष चंद्र बोस अमर रहे, भगत सि‍ंह अमर...फलां...फलां....। जो हमसे टराएगा...चूर-चूर हो जाएगा.... ये वाला नारा सबसे ज्यादा फेमस और जोशिला था...। जि‍तने भी शहीद हुए, स्‍वतंत्रता संग्राम के वीर और हीरो रहे। महान वि‍भूति‍यां रही। सबको याद कि‍या जाता था। प्रभातफेरी अब भी होती है, लेकिन इस तरह के नारे अब कम सुनाई पड़ते हैं। 15 अगस्त स्‍वतंत्रता दि‍वस और 26 जनवरी गणतंत्र दि‍वस को लगभगभ एक जैसे ही नारे होते थे। ऐसे नारे, जो मन में उमंग पैदा करत थे, देश भि‍क्‍त और राष्ट्रभि‍क्‍त की अलख जगाते थे। और हां स्‍कूल से मि‍लने वाले लड्डू के प्रति‍ भी खूब भि‍क्‍त उमड़ती थी बचपन में हमारे मन में...। 

बचपन में स्वतंत्रता दिवस और गंणतंत्र दिवस पर मैं और मेरे जैसे कई बच्चे केवल इसलिए स्कूल (सरकारी) जाते थे कि हमको 15 अगस्त और 26 जनवरी का लड्डू मिल जाएगा। हमारे लिए स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस तब केवल तारीख ही होते थे। ये तारीखंे जब भी आती थी। हमारे मन में लड्डू फूटने लगते थे। असली वाले लड्डू। सुबह की प्रभातफेरी के बाद स्कूल में देशभक्ति के गीत और लोक कार्यक्रम होते थे। घर लौटते वक्त छोटे बच्चों को एक और बड़ों को दो लड्डू मिल जाते थे। तब इनके लिए स्कूलों को फंड भी मिलता था। एक-दो रुपये की फीस भी देनी होती थी।....इन्हीं में से कुछ बचाकर लड्डू खरीद लिए जाते थे और बच्चों को बांट दिए जाते। जो राष्ट्रीय पर्वों पर स्कूल नहीं जाते, उनको फाइन भी देना पड़ता था। उन लड्डुओं के साथ सबको असली देशभक्ति और राष्ट्रवाद की सही परिभाषा भी बताई जाती थी। आज लड्डू से लेकर परिभाषा तक सब गायब है। 
  
बाल मन अब भी वही है। लड्डू खाने को लेकर बच्चे अब भी उत्सुक रहते हैं। पर अब लड्डू खिलाने के लिए स्कूल को बजट नहीं मिलता। सरकार कहती है कि शिक्षा मुफ्त मिल रही है तो लड्डू का बजट भी नहीं मिलेगा। 15 अगस्त और 26 जनवरी का लड्डू अब भी दिया जा रहा है, लेकिन शिक्षक और अभिभावक चंदा जुटाकर ही उसका प्रबंध करते हैं। आलम यह है कि स्कूलों को मिलने वाला सालाना बजट करीब 10,000 हजार है। इसीमें विद्यालय की सभी तरह की गतिविधियों को निपटना होता है। चाहे खेलकूद के लिए हौसलों की ट्राफी देनी हो या फिर बच्चों को कोई दूसरा पुरस्कार। स्टेशनरी का खर्च का गुजारा भी इसी से करना होता है। 

15 अगस्त 26 जनवरी को हमारे वक्त में कई तरह की प्रतियोगिताएं भी होती थी। उनके पुरस्कार और पहले हुई प्रतियोगिताओं का पुरस्कार भी उसी दिन दिया जाता था। उस वक्त पुरस्कार भी शानदार होते थे। किसी को 1 से डेढ़ रुपये वाली पतली सी काॅपी मिल जाती थी, किसी को काॅपी पेंसिल, और किसी-किसी को बहुत अच्छा करने पर काॅपी, पेंसिल के साथ रबर भी मिल जाता था। पुरस्कार की खुशी देखने लायक होती थी। वक्त बदलने के साथ पहले पुरस्कारों का स्वरूप बदला। इन दिनों में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों का स्वरूप भी बदला। अब स्थिति यह हो गई कि ज्यादातर स्कूलों में कोई आयोजन ही नहीं होते। बात केवल लड्डू की नहीं है। बच्चों में देशभक्ति का जज्बा जगाने और उनका हौसला बढ़ाने की भी है। 

अन्‍न जहां का हमने खाया...वस्‍त्र जहां के हमने पहने... अन्‍न जहां का हमने खाया...वस्‍त्र जहां के हमने पहने...  Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Tuesday, August 14, 2018 Rating: 5

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