प्रयोगशाला सहायकों से किया वादा भूल गए धन सिंह रावत, काली पट्टी बांध कर रहे काम

नरेंद्रनगर: धर्मानन्द राजकीय महाविद्यालय नरेंद्रनगर में प्रयोगशाला सहायकों ने राज्य सरकार से अपनी लंबित मांगों को शीघ्र पूरा करने की मांग की है। प्रदेश के सरकारी और सहायता प्राप्त महाविद्यालयों के प्रयोगशाला सहायक लंबे समय से प्रयोगशाला सहायकों को मिनिस्टीरियल संवर्ग की तरह स्टाफिंग पैटर्न पर लाने और शैक्षिक अर्हता को स्नातक करते हुए ग्रेड वेतन को 2800 किए जाने की मांग करते आ रहे हैं।

महाविद्यालय में भौतिकी के प्रयोगशाला सहायक मुनींद्र कुमार ने कहा कि हालांकि पिछले साल उच्च शिक्षा मंत्री ने इन दोनों मांगों को शीघ्र पूरा किए जाने का आश्वासन दिया था, लेकिन साल बाल भी भी शासन की ओर से इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की गई। शासन-प्रशासन की इस तरह के रवैये से नाराज प्रदेशभर के प्रयोगशाला सहायकों ने 24 अक्टूबर तक काली पट्टी बांधकर विरोध जताने का निर्णय लिया है। मंगलवार को नरेंद्रनगर महाविद्यालय के प्रयोगशाला सहायकों ने भी काली पट्टी बांधकर सरकार से अपनी लंबित मांगों को शीघ्र पूरा करने की मांग की।
प्रयोगशाला सहायकों से किया वादा भूल गए धन सिंह रावत, काली पट्टी बांध कर रहे काम प्रयोगशाला सहायकों से किया वादा भूल गए धन सिंह रावत, काली पट्टी बांध कर रहे काम Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Tuesday, October 22, 2019 Rating: 5

पंचायत चुनाव: BJP प्रत्याशी के खिलाफ चुनावी रण में निर्दलीय उतरी पत्नी

उत्तरकाशी: इन दिनों पंचायत चुनावों की सरगर्मी बढ़ गई है। उत्तरकाशी जिलें भी चुनाव घमासान मचा हुआ है। कहीं भाई-भाई चुनावी मैदान में हैं, तो कहीं रिश्तेदार आमने-सामने हैं। लेकिन, जिला मुख्यालय लगी गाजणा पट्टी के जिला पंचायत वार्ड 10 (न्यूगांव) में एक ऐसी तस्वीर उभरकर सामने आई, जिस पर पहली दफा लोग यकीन नहीं कर रहे हैं, लेकिन वो पूरी तरह सच है।
आब आपको असल बात बताते हैं। दरअसल, वार्ड संख्या 10 से आठ प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें भाजपा के अधिकृत पत्याशी भी हैं। सामान्य सीट होने के कारण ज्यादातर यानि 7 पुरुषों ने ताल ठोकी है। जबकि एक अकेली महिला ने भी भी ठिकट लिया है। इस तरह कुछ आठ प्रत्याशी चुनाचवी मैदान में हैं। वार्ड में कुल 13 हजार वोटर हैं।

दिलचस्प ये है कि भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ उन्हीं की पत्नी ने ताल ठोक कर चुनावी रण को रोचक बना दिया है। खास बात ये भी है कि पति के खिलाफ चुनावी ताल ठोकने वाली महिला पूर्व जिला पंचायत सदस्य रह चुकी हैं। इसकी चर्चा हर कहीं हो रही है। लोग गाजणा पट्टी की इस लड़ाई को बड़े ही रोमांचक नजरिये से देख रहे हैं। इस चुनावी रण की चर्चा उत्तरकाशी से लेकर देहरादून तक है।
पंचायत चुनाव: BJP प्रत्याशी के खिलाफ चुनावी रण में निर्दलीय उतरी पत्नी पंचायत चुनाव: BJP प्रत्याशी के खिलाफ चुनावी रण में निर्दलीय उतरी पत्नी Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Wednesday, September 25, 2019 Rating: 5

भई वाह: मंडुवे के मोमो और स्प्रिंग रोल, चाइनीज को तमाचा

कोटद्वार: चाइनीज खाना हमें बीमार कर रहा है। मोमा से लेकर स्प्रिंग रोल और ना जाने क्या-क्या ? चाइनीज फूड की दीवानगी शहर से लेकर गांव तक खूब नजर आती है। चाइनीज फूल के ठेलों, होटलों और ढाबों पर लोगों की खूब भीड़ जमा रहती है। चाइनीज खाना हमें फुला तो देता है, लेकिन वो ताकत नहीं देता, जो हमारे पहाड़ी खाना दे सकता है। चाइनीज के इसी तिलीस्म को तोड़ने के लिए कोटद्वार के कीम्स इन्सटियूट ने मंडुवे के मोमो और स्प्रिंग रोल बनाए हैं, जिनको लोग खूब पसंद कर रहे हैं। 


होटल मैनेजमेंट कोर्स चलाने वाले अजेंद्र राणा को पहाड़ी खाना बहुत पसंद है। चाइनीज ठेलों पर, रेस्टोरेंट पर लोगों का जमावड़ा लगा रहता है। जिससे केवल बीमारी मिलती है। उनको इसीसे आईडिया आया कि क्यों ना मंडुवे के मोमो बनाए जाएं और जितने भी चाइनीज डिश बनती हैं, धीरे-धीरे उन सभी डिश को बनाकर रोजगार से जोड़ा जाए। 

पहाड़ों से लोग लगातार रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं। उस लिहाज से ये पहले रोजगार का जरिया भी बन सकती है। साथ ही पहाड़ी उत्पादों की खपत बढ़ाने में भी कारगर साबित होगा। स्वास्थ्य के लिहाज से भी ये खासे महत्वपूर्ण हैं। केम्स में पढ़ने वाले छात्र भी पहाड़ी उत्पादों से कई तरह की डिश बनाने का प्रयास कर रहे हैं और पहाड़ी खाना बनाने में ही महारथ हासिल कर उसे रोजगार का जरिया बनाने की ओर देख रहे हैं।

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उत्तराखंड के लाल को मिला तटरक्षक मेडल (शौर्य), रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया सम्मानित

देहरादून : केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आज भारतीय तटरक्षक बल के अलंकरण समारोह में अधिकारियों और जवानों को वीरता और सराहनीय सेवा के लिए तटरक्षक मेडल प्रदान किए। डीआईजी सुरेंद्र सिंह डसीला को कोलंबो (श्रीलंका) में मालवाहक जहाज एमएससी डेनिएला में आग बुझाकर 25 लोगों की जान बचाने के लिये प्रतिष्ठित तटरक्षक मेडल (शौर्य) से सम्मानित किया गया। उन्होंने इस ऑपरेशन को कोस्ट गार्ड के अत्याधुनिक निगरानी जहाज ‘शूर' की कमान संभालते हुए  अंजाम दिया था। 

पिथौरागढ़ के रुगड़ी गांव

तहसील गनाई गंगोली निवासी सुरेंद्र सिंह डसीला ने गांव से ही प्रारंभिक शिक्षा हासिल की। उनके पिता स्वर्गीय श्री दान सिंह डसीला जी भी सैनिक थे। । उनकी माताजी रुगड़ी गांव में रहती हैं I उनके भाई नई दिल्ली में कारोबार कर रहे हैं और  परिवार के साथ वहां रह रहे हैं I 

पिथौरागढ़ में पांचवीं तक पढ़े

पांचवीं कक्षा की पढ़ाई के बाद उन्होंने राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल, धौलपुर में एडमिशन लिया। पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने ओस्मानिया विवि से रक्षा प्रबंधन में पीजी किया। उन्मेहोंने अमेरिका से अंतरराष्ट्रीय सैन्य अधिकारी पाठ्यक्रम की पढ़ाई भी की। भारतीय नौसेना अकादमी से ट्रेनिंग लेने के बाद 1991 में कोस्ट गार्ड का हिस्सा बने। 2000 में उन्होंने जल दस्युओं के जहाज पर कार्रवाई करते हुए अदम्य साहस दिखाया, जिसके लिए उन्हें भारतीय तटरक्षक बल के महानिदेशक द्वारा प्रशस्ति से सम्मानित किया गया।

कोस्ट गार्ड  मुख्यालय में कमांडर कर्नाटक

डीआईजी डसीला वर्तमान में मंगलौर स्थित कोस्ट गार्ड  मुख्यालय में कमांडर कर्नाटक के पद पर तैनात हैं। उनकी पत्नी ज्योत्सना डसीला आचार्य नरेंद्र देव विद्यालय हल्द्वानी में टीचर हैं। जबकि इकलौता पुत्र राघवेंद्र चेन्नई से बीटेक करने पश्चात एक उद्यमी (आन्ट्रप्रनर) की तरह अपना लघु व्यवसाय चला रहे है।
उत्तराखंड के लाल को मिला तटरक्षक मेडल (शौर्य), रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया सम्मानित उत्तराखंड के लाल को मिला तटरक्षक मेडल (शौर्य), रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया सम्मानित Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Tuesday, September 24, 2019 Rating: 5

पंचायत चुनाव: त्रिवेंद्र सरकार को झटका, सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया हाईकोर्ट का फैसला

देहरादून: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड की त्रिवेंद्र रावत सरकार को करारा झठका दिया है। सरकार ने दो बच्चों के मामले में हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले बरकरार रखा है। इससे त्रिवेंद्र सरकार की जमकर किरकिरी होना तय है। साथ ही विपक्ष को भी सरकार पर हमलावर होने का बड़ा मौका मिल गया है। 


सरकार ने दो से अधिक बच्चों वाले अभिभावकों के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। जिसको लेकर हाईकोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई थी। याचिकाओं को सुनते हुए हाईकोर्ट ने सरकार के फैसले को गलत ठहराते हुए सभी को चुनाव लड़ने के योग्य करार दिया था। 

हालांकि कोर्ट ने सरकार के फैसले को लेकर यह भी कहा था कि 25 जुलाई 2019 के बाद जिनके तीन बच्चे पैदा हुए हों, ऐसे लोग पंचायत चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। सरकार ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। जिसको लेकर अब करारा झटका लगा है।
पंचायत चुनाव: त्रिवेंद्र सरकार को झटका, सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया हाईकोर्ट का फैसला पंचायत चुनाव: त्रिवेंद्र सरकार को झटका, सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया हाईकोर्ट का फैसला Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Monday, September 23, 2019 Rating: 5

बड़ी खबर: इंटर काॅलेज में छात्रों के बीच मार-पीट, 13 साल के छात्र की मौत

मोरी: उत्तरकाशी जिले के मारी राजकीय इंटर कॉलेज में दो छात्रों के किसी बात को लेकर मारपीट हो गई। जिसमें 13 साल के छात्र हीरा उर्फ हरि लाल निवासी हडवाडी मोरी की मौत हो गई। मौत से गुस्साए परिजन और लोग सड़कों पर उतर आए और चक्काजाम कर दिया। प्रदर्शन करने वाले ग्रामीण मृतक छात्र के साथ मारपीट करने वाले आरोपी छात्र को उनके सुपुर्द करने की मांग पर अड़े हैं।


परिजनों ने स्कूल प्रशासन पर मिलीभगत का आरोप लगाया है। जानकारी के मुताबिक राजकीय इंटर कॉलेज मोरी में शनिवार को छुट्टी की घंटी बजी। नौवीं के छात्रों ने शिक्षकों को बताया कि उनकी कक्षा में दो छात्रों के बीच लड़ाई हो रही है। जब तक शिक्षक कक्षा में पहुंचे तो एक छात्र जमीन पर गंभीर रूप से घायल पड़ा था।

स्कूल प्रशासन ने घायल छात्र को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मोरी में पहुंचाया, जहां से चिकित्सकों ने उसे दून अस्पताल देहरादून के लिए रेफर किया। लेकिन, दून अस्पताल में घायल छात्र की मौत हो गई। मृतक छात्र का शव पोस्टमार्टम के लिए नौगांव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पहुंचाया गया है।
बड़ी खबर: इंटर काॅलेज में छात्रों के बीच मार-पीट, 13 साल के छात्र की मौत बड़ी खबर: इंटर काॅलेज में छात्रों के बीच मार-पीट, 13 साल के छात्र की मौत Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, September 22, 2019 Rating: 5

कुंजापुरी मेले में 'सरौं' की ठुमक की रहेगी धमक

  • पारम्पारिक विवाह शैली को मिलेगी नई पहचान

नरेन्द्रगर:  कुंजापुरी मेले में इस बार पारंपरिक गढ़वाली विवाह शैली की प्रस्तुति डिजिटल युवाओं में खाशी चर्चा का विषय बनी है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की पारंपरिक वेश भूषा में सजे बाराती, डोली में बैठी दुल्हन, बारात के साथ चलते निशाण, दूल्हे पर लहराता चंवर और साथ में तलवार बाजी करते सरौं इस विवाह के मुख्य आकर्षण होंगे। 

धर्मानन्द उनियाल राजकीय महाविद्यालय  नरेन्द्रगर इस बार कुंजापुरी मेले में इसी अंदाज में शामिल होगा। बारात के आगे जहां श्वेत पताका हर्ष एवं उल्लास का प्रतिनिधित्व करेगी वहीं बारात के पीछे पीछे लाल पताका बारात को  संरक्षण देते हुए चलेगी। डोली में बैठी दुल्हन टिहरी की नथ और शादी के लाल जोड़े में बारात की पारंपरिक शैली को दर्शाएगी। बारात की इस रंगत को निखारने के लिए भी विशेष तैयारियांं की गई हैं। 

महाविद्यालय के  छात्रों ने जहां इस बार गढ़वाल की संस्कृति को मेले में पारंपरिक तौर पर ही प्रस्तुत करने का मन बनाया है वहीं गढ़वाल के भूले बिसरे युद्ध शैली के नृत्य सरौं को बड़ा मंच देने का विचार बनाया है। नरेन्द्रगर में 29 सितंबर को आयोजित कुंजापुरी मेले में इस बार धर्मानन्द उनियाल राजकीय महाविद्यालय ने पारंपरिक विवाह के साथ ही युद्ध शैली के नृत्य 'सरौं ' को झांकी में शामिल करने की ठानी है। सर पर पगड़ी, मिरजई और चूड़ीदार सफेद सलवार के साथ ही पैरों में घुंघरुओं की ठुमक इस झांकी को ऐतिहासिक बनाएगी। महाविद्यालय की प्राचार्या प्रोफेसर जानकी पंवार के अनुसार गढ़वाल की संस्कृति को संरक्षित करने की जिम्मेदारी हम सबकी है। 

इसीलिए लिए हमने कालेज के बच्चों के लिए सरौं नृत्य की प्रशिक्षण की भी पूरी तैयारी की है। इसके लिए पौड़ी गढ़वाल के चौबट्टाखाल से विशेष सरौं बुलाये गए जिन्होंने शनिवार 20 सितंबर को कालेज परिसर में प्रस्तुति देने के साथ कि कॉलेज के छात्रों को प्रशिक्षण भी दिया। यह प्रशिक्षण कार्य फील गुड (भलु लगद) की महिला सरौं सानिया और अमीषा की ओर से महाविद्यालय के छात्रों को दिया गया। 

इस अवसर पर महाविद्यालय की संस्कृति परिषद की संयोजक डॉ. चंदा नौटियाल ने कहा कि हमारा प्रयास है कि हम इस झांकी को एक बेहतर स्वरूप प्रदान कर सकें। प्रशिक्षण दिवस के इस अवसर पर फीलगुड संस्था के संजय बुड़ाकोटी, वंदना विष्ट, नेहा के अलावा महाविद्यालय के डॉ. अनिल नैथानी, डॉ. अनुराधा सक्सेना, डॉ. हिमांशु जोशी, डॉ. सुधा रानी, डॉ. विक्रम सिंह बर्त्वाल, डॉ. मनोज सुन्द्रियाल, मीनाक्षी काला, विशाल त्यागी, मुनेंद्र कुमार, भूपेंद्र, अजय  कैंतुरा, अंकिता भट्ट आदि उपस्थित रहे।
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तिलाड़ी कांड के नायक के गांव की ऐतिहासिक कहानी...नहीं लगता प्रधान का बक्सा

BARKOT (UTTARKASHI) : पंचायत चुनाव का बिगुल बज चुका है। गांवों में चुनावी शोर के बीच जहां लोग रणनीति बनाने में जुटे हैं। विरोधी को पटखनी दने की योजनाएं बना रहे हैं। कसमें खाई जा रही हैं। वोट की खातिर चाचा-भतीजे एक-दूसरे के दुश्मन बनने को तैयार हैं। लोग जाति-बिरादरी से लेकर नाते-रिश्तेदारों की कस्में खा रहे हैं। वहीं, तिलाड़ी कांड के नायक और जन आंदोलनों के नेता स्व. दया राम रवांल्टा के गांव में पिछले 70 सालों में कभी ग्राम प्रधान के चुनाव हुए ही नहीं। 


जब भी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की तैयारियों की बात आती है, तो लोग भी चुनावी तैयारियों में जुट जाते हैं। चुनाव की सुगबुगाहट से ही गांव में गुप-चुप बैठकों का दौर शुरू हो जाता है। एक-दूसरे का मात देने की चालें बनने शुरू हो जाती हैं। कोई किसी को नीचा दिखाने के लिए दूसरे के साथ जा मिलता है, तो कोई सिर्फ इसलिए दूसरे को प्रधान बनाना चाहता है कि उनके सारे काम आसानी से हो जाएंगे। 

इन बस हथकंडों से अलग उत्तरकाशी के नौगांव ब्लाक का कंसेरू गांव भी है, जहां लोगों को इस बात चिंता कभी नहीं सताती किसी को वोट देंगे तो दूसरे के साथ रिश्ते खराब हो जाएंगे। किसी को ठेस पहुंचेगी। उनको यह नहीं सोचना पड़ता है कि इस बार वोट किसको देना हैं। गांव मे प्रधान के चुनाव आजादी के बाद से आज तक कभी भी प्रधान के चुनाव नहीं हुए। और तो और पिछले कुछ समय से क्षेत्र पंचायत सदस्य भी निर्विरोध चुने गए। दो बार जिला पंचायत के लिए भी गांव ने निर्विरोध कैंडिडेट उतारा। गांव की एकता के पूरी रवांई घाटी में उदाहरण दिये जाते हैं।
 
अब तक के निर्विरोध प्रधान 

.अमर सिंह राणा, 15 साल
.विक्रम सिंह राणा, कार्यवाह
(अमर सिंह की मौत के 6 माह के लिए)
.गुलाब सिंह राणा, पांस साल
.जोत सिंह रंवाल्टा, 10 साल
.गजेंद्र सिंह राणा, साल 
.सोबन देई राणा, पांच साल तक (पहली महिला प्रधान)
.शैला देवी, 5 पांच साल
.रविन्द्र राणा, 5 पांच साल
.आनंदी, 5 पांच साल (पहली अनुसूचित जाति महिला प्रधान)

क्षेत्र पंचायत सदस्य
.विजय लक्ष्मी रावत रवांल्टा, पांच साल
.जगदीश रावत, 5 पांच साल
.विजय लाल भारती, 5 पांच साल
.शकुंतला राणा, 5 पांच साल

 
                                                                                                    ...प्रदीप रावत (रवांल्टा)
तिलाड़ी कांड के नायक के गांव की ऐतिहासिक कहानी...नहीं लगता प्रधान का बक्सा तिलाड़ी कांड के नायक के गांव की ऐतिहासिक कहानी...नहीं लगता प्रधान का बक्सा Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Saturday, September 21, 2019 Rating: 5

क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत वाले ना हों खुश, केवल प्रधानों के लिए है कोर्ट का फैसला


देहरादून: होईकोर्ट ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर जो फैसला सुनाया है। उसके बाद जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत में कई नये प्रत्याशी सामने आए थे, लेकिन अब कोर्ट के फैसले को लेकर जो बातें सामने आई हैं। उससे एक बार फिर से जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत का चुनाव लड़ने वालों के सपने चक्नाचूर हो सकते हैं। दरअसल, कोर्ट का फैसला केवल ग्राम प्रधान और पंचायद सदस्यों के लिए है।


होईकोर्ट ने पंचायतीराज संशोधन अधिनियम की धारा-8-1-आर पर फैसला सुनाया है। यह धारा केवल ग्राम पंचायत प्रधान और ग्राम पंचायत सदस्यों पर लागूं होता है। क्षेत्र पंचायत सदस्यों के लिए यह प्रावधान पंचायत राज संशोधन अधिनियम की धारा-53 और ग्राम पंचायत के लिए धारा-90 में हैं। इसको लेकर पंचायत राज विभाग ने सभी जिलों को एडवाइजरी जारी की है।


क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत वाले ना हों खुश, केवल प्रधानों के लिए है कोर्ट का फैसला क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत वाले ना हों खुश, केवल प्रधानों के लिए है कोर्ट का फैसला Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Friday, September 20, 2019 Rating: 5

सरकार को सुप्रीमकोर्ट में भी मिलेगी मजबूत चुनौती : कवींद्र ईष्टवाल

देहरादून: पंचायतें देश की आधार शिलाएं हैं, जिन पर आश्रित होकर आज भी देश की आधी आबादी जीविकोपार्जन के लिए लगातार संघर्षरत है। पंचायतों को दिए गए अधिकारों और नियमों में किसी भी स्तर पर बदलाव सीधे-सीधे विकास की लाईन में हाशिए पर खड़े आम आदमी के साथ एक धोखा है। सामाजिक कार्यकर्ता कवींद्र ईष्टवाल ने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला ऐतिहासिक है। अगर सरकार सुप्रीमकोर्ट जा रही है, तो वहां भी केस मजबूती से लड़ा जाएगा।


आज पहाड़ पलायन का दंश झेल रहा है ऊपर से भाजपा सरकार के तानाशाही भरे फैसले पलायन को और बल देने का कार्य कर रही है। सरकार का काम जनता के हितों की रक्षा करना, उसे संरक्षण देना है न कि उनका हनन करना। पंचायतों को लेकर जिस तरह से भाजपा सरकार ने बच्चों की बाध्यता बांधकर आम जनता की सहभागिता को खत्म करने का प्रयास किया वह बेहद निंदनीय है। 

इस सम्बन्ध में माननीय उच्च न्यायालय में हमारे द्वारा  जनहित याचिका दायर की गई थी। जिस पर आज फैसला जनता के हित में आया और अब तीन बच्चे वाले भी पंचायत चुनाव में प्रतिभाग कर सकते हैं। भाजपा सरकार जब जब दमनकारी नीति अपनाते हुए असंवैधानिक फैसले लेती रहेगी हम हमेशा उसका विरोध करेंगे और उसके खिलाफ संघर्षरत रहेंगे। 


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पंचायत चुनाव को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, तीन बच्चों वाले लड़ पाएंगे चुनाव

नैनीताल : नैनीताल हाईकोर्ट से पंचायत चुनाव को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है.. जी हां तीन बच्चों वाले उम्मीदवार पंचायत चुनाव लड़ पाएंगे. राज्य में 25 जुलाई 2019 के बाद ही प्रावधान लागू होंगे. पंचायत चुनाव को लेकर  नैनीताल हाईकोर्ट ने सरकार को करारा झटका दिया है। 


हाईकोर्ट ने मामले को लेकर अपना फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने कहा कि तीन बच्चों वाले चुनाव लड़ सकते हैं। सरकार ने नियम लागू किया था कि तीन बच्चों वाले चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। कोर्ट ने कहा कि 25 जुलाई 2019 से पहले जिनके भी तीन बच्चे होंगे। वो सभी चुनाव लड़ सकते हैं। हाईकोर्ट में कांग्रेस और कई प्रधानों व संगठनों ने याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि सरकार ने फैसला नियम विरुद्ध लागूं किया है। 

हालांकि लोगों ने फैसले को सही भी माना था, लेकिन सरकार के लागूं करने के तरीके को लेकर सवाल खड़े किये थे। होईकोर्ट ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। आज कोर्ट ने मामले को लेकर अपना फैसला सुना दिया है। इस फैसले के बाद उन लोगों को बड़ी राहत मिली है, जिन लोगों को तीन बच्चे होने के चलते चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था।
पंचायत चुनाव को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, तीन बच्चों वाले लड़ पाएंगे चुनाव पंचायत चुनाव को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, तीन बच्चों वाले लड़ पाएंगे चुनाव Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Thursday, September 19, 2019 Rating: 5

इतिहास की सबसे लंबी एफआईआर, लगेंगे सात दिन, साॅफ्टवेयर फेल

काशीपुर: काशपुर कोतवाली में एक ऐसी एफआईआर लिखी जा रही है, जिसे लिखते हुए चार दिन हो गए हैं। बावजूद अब तक एफआईआर पूरी नहीं हो सकी है। बताया जा रहा है कि इसे लिखने में अभी दो से तीन दिन और लग सकते हैं। इतना ही नहीं। इसे इतिहास की अब तक की सबसे लंबी एफआईआर भी माना जा रहा है। आपको बतातें हैं कि इसमें क्या खास है और किसी केस में इतनी लंबी और बड़ी एफआईआर लिखी जा रही है। 


 
उत्तराखंड की काशीपुर कोतवाली के इतिहास में पहली बार सबसे बड़ी एफआईआर लिखी जा रही है। रिपोर्ट लिखते-लिखते चार दिन गुजर चुके हैं। इसे पूरा लिखने में दो से तीन दिन का समय और लग सकता है। इसकी एक और खास बात ये है कि ये अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भाषाओं में लिखी जा रही है, जिससे एफआईआर लिखने वाले पुलिसकर्मियों के भी पसीने छूट रहे हैं। 

स्वास्थ्य विभाग की टीम ने अटल आयुष्मान योजना के तहत रामनगर रोड स्थित एमपी अस्पताल और तहसील रोड स्थित देवकी नंदन अस्पताल में भारी अनियमितताएं पकड़ी थीं। जांच में दोनों अस्पतालों के संचालकों की ओर से नियम विरुद्ध रोगियों के फर्जी उपचार बिलों का क्लेम वसूलने का मामला पकड़ में आया था। एमपी अस्पताल में रोगियों के डिस्चार्ज होने के बाद भी मरीज कई-कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती दिखाए गए। आईसीयू में भी क्षमता से अधिक रोगियों का उपचार दर्शाया गया। डायलिसिस केस एमबीबीएस डॉक्टर की ओर से किया जाना बताया गया और वो भी अस्पताल की क्षमता से कई गुना।

एफआईआर दर्ज करने में एक नहीं कई दिक्कतें हैं। एबसे बड़ी सस्या ये है कि जिस साफ्टवेयर में एफआईआर दर्ज की जाती है। उसकी क्षमता दस हजार शब्दों से अधिक नहीं है। मामले की एक तहरीर 64 पृष्ठ की हैं, तो दूसरी तहरीर करीब 24 पेजों की है। तहरीरों में अधिक विवरण होने के कारण इन अस्पताल संचालकों के खिलाफ ऑनलाइन एफआईआर दर्ज नहीं हो सकती। धोखाधड़ी के मामले में दो अस्पताल संचालकों के विरुद्ध दर्ज एफआईआर की विवेचना करने वाले अधिकारी को पापड़ बेलने पड़ेंगे। मुकदमा दर्ज होने पर इनकी विवेचना को लेकर भी पुलिस पशोपेश की स्थिति में है।
इतिहास की सबसे लंबी एफआईआर, लगेंगे सात दिन, साॅफ्टवेयर फेल इतिहास की सबसे लंबी एफआईआर, लगेंगे सात दिन, साॅफ्टवेयर फेल Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Thursday, September 19, 2019 Rating: 5

उत्तराखंड में NRC: तीन पुश्तें मर-खप गयीं, लेकिन रहोगे घुसपैठिया ही

  • रूपेश कुमार सिंह

‘‘जन्मजात भारत के नागरिक हैं,’’ कह देना ही पर्याप्त नहीं होगा। नागरिकता साबित करने के लिए आधा दर्जन से ज्यादा प्रमाण देना होगा। तब जाकर सरकार आपको देश का नागरिक मानेगी। राज्य में यदि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एन आर सी) लागू हुआ तो लाखों लोग घुसपैठिया करार दे दिये जायेंगे। यह बात दीगर है कि तीन पुश्तें यहीं मर-खप गयीं हो, लेकिन फिर भी बाहरी माने जाओगे। खदेड़ दिये जाओगे। ऐसा सिर्फ मुसलमान, बंगाली मुसलमान, रोहिंग्या मुसलमान के साथ नहीं होगा। हिन्दू बंगाली, नेपाली, देशी, वन गुज्जर, बुक्सा-थारू, बंगाली शरणार्थियों, खत्ता निवासी, आदिवासियों के अलावा अन्य लोग भी प्रभावित होंगे।


देश में एनआरसी लागू करना भाजपा सरकार का बड़ा एजेंडा है, जिसे सितम्बर 2020 तक जमीन पर पूरी तरह से उतारा जायेगा। ऐसा साफ संकेत गृहमंत्री अमित शाह दे चुके हैं। इसी क्रम में त्रिवेन्द्र सरकार ने मसौदा सामने रखा है। राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर एनआरसी को असम सहित देश के संसाधन संपन्न राज्यों, जहां आदिवासी रहते हैं, वहां लागू किया जायेगा। मकसद साफ है राष्ट्रीय संसाधनों की लूट। पूंजीपतियों को खुली छूट देने के लिए जंगल खाली कराने पर आमादा है सरकार। खैर, पहले असम की बात करते हैं। असम के मूलनिवासी बोड़ो, होजोंग और रियांग आदिवासी एनआरसी से बाहर कर दिये गये।

नागरिकता का सबूत नहीं दे पाने के चलते असम में 19 लाख लोगों को घुसपैठियों की कतार में खड़ा कर दिया गया। इसमें आपातकाल के दौरान देश के राष्ट्रपति रहे डाॅ0 फकरूद्दीन अली अहमद का परिवार भी शामिल है। इसके अलावा पुलिस, फौज, सरकारी नौकरी कर चुके हजारों लोग भी एनआरसी से बाहर पाये गये। उत्तराखण्ड में भाजपा नेताओं ने झूठ बोला, ‘‘असम में सिर्फ बंगाली मुसलमान और रोहिंग्या मुसलमान को ही चिन्हित किया गया है। 

बंगाली हिन्दुओं को डरने की आवश्कता नहीं है।’’ जब संख्या का सरकारी आकड़ा जारी हुआ तो सबके होश उड़ गये। 19 लाख घुसपैठियों में सात लाख बंगाली हिन्दू, पांच लाख नाॅन बंगाली/नाॅन असमिया हिन्दू, पांच लाख मुसलमान और शेष आदिवासी शामिल हैं। तस्बीर साफ होने पर उत्तराखण्ड और उत्तर-प्रदेश में रहने वाले लाखों बंगाली शरणार्थियों में हड़कंप मच गया। अब प्रदेश सरकार की मंशा साफ होने से बंगाली समाज खौफजदा है। गौरतलब है कि गोविन्द बल्लभ पंत की पहल पर अविभाजित उत्तर-प्रदेश में सबसे पहले 1952 में पूर्वी बंगाल के विभाजन पीड़ित विस्थापित हिन्दुओं को पश्चिम पाकिस्तान से आये हिन्दू और सिख शरणार्थियों के साथ बसाया गया था। भारत विभाजन के वक्त भारत सरकार और राष्ट्रीय नेताओं ने पाकिस्तान के विभाजन पीड़ित हिन्दुओं को भारतीय नागरिकता देने और नये सिरे से बसाने का वायदा किया था। यहीं नहीं सरदार बल्लभ भाई पटेल के निधन के बाद 1955 में भारत के गृहमंत्री बने गोविन्द बल्लभ पंत ने देश भर में विभाजन पीड़ित शरणार्थियों के पुनर्वास का काम पूरा कराया, जिसमें दण्डकारणर्य प्रोजेक्ट के पांच आदिवासी बहुल राज्य शामिल हैं।

असम एक ऐसा प्रदेश है, जहां 1951 में एनआरसी तैयार हुई। 1985 में असम समझौता के तहत बांग्लादेश की स्वतंत्रता से एक दिन पहले मतलब 24 मार्च 1971 तक के प्रमाण देने वालों को ही भारत का नागरिक माना गया। तब से ही वहां असमंजस की स्थिति बरकरार है। दरअसल 1955 के नागरिकता कानून के तहत भारत में जन्म लेने वाला भारत का जन्मजात नागरिक माना जाता था। इसके अलावा इस कानून के तहत पूर्वी बंगाल, पश्चिम पाकिस्तान और वर्मा के विभाजन पीड़ित शरणार्थियों को भारत का नागरिक माना गया था। लेकिन अटल सरकार में गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने 2003 में नागरिकता संशोधन कानून बनाया। इसके तहत जन्मजात नागरिकता खत्म कर दी गयी और शरणार्थियों की नागरिकता को भी समाप्त कर दी गयी। नागरिकता चूंकि जन्मजात नहीं है इसलिए अब हर व्यक्ति को नागरिकता लेनी होगी। 

भाजपा सरकारों के शासनकाल में एनआरसी का मुद्दा हमेशा गरमाता रहा है। ऐसा राजनीतिक फायदे के लिए भी होता रहा है। उत्तराखण्ड में तो बंगाली समाज को एनआरसी का भय दिखाकर भाजपा दो दशक से फायदा ले रही है। असम में नागरिकता और एनआरसी में हिन्दुओं को भारतीय नागरिकता देने के वायदे पर हिन्दू शरणार्थियों के समर्थन से भाजपा को सत्ता मिली। पश्चिम बंगाल में भी असम की तरह एनआरसी कार्ड से भाजपा सत्ता हथियाना चाहती है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली कामयाबी के पीछे यही मुद्दा प्रमुख रहा है। भाजपा की ओर से देशभर में एक और मिथ्या प्रचार किया जा रहा है, ‘‘एनआरसी के तहत सिर्फ मुसलमानों को देश से बाहर किया जायेगा।’’ जबकि इस कानून से सबसे ज्यादा आदिवासी समुदाय प्रभावित हो रहा है।

1947 के विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान से बंगाली और पंजाबी/सिख लोग उत्तर-प्रदेश में आये। पंजाबी और सिख समाज के लोगों को तो सरकार ने तत्काल नागरिकता देने के साथ जमीन देकर पुनर्वास कराया। साथ ही पाकिस्तान में मौजूद संपत्ति के हिसाब से मुआवजा भी दिया। लेकिन बंगाली समाज के लोगों को ट्रांजिट कैम्प में रखा। उन्हें अनुग्रहित राशि दी गयी। जमीन भी बाद में दी गयी, लेकिन नागरिकता प्रमाण पत्र नहीं दिया। अधिकांश को जमीन नहीं मिली, वे भूमिहीन खेतिहर मजदूर बनकर रह गये। बाद में उनमे से अनेक लोगों ने अपनी मेहनत से जमीन-जायदाद भी हासिल कर ली। उन्हें शरणार्थी ही माना गया। आज तक बंगाली समाज शरणार्थी ही है। 1971 में बांग्लादेश बनने के समय भी बड़ाी तादात में बंगाली लोग आये, लेकिन उन्हें वो सुविधाएं भी नहीं दी गयी जो 1947 के बाद आने वाले लोगों को मिलीं। 1971 के बाद आने वाले बंगाली शरणार्थियों की तादाद बहुत ज्यादा है।

यदि उत्तराखण्ड में भी 1971 के मानक को माना गया तो 71 से पहले के भूमि दस्तावेज, बोर्ड या विश्वविद्यालय प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण पत्र, बैंक, एलआईसी, पोस्ट आॅफिस रिकार्ड, राशन कार्ड, मतदाता सूची में नाम, कानूनी रूप से स्वीकार अन्य दस्तावेज, विवाहित महिलाओं के लिए एक सर्कल अधिकारी या ग्राम पंचायत सचिव द्वारा दिया प्रमाण पत्र आदि दिखा पाना लाखों लोगों के लिए संभव नहीं होगा। इससे हिन्दू बंगाली, बुक्सा-थारू, नेपाली, वन गुज्जर, मुसलमान, खानाबदोश जिन्दगी बसर करने वाले, भूमिहीन, मजदूर, भिखारी आदि प्रभावित होंगे। पहाड़ में भी आपदा के दौरान अभिलेख नष्ट हो जाने वालों को भी परेशानी होगी। ऐसे में नागरिकता का प्रमाण न दे पाने वाले लाखों लोगों का क्या होगा? वास्तव में एनआरसी पर बहस होनी चाहिए। सरकार का मसौदा अभी साफ नहीं है, जनता के बीच पक्ष-विपक्ष मुखर है। कुल मिलाकर भ्रम की स्थिति बरकरार है। 

उत्तराखण्ड में न बांग्लादेशी मुसलमान हैं और न ही रोहिंग्या मुसलमान, तो फिर बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ इस युद्धघोषणा का मतलब क्या है? भाजपा नेता दावा कर रहे हैं कि हिन्दू शरणार्थी घुसपैठिया नहीं, भारतीय नागरिक हैं। अब्बल तो भारतीय संविधान, कानून के राज, अन्तर्राष्ट्रीय कानून और मानवाधिकार कानून के तहत किसी भी समुदाये विशेष को नागरिक मानना और किसी दूसरे को न मानना गलत है। फिर असम में तो हिन्दू शरणार्थी और गैर शरणार्थी, असमिया मूल के लोग और आदिवासी लाखों की तादाद में एनआरसी से बाहर हैं। इसलिए यह समझना भी खुशफहमी है कि सिर्फ बंगाली शरणार्थी इससे प्रभावित होंगे। उत्तराखण्ड की भू-माफिया राजनीति पहाड़ के जल, जंगल, जमीन से कारपोरेट हित में मूल निवासियों को बेदखल करने के लिए असम और आदिवासी बहुल राज्यों की तरह यहां भी एनआरसी का इस्तेमाल कर सकती है। क्योंकि अधिकांश आम नागरिकों में जन्मजात नागरिक होने का भ्रम होने की वजह से उन्होंने नागरिकता के दस्तावेज अर्जित नहीं किये हैं या फिर सहेज कर नहीं रखे हैं।

संपर्क - 9412946162
उत्तराखंड में NRC: तीन पुश्तें मर-खप गयीं, लेकिन रहोगे घुसपैठिया ही उत्तराखंड में NRC:  तीन पुश्तें मर-खप गयीं, लेकिन रहोगे घुसपैठिया ही Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Tuesday, September 17, 2019 Rating: 5

NRC के बहाने मूल निवास कानून की बात

राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानि एनआरसी। देश की रक्षा और सुरक्षा बहुत जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी उत्तराखंड के असली मूल निवासियों और स्थाई निवासियों के अधिकार भी हैं, जिन पर राजनीतिक दलों ने सरकरों में रहते हुए अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए खुले बाजार की वस्तु बनाकर रख दिया। दरअसल, एनआरसी के बहाने ये जानना भी जरूरी है कि उत्तराखंड को अपना मूल निवासी कानून होना चाहिए। मूल निवासी होने का संबंध भी सीधा-सीधा नागरिकता से ही है। 


 उत्तराखंड को लेकर चिंता

उत्तराखंड में पहले 26 जनवारी 1950 तक उत्तराखं डमें रह रहे लोगों को मूल निवासी माना जाता था। लेकिन बाद में राजनीति दलों ने इस मसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि राज्य निर्माण के दिन यानि ना नवंबर 2000 तक जो लोग राज्य में निवास कर रहे थे, वही मूल निवासी माने जाएंगे। सवाल यह है कि आखिर कैसे उन लोगों को मूल निवासी माना जा सकता है, जो केवल किराये के मकानों में यहां रह रहे थे। बाहरी लोगों को उत्तराखंड में राज्य बनने की सुगबुगाहट के साथ ही शुरू हो गया था। बड़ी संख्या में बाहरी लोग यहां चले आए थे और यहीं को होकर रह गए।

केवल मूल निवास नहीं, रोजगार भी सवाल

सवाल केवल मूल निवासी का नहीं। सवाल रोजगार का भी है। सरकार ने बाहरी लोगों को भी रोजगार के लिए योग्य माना है। जबकि लंबे समय से मांग चल रही है कि केवल उत्तराखंड के मूल निवासियों को ही राज्य सेक्टर में नौकरियां दी जाएं। राज्य में सबसे ज्यादा पलायान भी रोजगार के लिए ही होता है। सरकार को मूल निवासी कानून में संशोधन करना चाहिए। जिससे उत्तराखंड के मूल निवासियों को उनके अधिकार मिल सकें।

भू-कानून भी चाहिए

उत्तराखंड में हमेशा से भू-कानून की मांग उठती रही है, लेकिन सरकारों ने जनता की मूल भावना के विरुद्ध पहाड़ों में जमीनों की खरीद-फ्रोख्त की खुली छूट दी। वर्तमान भाजपा सरकार ने भी वही किया। सबसे आसान तरीका हिमाचल की तरह ही उत्तराखंड में भी भू-कानून लागू कर देना चाहिए। इसके तहत कोई भी बाहरी व्यक्ति उत्तराखंड में जमीन नहीं खरीद सकता। केवल मूल निवासी ही जमीन खरीद-बेच सकते हैं। सरकार को मौजूदा भू-कानून में संशोधन लाना चाहिए। हिमाचल और उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति भी एक जैसी ही है। 
                                                                            ...प्रदीप रावत (रवांल्टा)
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उत्तम पोषण स्वस्थ शरीर का आधारः प्रो. जानकी पंवार

नरेंद्रनगरः धर्मानन्द उनियाल राजकीय महाविद्यालय नरेंद्रनगर में NSS यूनिट ने स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम का अयोजन किया। इस अवसर पर महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. जानकी पंवार ने जागरूकता कार्यक्रम में छात्रों को सम्बोधित करते हुए कहा कि स्वस्थ शरीर और मस्तिष्क के लिए पोषक तत्वों की उचित व संतुलित मात्रा आवश्यक है। 


भारत सरकार के युवा और खेल मंत्रालय के तत्वावधान में राष्ट्रीय सेवा योजना के क्षेत्रीय निदेशालय लखनऊ की ओर से माह सितम्बर को पोषण माह के रूप में मनाए जाने की घोषण की है। इसके तहत महाविद्यालय की एनएसएस यूनिट ने कालेज के छात्रों को पोषण और डाइट की सलाह देने से पहले एन्थ्रोपोमेट्रिक्स मेजरमेंट का कार्यक्रम आयोजित किया गया। 

इसके अंतर्गत छात्रों की लम्बाई, भार, कमर एवं कूल्हों की माप ली गई। गृह विज्ञान विभाग की डॉ. सोनी तिलारा ने बतया कि छात्रों की एन्थ्रोपोमेट्रिक्स मेजरमेंट आंकडों के विश्लेषण के बाद उन्हें व्यक्तिगत तौर डाइट एवं पोषण के सुझाव दिए जाएंगे। इस अवसर पर एनएसएस यूनिट की कार्यक्रम अधिकारी डॉ. आराधना सक्सेना के अलावा डॉ. शैलजा रावत, डॉ. हिमांशु जोशी, डॉ. विक्रम सिंह बर्त्वाल, डॉ. मनोज सुन्द्रियाल मौजूद रहे।

उत्तम पोषण स्वस्थ शरीर का आधारः प्रो. जानकी पंवार उत्तम पोषण स्वस्थ शरीर का आधारः प्रो. जानकी पंवार Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Monday, September 16, 2019 Rating: 5

पति को बस पति रहने दो, प्रधान पति मत बनने देना

त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का एलान हो गया है। पुरुषों के साथ महिलाएं उनके लिए आरक्षित सीटों पर तो चुनाव लड़ ही रही हैं। साथ ही अनारक्षित सीटों पर भी ताल ठोक रही हैं। अच्छी बात है। महिलाओं को आगे आना चाहिए। आ भी रही हैं, लेकिन उनके पीछे चुनाव प्रचार में खड़े उनके पति चुनाव प्रचार तक तो पीछे रहते हैं, चुनाव जीतते ही प्रधान पति के रोल में अपनी पत्नी को पीछे धकलेते हुए खुद आगे निकल आते हैं...। 


 
महिलाओं को इस बार संकल्प लेना चाहिए कि उन्होंने अपने पति को पति ही रहने देना है। प्रधानपति कभी नहीं बनने देना। जो काम करेंगी, अपने बूते करेंगी। वो खुद फैसले लेंगी, उनके पति उनके हिस्से को फैसला नहीं लेंगे। तय करें कि प्रधान चुनी गई हैं, तो वहीं प्रधान रहेंगी। प्रधान बनने के बाद पति को आगे कर खुद पीछे नहीं रहेंगी। लीड करेंगी। अपने पति को भी और अपनी ग्राम पंचायत को भी। 


सीनियर जर्नलिस्ट और महिला चिंतक वर्षा सिंह ने 14 सितंबर को महिला उत्तरजन की ओर से आयोजित कार्यक्रम में अलग-अलग उदाहरण देकर बताया कि कैसे प्रधान पति अपनी प्रधान पत्नियों को पीछे धकेलकर खुद आगे आ जाते हैं। जबकि समाज में सामान्यतौर पर जब भी कोई बात करते हैं, तो खुद को महिलाओं का हिमायती बताते नहीं थकते। उनको मानना है कि महिलाओं को खुद के अधिकारों के लड़ना चाहिए। मजबूती से मुकाबला बरना चाहिए। पति इसलिए नहीं होते के वो अपनी पत्नी के अधिकारों पर अपना अधिकार समझे। किसी भी महिला के अधिकार सिर्फ उसके अधिकार हो सकते हैं। किसी और के नहीं।  

यह स्थिति केवल प्रधानपतियों की नहीं, महिला क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायतों से लेकर विधासभा तक हैं। जहां महिलाओं के पति ही तय करते हैं कि उनका फैसला क्या होना चाहिए। अगर कोई महिला चुनाव लड़ने जा रही है, तो पहले उनको ये तय करना होगा कि अगर वो चुनाव जीतती हैं, तो वही सारे फैसले खुद लेंगी। किसी फैसले या काम के लिए सुझाव अपने पति से ले सकती हैं, जिन लोगों को वो प्रतिनिधित्व करने के लिए चुनावी मैदान में उतरी, उनका सुझाव अधिक महत्वपूर्ण होगा। तय महिलाओं को करना है कि पतियों के लिए चुनाव लड़ रही हैं या खुद के लिए...। अपने गांव, क्षेत्र और जिले के लिए या फिर विधानसभा के लिए...।
...प्रदीप रावत (रवांल्टा)
पति को बस पति रहने दो, प्रधान पति मत बनने देना पति को बस पति रहने दो, प्रधान पति मत बनने देना Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, September 15, 2019 Rating: 5
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