आंइर दादा तौं कथुक डर...तैयार रैयांण नाचण ली

देहरादून: आंइर दादा तौं कथुक डर...। महाबीर रवांल्टा कु नऊं त सबुनी सुंणिलु। त्यूंकि एक कतिवा ती। त्यां कविता फांडु लोक क गितेर अनिल बेसारी नि एक गीत बंणाई। आंइर दादा तौं कथुक डर..।। गीत तैयार होई गैंणू। आगिल मैन 23 तारीक कु गीत सबु बिड़ पौंछी जालु। खूब सुण्यांण अर ओरु बिड़ बि सुंण्यांण। 



यु जु गीत सु, गैंणी जंण आमार सुईन कविता संग्रह माथी लेखियूं। तेखिनी पढ़ी अनिल बेसारी नि सु गीत। तेइक बाद तेइनी महाबीर रवांल्टा किनी गीत बणाण क बार मा छुंई लाई। त्युनी भी झट बोली कि बणांदु काना माता गीत बणा ज। तेइक बाद तेइनी काम शुरू कर। पाछिल साल रवांई लोक महोत्सव क दिना तेइनी मंच माथ नि पैलीबार लाई सु गीत। कवि सम्मेलन की शुरूआत तेई गित किनी हईती। अब सु गीत क रूप मां रिकार्ड होई किनी आण लगियुं। 

साज-बाज विकास बडेड़ी ने करी तैयार। गित की परिकल्ना रवांई लोक महोत्सव क संयोजक शशि मोहन रवांल्टा की। प्रबंधन नरेश नौटियाल देखण लगियुं। हेर-देख प्रेम पंचोली करने लगियुं। जु पिक्चर का बाजली त्यां पिक्चरी की निर्देशन वरिष्ठ पत्रकार मनोज इष्टवाल करलु। येई सार कामकु सर्वेसर्वा टीम रवांई लोक महोत्सव करनी लगीं।
आंइर दादा तौं कथुक डर...तैयार रैयांण नाचण ली आंइर दादा तौं कथुक डर...तैयार रैयांण नाचण ली Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Wednesday, May 22, 2019 Rating: 5

50 साल के इस शख्स के लिए एवरेस्ट चढ़ना खेल, 24 बार फतह कर चुके एवरेस्ट

काठमांडू: नेपाल के 50 वर्षीय पर्वतारोही कामी रीता शेरपा ने एक हफ्ते के अंदर दूसरी बाद माउंट एवरेस्ट की सफल चढ़ाई की है। कामी रीता ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी की रिकॉर्ड 24वीं बार चढ़ाई कर अपना ही रिकॉर्ड तोड़ा। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर वे 24वीं बार पहुंचे। वे यह कारनामा करने वाले दुनिया के इकलौते पर्वतारोही हैं। 15 मई को वे 23वीं बार माउंट एवरेस्ट पर पहुंचे थे। कामी 1994 में पहली बार 25 साल की उम्र इस चोटी पर पहुंचे थे।


एवरेस्ट के शिखर पर सबसे ज्यादा बार पहुंचने का रिकॉर्ड उनके नाम है। उन्होंने इस बार भारतीय पुलिस दल को एवरेस्ट तक पहुंचने में गाइड का काम किया। वह गत 15 मई को इस चोटी पर 23वीं बार पहुंचे थे।
पर्वतारोहण कंपनी सेवन समिट ट्रेक्स के चेयरमैन मिंग्मा शेरपा ने बताया कि कामी रीता मंगलवार सुबह 6.38 बजे नेपाल की तरफ से एवरेस्ट पर पहुंचे। वह भारतीय पुलिस दल को गाइड कर रहे थे। नेपाली शेरपा विदेशी पर्वतारोहियों के लिए गाइड का काम करते हैं। वह उनके लिए एवरेस्ट पर चढ़ने का मार्ग तैयार करते हैं। इसी माह 14 मई से शुरू हुए इस सीजन में दुनियाभर के करीब एक हजार पर्वतारोही एवरेस्ट की चोंटी फतह करने की कोशिश कर रहे हैं।


मिंग्मा ने बताया कि कामी 25 बार माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई करना चाहते हैं। वह 1994 में पहली बार एवरेस्ट पर चढ़े थे। 1995 में हिमस्खलन और खराब मौसम के कारण उनका अभियान पूरा नहीं हो पाया था। लेकिन उसके बाद से एवरेस्ट पर चढ़ने का उनका सिलसिला लगातार जारी है। कामी 8,000 मीटर से ऊंची विश्व की कई दूसरी कई चोटियां भी फतह कर चुके हैं। इनमें के-2, अन्नपूर्णा, होस्ते और चो-ओयू शामिल हैं।
50 साल के इस शख्स के लिए एवरेस्ट चढ़ना खेल, 24 बार फतह कर चुके एवरेस्ट 50 साल के इस शख्स के लिए एवरेस्ट चढ़ना खेल, 24 बार फतह कर चुके एवरेस्ट Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Tuesday, May 21, 2019 Rating: 5

इंतजार खत्म, 30 मई को आएगा उत्तराखंड बोर्ड परीक्षाओं का रिजल्ट

देहरादून: उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद ने बार्ड परीक्षाओं के परिणाम जारी करने की तिथि का एलान कर दिया है। बार्ड 30 मई को 10वीं और 12वीं का रिजल्ट सुबह साढ़े 10 बजे जारी करेगा।  शिक्षा परिषद की सचिव नीता तिवारी ने बताया कि सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। परिणाम परिषद की वेबसाइट www.ubse.uk.gov.in पर जारी किए जाएंगे। 


उत्तराखंड बोर्ड परीक्षा 01 मार्च से 26 मार्च, 2019 तक आयोजित की गई थी। कक्षा 10वीं में लगभग 1,49,927 छात्र और 12वीं में लगभग 1,24,867 छात्रों ने पंजीकरण कराया था। रिजल्ट का ढाई लाख से अधिक परीक्षार्थियों को रिजल्ट का बेसब्री से इंतजार है। इस साल हाईस्कूल में 149950 और इंटरमीडिएट में 124867 छात्र-छात्राओं ने परीक्षा दी थी। 

परीक्षा के लिए प्रदेश में 1317 केंद्र बनाए गए थे। इसमें 231 संवेदनशील और 27 अतिसंवेदनशील केंद्र थे। हाईस्कूल परीक्षा में 149950 परीक्षार्थी परीक्षा देंगे, जिनमें 76902 छात्र और 73048 छात्राएं शामिल थीं। संस्थागत 144853 और व्यक्तिगत 5097 छात्र शामिल हुए। इंटरमीडिएट में 124867 परीक्षार्थी पंजीकृत थे, जिनमें 61279 छात्र और 63588 छात्राएं शामिल हैं। इनमें संस्थागत 117719 और व्यक्तिगत 7148 छात्र शामिल हुए।
इंतजार खत्म, 30 मई को आएगा उत्तराखंड बोर्ड परीक्षाओं का रिजल्ट इंतजार खत्म, 30 मई को आएगा उत्तराखंड बोर्ड परीक्षाओं का रिजल्ट Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Monday, May 20, 2019 Rating: 5

ताम्रपत्र लौटाएगा स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा का परिवार, सरकार परिवार को नहीं मानती उत्तराधिकारी

  • मयंक मैनाली,  रामनगर
देश की आजादी में सैकड़ों रणबांकुरे ने अपने प्राणों की आहुति दे दी।  देश को आजाद कराने का सपना संजोए जिन नायकों ने अपना पूरा जीवन होम कर दिया। लेकिन इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि देश की भावी पीढ़ी आजादी की सांस ले सके इसलिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने  वाले बलिदानियों के परिवारों को आज आजाद भारत की सरकार स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का आश्रित नहीं मानती है। मामला नैनीताल जनपद के रामनगर विधानसभा के  ग्राम सांवल्दे का है। मूल रूप से अल्मोड़ा जनपद के रानीखेत क्षेत्र के ग्राम गुमटा निवासी  स्व. नारायण दत्त बेलवाल पुत्र स्व. कुलोमणि बेलवाल ने भारतीय स्वतंत्रतता संग्राम में अपने को झोंक दिया । लेकिन आज उनके आश्रित खुद को स्वतंत्रतता संग्राम सेनानी का आश्रित घोषित करवाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।
इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि अंग्रेजी हुकुमत से देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले आजादी के सेनानी के परिवार को सरकार आश्रित नहीं मानती। मूल रूप से अल्मोडा जनपद के रानीखेत के ग्राम गुमटा निवासी स्वर्गीय नारायण दत्त बेलवाल ने अंग्रेजों से देश को आजाद कराने के अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। अल्मोडा जनपद के ग्राम गुमटा निवासी वर्तमान में रामनगर के ग्राम सांवल्दे पश्चिम में निवास कर रहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के पुत्र गणेश बेलवाल बताते हैं कि उनके पिता स्वर्गीय नारायण दत्त बेलवाल पुत्र स्वर्गीय कुलोमणि बेलवाल ने आजादी की लडाई में बढ-चढ कर प्रतिभाग किया था । वर्ष 1942 में अंग्रेजों भारत छोडों के आंदोलन में अंग्रेजी सरकार के विरूद्व डटकर लोहा लेने के कारण अंग्रेजी हुकुमत ने स्वतंत्रता सेनानी बेलवाल को उस समय अल्मोडा कारागार में बंद कर दिया, जहां उन्हें कडी यातनाएं दी गई । 
लेकिन, आजादी की तमन्ना के चलते वह जेल से रिहा होने के बाद भी आंदोलनों में सक्रिय रहे। इस दौरान वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अगुवाई में चले आंदोलनों में बढ-चढ कर प्रतिभाग करते रहे । वह भारत छोडो आंदोलन सहित कुली बेगार, आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। इसी दौरान वह कुमांऊ केसरी स्वर्गीय बद्रीदत्त पांडे के संपर्क में भी रहे । उनके पुत्र बताते है कि आजादी में उनकी सक्रियता को देखते हुए अंग्रेजों ने उनको बरेली जेल में बंद कर दिया । बावजूद इसके उनका जज्बा कम नहीं हुआ। कई प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नेतृत्व में चले आंदोलन में भागीदार रहने के चलते उन्होंने स्वतंत्रता की लौ को बुझने नहीं दिया। इसी के चलते वर्ष 1947 में वह देश की आजादी के गवाह बने। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को देखते हुए भारत की प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र भेंट किया। 
 1982 में उनका निधन हो गया । लेकिन उनके निधन के बाद से ही सरकार ने न तो उनके परिवार और न ही उनकें आश्रितों की कोई सुध ली। आज बेहद मुफलिसी का जीवन गुजार रहे उनके परिजन दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर हैं। इस दौरान मामला प्रकाश में आने पर कुछ समाजसेवियों की सहायता से वह जिलाधिकारी,नैनीताल से भी मिले। जिलाधिकारी ने भी उन्हें उचित कार्यवाही का आश्वासन दिया। परंतु इसके बावजूद उन्हें आज तक स्वतंत्रता सेनानी का उत्तराधिकारी सरकार नहीं मानती है। अब सिस्टम से आहत होकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के आश्रितों ने ताम्रपत्र लौटाने की घोषणा की है।
डीएम और सीएम हैल्पलाइन से भी मदद नहीं मिली। स्वतंत्रता सेग्राम सेनानी के पुत्र गणेश चंद्र बेलवाल बताते हैं कि उन्होंने जनवरी 2019 में जिलाधिकारी से पेंशन जारी करने की गुहार लगवाई थी। जिलाधिकारी के आश्वासन के बावजूद इसके उन्हें कोई मदद नहीं मिल सकी । वहीं उन्होंनें सीएम हैल्पलाइन पर भी मदद मांगी थी। लेकिन सीएम हैल्पलाइन ने भी समाज कल्याण विभाग को मामला हस्तांतरित कर कुछ समय बाद ही समस्या निस्तारण की बात कह कर फाइल बंद कर दी। वहीं सेनानी के पुत्र गणेश बेलवाल का कहना है कि वह इस संबध में उपजिलाधिकारी समेत कई अन्य अधिकारियों से संपर्क साध चुके हैं। परन्तु कोई सुनवाई नहीं हुई है।
ताम्रपत्र लौटाएगा स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा का परिवार, सरकार परिवार को नहीं मानती उत्तराधिकारी ताम्रपत्र लौटाएगा स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा का परिवार, सरकार परिवार को नहीं मानती उत्तराधिकारी  Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, May 19, 2019 Rating: 5

शिव का अनादर है प्रधानमंत्री का लाल कालीन पर चलकर उन तक जाना...

  • रविश कुमार

सब कुछ ड्रामा जैसा लगता है. सारा ड्रामा इस यक़ीन पर आधारित है कि जनता मूर्ख है. उसे किसी बादशाह पर बनी फिल्म दिखाओ या ऐसा कुछ करो कि जनता को लगे कि वह किसी बादशाह को देख रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केदारनाथ गए हैं. पूरी यात्रा को एक सेट में बदल दिया गया है ताकि न्यूज़ चैनलों पर लगातार कवरेज़ हो सके. भारत की भोली जनता को बताया जा सके कि सत्ता और ऐश्वर्य से दूर कोई आम भक्त की तरह धार्मिक यात्रा कर रहा है. मगर हो रहा है ठीक उलट.







जो लोग ईश्वर को मानते हैं, वो यही बताते हैं कि उसके दरबार में सब बराबर हैं. हमने यही देखा है. बड़े बड़े नेता पहले ही लाइन तोड़ कर मंदिर में आगे चले गए मगर पूजा के लिए उसी तरह साधारण नज़र आए. ऐसा कभी नहीं हुआ कि केदारनाथ के दर्शन के लिए जाते किसी साधारण भक्त के लिए लाल कालीन बिछी है. उनके लिबास बता रहे हैं कि भक्ति भी किसी टीवी सीरीयल का अभिनय है. प्रधानमंत्री भक्ति के नाम पर अभिनय कर रहे हैं.
न्यूज़ चैनलों ने इस देश के लोकतंत्र और मर्यादा को बर्बाद कर दिया है. आम लोगों की तकलीफ के लिए कार्यकारी संपादक स्टुडियो से बाहर नहीं जाते. ओडिशा में लोग तबाही से जूझ रहे हैं वहां कोई चैनल नहीं है. मगर केदारनाथ के ड्रामे को कवर करने के लिए ज़ोर देकर बताया जा रहा है कि हमारे कार्यकारी संपादक मौके पर मौजूद हैं.
क़ायदे से प्रधानमंत्री का यह स्पेस प्राइवेट होना चाहिए. मगर उन्हें पता है कि मतदान होना है. उनके होने से उनकी गुलामी का आदी हो चुका मीडिया लगातार शिव पर कार्यक्रम बनाएगा. ब्रह्म कमल के गुण गाएगा. पुजारी के पास बोलने के लिए कुछ नहीं है. कैमरे में प्रधानमंत्री गंभीर दिख रहे हैं. पुजारी बता रहे हैं कि जैसे मायके में बेटी आकर खुश होती है वैसे चौथी बार केदार आकर खुश हैं. कैमरे के सामने मोदी विकास कार्यों की समीक्षा का अभिनय कर रहे हैं. उनकी हर गतिविधि को ख़बर के तौर पर पेश किया जा रहा है. कानून भले ही कोई नुस्ख न निकाल पाए मगर नैतिकता का तकाज़ा कहता है कि प्रधानमंत्री ने ड्रामा का अति कर दिया है.
चुनाव आयोग में बग़ावत है. यह बेहद गंभीर ख़बर है. एक चुनाव आयुक्त ने आयोग पर आरोप लगाया है कि यह संस्था नियमों के हिसाब से काम नहीं कर रही है. न्यूज़ चैनल केदारनाथ का कवरेज दिखा रहे हैं. प्रधानमंत्री अपने साथ सारे कैमरे केदारनाथ ले गए हैं.
शिव तक पहुंचने का रास्ता लाल कालीन से होकर जा रहा है. बनारस में प्रधानमंत्री विश्वनाथ धाम कोरिडोर के लांच में गए थे. जहां उन्होंने कहा कि आज बाबा भी मुक्त हुए. अब वो भी खुली हवा में सांस लेंगे. जो बाबा विश्वनाथ पूरी दुनिया को मुक्ति देते हैं, उन्हें मुक्ति देने का ऐलान प्रधानमंत्री मोदी ही कर सकते हैं. काशी के विद्वान इस बात से चिढ़ भी गए कि काशी तो मुक्ति की जगह है. उसे मुक्ति देने का ऐलान करने वाले नरेंद्र मोदी कौन हैं. ऐसा लगता है कि सारा देश एक व्यक्ति के शौक के लिए मौन धारण किए बैठा है. हर ग़लत पर सही के निशान लगा रहा है. यह अजीब दृश्य है. शिव के अनादर का दृश्य
शिव के भक्त तो जलती धूप में नंगे पांव सैकड़ों किमी चले जाते हैं. यह भी शिव की भक्ति का एक तरीका है. मतदान को प्रभावित करने के लिए लाल कालीन पर चल कर भोले तक पहुंचा जाए. जनता की इस मासूमियत पर प्रधानमंत्री अपनी जीत अहसान की तरह न्यौछावर कर रहे हैं. हर समय ख़ुद को अवतार के फ्रेम में रखकर सार्वजनिक जीवन को सीरीयल में बदल रहे हैं. बम बम भोले.

(लेखक NDTV में मैनेजिंग एडिटर हैं)
शिव का अनादर है प्रधानमंत्री का लाल कालीन पर चलकर उन तक जाना... शिव का अनादर है प्रधानमंत्री का लाल कालीन पर चलकर उन तक जाना... Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, May 19, 2019 Rating: 5

पुलिस ने की मजदूर की पिटाई, यात्रियों की हो रही फजीहत

यमुनोत्री: यमुनोत्री धाम में पुलिस ने मजदूर की पिटाई कर दी, जिसका खामियाजा देश के अलग-अलग राज्यों से आने वाले यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है। धाम में पुलिस ने एक मजदूर की ​पिटाई कर दी थी। जिसके बाद मामले मामले ने तूल पकड़ लिया। यमुनात्री धाम को जाने वाले घोड़े-खच्चर वालों ने आज सुबह से ही हड़ताल कर दी है। जिसके चलते यात्रा व्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतर गई है।


जानकीचट्टी और यमुनोत्री में मजदूरों ने कार्य बहिष्कार क​र जाम लगा दिया। मजदूरों की आनें तो उनका आरोप है कि पुलिस ने एक मजदूर की पिटाई कर दी थी। बेवहज मजदूर की पिटाई से मजदूर खासे गुस्से में हैं। नाराज डन्डी, कंडी और घोड़ा-खच्चर मजदूरों ने कार्य बहिष्कार कर दिया। वीडियो बना रहे पुलिस के एक जवान के साथ मजदूरों ने धक्का-मुक्की भी कर दी।

डन्डी, कंडी, घोड़ा और खच्चर नहीं होने से यमुनोत्री जाने वाले बुजुर्ग और चलने में असहाय यात्री खासे परेशान हैं। बड़कोट एसडीएम समेत अन्य अधिकार धाम के लिए रवाना हो गए हैं। मजदूरों को समझाने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन वो मानने को तैयार नहीं हैं। मजदूरों को आरोप है कि जिला पंचायत उनसे ज्यादा व्यवस्था शुल्क वसूल रहा है। जबकि उनकी सवारी का रेट घटा दिया गया है। पुलिस भी वसूली पर उतर आई है। इससे बड़ी दिक्कतें हो रही हैं।
पुलिस ने की मजदूर की पिटाई, यात्रियों की हो रही फजीहत पुलिस ने की मजदूर की पिटाई, यात्रियों की हो रही फजीहत Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, May 19, 2019 Rating: 5

एक ऐसा वोटर, जिनके लिए बिछाई जाएगी रेड कारपेट, फूल-मालाओं से होगा स्वागत

पहाड़ समाचार
हिमाचल : कल आखिरी चरण के लिए वोट डाले जाएंगे। इस आखिरी चरण में एक ऐसे वोटर भी हैं, जिनके लिए पोलिंग बूथ में भव्य इंतजाम किए गए हैं। पोलिंग बूथ में रेड कार्पेट बिछाई जाछाई गई है। फूल-मालाओं से जबरदस्त स्वागत किया जाएगा।
      -----–-------------------------------------

उनके बैठने के लिए अलग से विशेष कर्सी रखी जाएगी। इतना ही नहीं उनके लिए अलग से गेट भी बनाया गया है। ये कोई और नहीं, देश के पहले वोटर श्याम सरन नेगी हैं।


हिमाचल में किन्नौर के कल्पा में आदर्श मतदान केंद्र में रविवार को देश के पहले मतदाता श्याम सरन नेगी 102 साल की उम्र में 32वीं बार वोट डालेंगे। उनके लिए स्पेशल गेट, कुर्सियां और फूलों के साथ अन्य इंतजाम भी किए गए हैं। मेडिकल सुविधा भी मुहैया कराई गई है।

एक ऐसा वोटर, जिनके लिए बिछाई जाएगी रेड कारपेट, फूल-मालाओं से होगा स्वागत एक ऐसा वोटर, जिनके लिए बिछाई जाएगी रेड कारपेट, फूल-मालाओं से होगा स्वागत Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Saturday, May 18, 2019 Rating: 5

पीएम मोदी की ड्रेस के बारे में क्यों जानना चाहता है हर कोई...आखिर कहां की है पीएम की ड्रेस

देहरादून: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दौरा वैसे तो कई  कारणों से खास है, लेकिन बाबा केदारनाथ के धाम में पीएम मोदी के पहनावे को लेकर अलग ही चर्चा चल रही है। दरअसल, पीएम मोदी बाबा के दर्शन करने एक खास ड्रेस पहनकर पहुंचे। लेकिन, किसी को यह पता नहीं था कि ये कहां का पहनावा है। पीएम मोदी के पहनावे के बारे मेंं केदारनाथ से सीधा प्रसारण कर रहे कई चैनलों के पत्रकार भी बता रहे थे। पीएम मोदी जितनी देर केदारनाथ में रहे वो, वही ड्रेस पहने रहे। कुछ पत्रकारों ने पीएम मोदी की ड्रेस को जौनसारी ड्रेस भी बता दिया। 

अब हम आपको बताते हैं कि पीएम मोदी ने कहां की ड्रेस पहनी है। दरअसल, पीएम मोदी ने गढ़ावल का कोई भी परिधान नहीं पहना हुआ है। पीएम मोदी के सिर पर हिमाचली टोपी है। उन्होंने जो लंबा चोला पहना है, उसे लोग गढ़वाली पहनावा बता रहे हैं। जबकि वह गढ़वाल या उत्तराखंड के किसी भी पहनावे से नहीं मिलता है। जानकारों की मानें तो पीएम मोदी ने जो चोला पहना है। वह लद्दाख में ज्यादा पहना जाता है। हिमाचल में भी धर्मशाला के उस इलाके में लोग इसे पहनते हैं, जहां बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग ज्यादा हैं। 

वहीं, कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि पीएम मोदी ने जो चोला पहना है। वह बौद्धों का पहचनावा है। बौद्धों का इस तरह का पहनावा तो होता है, लेकिन उसकी लंबाई कम होती है। इसलिए भी ऐसा माना जा रहा है क्योंकि आज बुद्ध पूर्णिमा है। लेकिन, जानकारों के अनुसार पीएम मोदी का चोला लद्दाख में पहने जाने वाला परिधान ही है। पीएम मोदी पहले भी इस तरह का परिधान पहन चुके हैं, लेकिन वो ऊन के बजाया सामान्य कपड़े का था और उसमें टोपी भी दूसरी तरह की पहनी थी। लद्दाक में उसे खास मौकों पर पहना जाता है। पीम मोदी पहले भी लेह में हाइवे प्रोजेक्ट के उद्घाटन के मौके पर हपन चुके हैं, लेकिन तब उन्होंने सिल्की कपड़े में पहना था। इसे गौंछा भी कहा जाता है।

डा. एससी थलेड़ी के अनुसार उत्तराखंड के पौड़ी जिले में  राठ- ब्लॉक क्षेत्र हैं। थलीसैंण ब्लॉक के कई गांवों में 70 के दशक तक भांग के रेशे से ''त्युंखे" बनाये जाते थे। पुरुष इसे पहनते भी थे। त्युंखे साधारण चद्दर के तरह होते है। गढ़वाल के थलीसैंण ब्लॉक के पूर्वी नयार नदी के तट पर सांगुड़ी (ऐंठी गाँव के नीचे) नामक स्थान पर इस हैम्प के रेशे से ''त्युंखे' 'बनाने का कुटीर उद्योग चालू किया गया था। कई नाली जमीन पर भांग उगाई जाती थी। इसका एक ट्रस्ट भी था। ''त्युंखा'' एक मोटा चद्दर होता है और कम से कम 10 साल फटता नहीं है, लेकिनआधुनिकता के इस युग में अब इसका उत्पादन नहीं होता है। 50 वर्ष से नीचे की पीढ़ी इस नाम से परिचित नहीं है।

                                                       ....प्रदीप रावत (रवांल्टा)

पीएम मोदी की ड्रेस के बारे में क्यों जानना चाहता है हर कोई...आखिर कहां की है पीएम की ड्रेस पीएम मोदी की ड्रेस के बारे में क्यों जानना चाहता है हर कोई...आखिर कहां की है पीएम की ड्रेस Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Saturday, May 18, 2019 Rating: 5

राजस्थान का बगरू नहीं, उत्तराखंडी टोपी और सापा पहनाएं

कोटद्वार : देवभूमि उत्तराखंड देश दुनिया अपनी देव संस्कृति के लिए विख्यात है। हिमालय की गोद में बसे होने के कारण हमारी संस्कृति भी अनूठी हैं। हमारी परंपराएं हमारे रहन सहन भी हिमालय परिवेश के अनुसार हैं। अभी हमारे प्रदेश में चार धाम की यात्रा शुरू हो गई है। जिसके माध्यम से देश दुनिया को हमारी जीवनशैली जानने का मौका मिलेगा। 


ऐसे समय में बद्री केदार मंदिर समिति भगवान केदारनाथ और बाबा बद्री विशाल के दरबार में ड्रेस कोड लागू करने पर विचार करना स्वागत योग्य कदम है। भारत तिब्बत सहयोग मंच (युवा) मानता है कि देव स्थानों पर पवित्रता और शालीनता बनी रहनी चाहिए। भारत-तिब्बत सहयोग मंच की पौडी जिले की  बैठक में अपने विचार व्यक्त करते हुए। भारत-तिब्बत सहयोग मंच(युवा) के प्रदेश महामंत्री धर्मवीर गुसाईं ने कहा कि राजस्थानी बगरू कुर्ते की जगह पुरुषों के लिए सिर पर उत्तराखंड और हिमालय की शान काली टोपी और महिलाओं के सिर पर पहाडी रंग बिरंगा साफा का ड्रेस कोड लागू किया जाए। ये परिधान मौसम अनुकूल और सस्ता है।

इस परिधान को श्रद्धालु  खुशी मन से खरीदेंगे। जब  श्रद्धालु दिल्ली चंडीगढ़ और दक्षिण भारत में  इन परिधानों को सिर पर पहन कर चलेंगे तो हिमालय के भाल  उत्तराखंड की संस्कृति का प्रचार-प्रसार होगा । इसलिए  श्री बद्री-केदार मंदिर समिति की और उत्तराखंड की संस्कृति की प्रतीक  रूप काली टोपी और महिलाओं का साफा ड्रेस कोड के रूप  में लागू करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। बैठक की अध्यक्षता जिला अध्यक्ष एडवोकेट अमिताभ अग्रवाल ने की गौरव ठाकुर, देवेंद्र कुंडलिया, राकेश अग्रवाल, राजेंद्र नेगी आदि उपस्थित थे । संचालन जिला महामंत्री सौरव नौडियाल  ने किया।
राजस्थान का बगरू नहीं, उत्तराखंडी टोपी और सापा पहनाएं राजस्थान का बगरू नहीं, उत्तराखंडी टोपी और सापा पहनाएं Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Saturday, May 18, 2019 Rating: 5

22 मिनट 42 सेकेंड पर नमस्कार, 34 मिनट 51 सेकेंड पर धन्यवाद

  • प्रदीप रावत (रवांल्टा)
पांच साल। हर साल के 365 दिन। पांच साल में 1825 दिन। 1 प्रेस कॉन्फ्रेंस। 58 मिनट चली। 22 मिनट 42 सेकेंड पर नमस्कार। 34 मिनट 51 सेकेंड पर धन्यवाद। 1 भी सवाल का जवाब नहीं। कुलमिलाकर 13 मिनट बोले। ये लेखा-जोखा पीएम नरेंद्र मोदी की प्रेस कॉन्फ्रेंस का है। ऐसी प्रेस कॉन्फ्रेंस आपने पहली बार देखी होगी, जिसमें प्रेस करने वाले ने एक भी सवाल का जवाब नहीं दिया। जवाब मांगने वालों को झिड़की जरूर मिली....।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 साल में पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस की। साथ में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह। इसे नाम पीएम मोदी की प्रेस कॉन्फ्रेंस दिया गया था, लेकिन इसमें बोले भी अमित शाह और जवाब भी अमित शाह ने ही दिया। कॉन्फ्रेंस में पीएम ने अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाईं। फिर से बहुमत का दावा किया। पर पत्रकार ने जब पीएम से सवाल पूछा, तो कोई जवाब नहीं मिला। पीएम बोले अध्यक्ष सबसे बड़े हैं। वो ही बोलेंगे और जवाब भी देंगे। दूसरी बार सवाल पूछा तो अमित शाह ने कहा कि मैंने जवाब दे दिया ना, हर सवाल का जवाब पीएम दें ये जरूरी तो नहीं...? इसे क्या समझा जाए...? जरा सोचिएगा।
पीएम मोदी कॉन्फ्रेंस में अमित शाह की बगल वाली सीट पर उनके (पीएम और बीजेपी) मुताबिक पूर्व पीएम मनमोहन सिंह जैसे नजर आ रहे थे। पीएम बोल कम रहे थे। हंस ज्यादा रहे थे। अगर आप उनका वीडियो देखेंगेए आप पीएम की नकली हंसी को देख खुद की हंसी को प्रकट होने से नहीं रोक पाएंगे। गजब के कलाकार हैं। ये मैं नहीं, प्रियंका गांधी बोल रही हैं। देखेंगे तो सच ही लगेगा।
जिस वक्त पीएम प्रेस में मौजूद थे। राहुल भी प्रेस कर रहे थे। अपने ही अंदाज में कहा। अभी-अभी रणदीप जी ने बताया। पत्रकार बाहर खड़े हैं। अंदर से दरवाजा बंद हो गया। राहुल ने चुनाव आयोग को पक्षपाती कहा। इस तरह चुनाव कराए गए, जिससे भाजपा को फायदा हो। राहुल बोले मोदी जी के पास असीमित धनबल, मार्केटिंग, टीवी प्रचार है। हमारे पास सिर्फ सच्चाई थी। हमने मोदी के भ्रष्टाचार की पोल खोली, जनता के मुद्दे उठाए। 23 मई को जो भी निर्णय जनता का होगा। हम स्वीकार करेंगे। पीएम मोदी ने जनता के बारे में कुछ कहा ही नहीं। अमित शाह जनसभाओं का लेखा-जोखो लेकर आए। जिसने सवाल पूछा उसको फटकार लगाई...।

22 मिनट 42 सेकेंड पर नमस्कार, 34 मिनट 51 सेकेंड पर धन्यवाद 22 मिनट 42 सेकेंड पर नमस्कार, 34 मिनट 51 सेकेंड पर धन्यवाद Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Friday, May 17, 2019 Rating: 5

नैनीताल में कार में बंद कर जलाया, कंकाल बरामद!

नैनीताल: उत्तराखंड में भीमताल के समीप देर रात एक लक्जरी कार में महिला को जिंदा जलाने का मामला सामने आया है। हालांकि अब तक इस बात की आधिकारिक तौर पर पुष्टी नहीं की गई है कि कंकाल महिला का है या पुरुष का। पुलिस मामले की जांच में जुट गई है। 


नैनीताल जिले के भीमताल से लगे सलडी गांव में रानीबाग से भीमताल मार्ग पर एक कार पर आग लगने की सूचना से अफरा-तफरी मच गई। लेकिन, कुछ देर बाद जब यह बात सामने आई कि कार के भीतर किसी महिला को जिंदा जला दिया गया है। इस घटना से आसपास के क्षेत्र में सनसनी फैल गई। 

देर शाम मुख्य मार्ग पर राहगीरों ने एक लक्जरी कार को जलते देखा, जिसकी सूचना पुलिस को दी गई। राहगीरों ने ड्राइवर की बगल वाली सीट पर एक महिला को बैठे देखा। कार में दमकल विभाग ने पहुंचकर आग पर दो करीब दो घंटे में काबू पाया। आग बुझाने के बाद कार की सीट से पूरी तरह जल चुका शव बरामद किया गया है, जिसे किसी महिला का बताया जा रहा है। हालांकि यह तो जांच के बाद ही पता चल पाएगा कि शव महिला का था या पुरुष का। हत्या क्यों की गई। इसकी जांच के लिए पुलिस ने टीम का गठन कर लिया है।
नैनीताल में कार में बंद कर जलाया, कंकाल बरामद! नैनीताल में कार में बंद कर जलाया, कंकाल बरामद! Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Friday, May 17, 2019 Rating: 5

सफेदपोश के इशारे पर खाबड़वाला में 5 बीघा जमीन कब्जाई, अवैध प्लाटिंग शुरू

देहरादून:  छावनी परिषद से सटे गांव खाबड़वाला में प्रॉपर्टी डीलरों ने लगभग 5 बीघा भूमि पर बिना परमिशन के कृषि भूमि पर अवैध प्लाटिंग कर डाली। साथ ही भूमि से लगी वन विभाग की भूमि पर भी माफिया की नजर लगी हुई है। जिस पर कब्जा किया गया है। वो भूमि एमडीडीए के अंतर्गत आती है। बावजूद इसके एमडीडीए चुप्पी साधे हुए है।


जानकारी के अनुसार जिस जमीन में अवैध कब्जे कर प्लाटिंग की जा रही है, वो प्लाटिंग किसी सत्ताधारी नेता की है, जो सरकार में दायित्व धारी भी है। अवैध प्लाटिंग में सीधेतौर पर सत्ता की हनक दिखाई जा रही है। सवाल यह है कि इतनी बड़ी अवैध प्लाटिंग एमडीडीए को क्यों नजर नहीं आ रही है। इसमें एक बाद यह भी हो सकती है कि एमडीडीए को सब कुछ पता हो, लेकिन सत्ता के दबाव में कार्रवाई नहीं कर रहा है। एक और बात यह हो सकती है कि माफिया और एमडीडीए के बीच कोई गठजोड़ हो।

खाबड़वाला गांव में जिस जगह पर यह अवैध प्लाटिंग की जा रही है। वह गांव की पक्की सड़क से लगी हुई है। अवैध प्लाटिंग से सरकार को जहां राजस्व की हानि हो रही है। वहीं, सरकार की जीरो टालरेंस की नीति को भी पलीता लग रहा है। कृषि भूमि को आवासीय बताकर बेचा जा रहा है। माफिया सरकार के साथ खरीदार को भी चूना लगा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो पहले भी इस क्षेत्र में बड़े स्तर पर अवैध प्लाटिंग की जा चुकी है। बावजूद इसको कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है।
सफेदपोश के इशारे पर खाबड़वाला में 5 बीघा जमीन कब्जाई, अवैध प्लाटिंग शुरू सफेदपोश के इशारे पर खाबड़वाला में 5 बीघा जमीन कब्जाई, अवैध प्लाटिंग शुरू Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Thursday, May 16, 2019 Rating: 5

उत्तराखंड की बेटी ने फतह किया एवरेस्ट, कंचनजंगा को पार करने का बना चुकी रिकार्ड

देहरादून: उत्तराखंड के पिथौरागढ़ की सोर घाटी की बेटी शीतल नेएवरेस्ट फतह कर लिया है। शीतल सोमवार को बेस कैंप से एवरेस्ट समिट के लिए निकली थी। शीतल के कोच एवरेस्ट विजेता धारचूला निवासी योगेश गर्ब्याल बताया कि 15 मई की रात ही शीतल एवरेस्ट की चोंटी को फतह के लिए निकल गई थी और आज सुबह उसने चोंटी फतह कर ली है। एवरेस्ट समिट के लिए निकलीं शीतल के कोच एवरेस्ट विजेता धारचूला निवासी योगेश गर्ब्याल ने बताया कि शीतल में गजब का हौसला है।


शीतल पांच अप्रैल को काठमांडू से एवरेस्ट के बेसकैंप के लिए रवाना हुईं थीं। वह 15 अप्रैल को बेस कैंप पहुंचीं। उन्होंने 12 मई तक बेस कैंप में अन्य पर्वतारोहियों के साथ रॉक क्लाइबिंग का अभ्यास किया। उसके बाद वो अपने अभियान के लिए निकल गई। जिसमें उन्होंने सफलता हासिल की। शीतल 2017 में विश्व की तीसरी सबसे ऊंची चोटी कंचनजंगा को सबसे कम 22 साल की उम्र में फतह करने का विश्व रिकार्ड बना चुकी हैं। कंचनजंगा के साथ ही तमाम चोटियों को फतह कर चुकी हैं।
उत्तराखंड की बेटी ने फतह किया एवरेस्ट, कंचनजंगा को पार करने का बना चुकी रिकार्ड उत्तराखंड की बेटी ने फतह किया एवरेस्ट, कंचनजंगा को पार करने का बना चुकी रिकार्ड Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Thursday, May 16, 2019 Rating: 5

अनोखा अभियान : 32 स्कूल, 3200 बच्चे, 1 दिन में रोपेंगे 3200 फूलदार पौधे

हल्द्वानी: थाल सेवा। ऐ ऐसा अभियान, जिसने गरीबों को पांच रुपये में खाना खिलाने के सपने को सच कर दिखाया। थाल सेवा आज बड़ा अभियान कर चुका है। अब ऐसा ही एक और अभियान शुरू होने जा रहा है। पेड़ सेवा। यह अनोखा और खास अभियान है। माना जा रहा है कि इस तरह का अभियान आज तक दुनिया में कहीं नहीं चला। पहली बार ये अभियान हलद्वानी में शुरू होने जा रहा है। ये अभियान 13 जुलाई से शुरू होगा। 


दुनिया के इस अनूठे पर्यावरण संरक्षण पेड़ सेवा अभियान में रानीबाग से नैनीताल हाई-वे किनारे 32 किमी मार्ग पर 32 स्कूलों के 3200 बच्चे, 32 मिनट में 3200 फूलदार पौधे रोपेंगे, जो आने वाले समय में इस रोड़ की सुंदरता तो बढ़ाएंगे ही। पर्यावरण को भी संरक्षित करेंगे। नैनीताल मार्ग, पर्यटक मार्ग है। स्थानीय लोग भी यहां से गुजरते हैं। मार्ग को खूबसूरत बनाने के लिए पेड़ सेवा करने का संकल्प लिया गया है। पेड़ सेवा में दो से चार साल के पेड़ लगाए जाएंगे। ताकि एक मानसून की बारिश में ये स्थापित हो जाएं। वन विभाग से जुड़े विशेषज्ञों ने सर्वे का काम पूरा कर लिया है। जून माह में गड्ढे खोद दिए जाएंगे। 

पेड़ सेवा अभियान में उत्तराखंड फॉरेस्ट के चीफ जयराज और नैनीताल वन प्रभाग के सभी अधिकारियों का सहयोग मिल रहा है। प्रत्येक किलोमीटर पर एक स्कूल के सौ बच्चे अमलतास, गुलमोहर के फूलदार पेड़ के साथ साथ आम, जामुन, नीम के पेड़ भी लगाएंगे। 32 ये अभियान 32 मिनट में पूरा किया जाएगा। ऐसा अनूठा पेड़ सेवा का अभियान दुनियां में और कहीं नही हुआ है। लिटिल मिरेकल फाउंडेशन और सेल्फ रिलाइंस इनिसेटिव (एसआरआई) इस अभियान को शुरू कर रहे हैं, जिसमें वन विभाग से लेकर स्कूलों और अन्स समाजिक संगठनों का भी सहयोग मिल रहा है।
अनोखा अभियान : 32 स्कूल, 3200 बच्चे, 1 दिन में रोपेंगे 3200 फूलदार पौधे अनोखा अभियान : 32 स्कूल, 3200 बच्चे, 1 दिन में रोपेंगे 3200 फूलदार पौधे Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Thursday, May 16, 2019 Rating: 5

नगर निगम का फरमान, सूचना चाहिए तो जमा करो 49 हजार

हल्द्वानी : आरटीआई के तहत सूचना नहीं देने के लिए विभाग कई तरह के बहाने बनाते हैं या फिर सूचना मांगने वाले को भ्रमित करने वाली सूचनाएं दे देते हैं। लेकिन, नगर निगम हल्द्वानी-काठगोदाम ने सूचना देने के बजाय आरटीआई कार्यकर्ता को 49410  ₹ जमा कराने का फरमान सुना दिया।


दरअसल, आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत गोनिया ने नगर निगम हल्द्वानी-काठगोदाम से भवनकर से जुड़ी जानकारी मांगी थी, जिसके जवाब में नगर निगम ने उनको सूचना देने के बजाय उनसे 49 हजार 4 सौ 10 रुपए की डिमांड की है। नगर निगम की ओर से जारी किए गए जवाब में कहा गया है कि सूचना देने के लिए नगर निगम में उपलब्ध सभी भवनकर के रजिस्टरों की छायाप्रति करानी होगी, जिस पर करीब 50,000 का खर्च आएगा। जवाब को देखकर आरटीआई कार्यकर्ता हैरान हैं। 


नगर निगम हल्द्वानी में भवन कर जमा कराने को लेकर निगम हमेशा ही फिसड्डी साबित हुआ है। साथ ही कई गड़बड़ियां भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। आरटीआई कार्यकर्ता की मानें तो नगर निगम सभी तरह के दस्तावेजों का डाटा कंप्यूटर में फीड करता है। अगर नगर निगम को सूचना देनी होती तो कंप्यूटर में दर्ज रिकॉर्ड का प्रिंट करा कर भी दे सकता था। लेकिन, निगम ने आरटीआई कार्यकर्ता को रजिस्टरों की फोटो कॉपी देने के लिए उन ₹49410 की मांग कर दी। नगर निगम ने भवन कर के रूप में लोगों पर बकाया वसूली के जवाब नहीं बताया  कि निगम ने कहा कि गत वर्ष करीब ₹70 लाख की वसूली कर ली है।
नगर निगम का फरमान, सूचना चाहिए तो जमा करो 49 हजार नगर निगम का फरमान, सूचना चाहिए तो जमा करो 49 हजार Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Thursday, May 16, 2019 Rating: 5

आज विश्व परिवार दिवस है, क्या किसी ने मनाया, अगर नहीं तो क्यों...?

  • चंद्रशेखर पैन्यूली

आज विश्व परिवार दिवस है। परिवार से अभिप्राय संयुक्त अथवा एकल परिवार से है। संयुक्त परिवार में हम दादा दादी, ताऊ, चाचा, आदि सभी लोगों के साथ उनके बच्चों के साथ मिलकर रहते हैं, जबकि एकल परिवार में पति, पत्नी और उनके बच्चे ही आते हैं। बेहद दुःखद है कि आज संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं। वर्ष 1994 से मनाया जा रहा विश्व परिवार दिवस संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने 1994 को अन्तर्रराष्ट्रीय परिवार वर्ष घोषित किया था।

तब से विश्व में लोगों के बीच परिवार की अहमियत बताने के लिए हर साल 15 मई को अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाने लगा और 1995 से यह सिलसिला जारी है।आज परिवार में आपसी फूट एक बड़ी समस्या है। आजकल देखने को मिलता है कि संयुक्त परिवार किसी एक  दो सदस्यों के अहंकार, अपने को श्रेष्ठ बताने की होड़ या अपने को अपने भाई-बहनों से अधिक स्मृद्ध समझने के कारण अच्छे खासे परिवारों में टूट आ रही है।बेहद दुःख होता है, जब एक ही थाली में खाने वाले सगे भाई-बहन या चचेरे भाई-बहन एक दूसरे के जान के प्यासे या कट्टर दुश्मन बन जाते हैं।


न जाने क्यों समाज में ऐसी कटुता आ रही है कि परिवार टूटते जा रहे हैं। कई बार शादी के बाद भाइयों में तनाव आ जाता है। कई बार पैत्रिक सम्पति बंटवारा आपस में तलवारें खिंचा देती है। कई बार भाई-भाई अपनी पत्नियों की झूठी बातों में आकर अपनों से अलग हो जाता है। कई बार अच्छे खासे परिवार में कोई बाहरी व्यक्ति फूट डलवाकर उन्हें अलग-अलग कर देता है। सोचनीय यह है कि आखिर क्यों हम अलग हो रहे हैं? आखिर एक ही खून से बंधे होने के बाद भी आज इंसान अपनों के ही खून का प्यासा क्यों बन रहा है? क्या बंगला, गाड़ी, नौकर, चाकर आधुनिक सुख-सुविधा हमेंं अपनत्व का अहसास कराते हैं? कोई भी भौतिक सुख सुविधा कभी भी भाई-बहनों के बराबर नहींं हो सकती है। 

आखिर क्यों देवरानी-जेठानी में मनमुटाव हो रहा है। क्यों ननद भाभी के बीच में दुश्मनी देखने को मिल रही है ? क्यों भाई बहन,भाई-भाई आपस में सम्बन्ध विच्छेद कर रहे हैं। हम लोग देखा-देखी में लगे हैं। कई बार संयुक्त परिवार में कमाने वाले को लगता है, वही सबका भरण पोषण कर रहा है। जबकि सब ऐश कर रहे हैं। सच्चाई ये है कि कई बार संयुक्त परिवार में ये ही पता नहींं होता किसके भाग्य से किसे रोटी मिल रही है,कम से कम हम भारतीयों के तो ऐसे संस्कार नही थे। लेकिन आज हम भारतीय भी पाश्चात्य संस्कृति को अपना कर अपनों से दूर हो रहे हैं। याद रखें आप गाड़ी, बंगला, नौकर, चाकर खरीद सकते हैं। अपनी जिंदगी ख़ुशी-खुशी बिता सकते हैं।  मौज के लिए पूरी दुनिया के किसी भी कोने का व्यक्ति आपका सगा बन जाये, लेकिन जब कोई दुःख सामने आयेगा तो सबसे अधिक दुःख दुश्मन बन चुके खून के रिश्तों को ही होगा। कई बार ये भी देखा गया कि संयुक्त परिवार को बढ़ाने वाले व्यक्ति से मतलब निकल जाने के बाद उसके भाई बहन अलग होकर उल्टा उसके योगदान पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हैं कि इसने किया ही क्या है?

हमारे लिए तो कुछ नहींं किया वो अपने अतीत को भूल जाते हैं कि उन्हें कठिन परिस्थितियों से निकालकर बाहर कौन लाया। आज टूटते परिवार और अपनों के बीच बढ़ती खटास एक बड़ी चुनौती सामने आ रही है। न जाने परिवारों को तोड़ने वाले मूर्खों में ऐसा क्या अहंकार आ गया कि उन्हें परिवार के आपसी प्रेम को खत्म करने में अच्छा लगता है। याद रखें एकता में ही शक्ति है। जब तक परिवार साथ रहेगा तब तक ताकत बढ़ी हुई रहेगी वरना अकेले में आप कमजोर होते जाओगे, कभी भी अपनों को न नकारे न जाने कब कौन काम आ जाये। हो सकता है आज जिसे देखकर आप दूर हो रहे भविष्य में उसी का सहारा लेना पड़े। अपने परिवार को कभी भी टूटने न दे। किसी दूसरे के बहकावे में न आएं, घर की बात घर में ही बैठकर सुलझाएं। 

अपनों के साथ अपने अहंकार को न पनपने देंं। अपनी कमाई को ही परिवार में श्रेष्ठ न समझें। सभी बच्चों को समान प्यार दे, बच्चे किसी भी भाई बहन के हो कोई भेदभाव बच्चों में न हो, बड़े भाई को बड़े का सम्मान मिले और छोटे को छोटे का प्यार स्नेह और अपनत्व, आपसी सम्बन्धन में हर व्यक्ति को निजी अहंकार त्यागकर खुले मन से एक दूसरे का साथ देना चाहिए, मिल बैठकर किसी भी समस्या का समाधान ढूंढे, किसी सुनी सुनाई बातों पर अपने परिवार को न तोड़े, न टूटने दें, किसी दूसरों के कहने से अपनों से बैर न रखे,याद रखे आप सब कुछ खरीद सकते लेकिन खुशियां नहींं। अपनों के प्यार प्रेम से मिलती है। और हम तो वैसे भी भारतीय हैं जिनके संस्कारो में वसुधैव कुटुम्बकम की भावना समाही है। जब दुनिया को परिवार मान सकते हैं तो अपने खून के रिश्तों से दूरी क्यों? 

आज विश्व परिवार दिवस है, क्या किसी ने मनाया, अगर नहीं तो क्यों...? आज विश्व परिवार दिवस है, क्या किसी ने मनाया, अगर नहीं तो क्यों...? Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Wednesday, May 15, 2019 Rating: 5

आखिर आग की लपटों से तप ही गए हरक सिंह रावत, सीएम पर निशाना, अधिकारियों के विदेश दौरे सुशान के लिए खतरनाक

देहरादून : वन मंत्री हरक सिंह रावत ने एक बार फिर गुस्से में हैं। इस बार उनके निशाने पर श्रम विभाग के आयुक्त आनंद श्रीवास्तव और वन विभाग के मुखिया जयराज हैं।  अधिकारियों के बहाने मुख्यमंत्री त्रीवेंद्र सिंह रावत को भी निशाने पर लिया है। उन्होंने अधिकारियों के विदेश जाने के बहाने सीधे मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को उनके सुशान यानि जीरो टालरेंस पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कार्मिक सचिव को लेटर जारी कर कहा है कि इस तरह से बगैर उनकी अनुमति के किसी भी कार्मिक का विदेश जाना पूरी तरह गलत है।


दरअसल, इन दिनों वन विभाग के अधिकारी और श्रम विभाग के अधिकारी विदेश दौरे पर हैं, जबकि प्रदेश में जंगल धू-धू कर जल रहे हैं। बावजूद इसके वन मंत्री हरक सिंह रावत और वनाधिकारियों के बीच ना तो मामले को लेकर चर्चा हुई और ना ही कोई समीक्षा बैठक की गई। हरक सिंह रावत के कार्मिक सचिव को लिखे पत्र में साफ तौर पर कहा गया है कि इससे अनुशासनहीनता हो रही है। उनसे किसी फाइल का अनुमोदन लेने के बजाय सीधे मुख्यमंत्री से अनुमोदन लिया जा रहा है, जो गलत है।


कार्मिक सचिव को लिखी चिट्ठी में सीधे तौर पर कहा है कि भविष्य में बगैर उनकी अनुमति के किसी भी अधिकारी के विदेश दौरे जाने की अनुमति ना दी जाए। साथ ही कहा कि यह सुशान के लिए अच्छा नहीं है। हरक सिंह रावत ने सीधे मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से विदेश जाने की अनुमति लेने पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि अधिकारी विभागीय मंत्री होने के नाते उनसे नहीं पूछ रहे। बल्कि, सीधे मुख्यमंत्री से फाइलें अनुमोदित करा ले रहे हैं, जो सुशासन के लिए अच्छा नहीं है।

इससे एक बात यह भी साफ हो जाती है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत अन्य मंत्रियों को ज्यादा दखलअंदाजी करने की आजादी नहीं दे रहे हैं। इसी तरह हरीश रावत के लिए भी कहा जाता था कि वे सभी विभागों के फैसले खुद ही लेते हैं। इसको लेकर ही कांग्रेस में बगावत के स्वर मुखर हुए थे। इधर, डबल इंजन की सरकार में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी एकला चलो की नीति की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। अब देखना यह होगा कि हरक सिंह रावत की इस चिट्ठी के बाद सियासत के क्या रंग नजर आते हैं।
आखिर आग की लपटों से तप ही गए हरक सिंह रावत, सीएम पर निशाना, अधिकारियों के विदेश दौरे सुशान के लिए खतरनाक आखिर आग की लपटों से तप ही गए हरक सिंह रावत, सीएम पर निशाना, अधिकारियों के विदेश दौरे सुशान के लिए खतरनाक Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Wednesday, May 15, 2019 Rating: 5

गहरी नींद में सोते हुए बदली करवट, दलदल में गिरा और मौत हो गई

किच्छा: ऊधमसिंह नगर के जिला किच्छा पनचक्की फार्म के पास एक ऐसी घटना हुई। जिसे सुनकर आप हैरान रहे जाएंगे। यहां एक व्यक्ति सोया हुआ था। गहरी नंदी में उसने करवट बदली और दलदल में फंस गया। उसने दलदल से निकलने का प्रयास तो किया, लेकिन निकल नहीं पाया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।  


पनचक्की फार्म के पास दलदल वाले इलाके में एक युवक पशुओं को चुगांने गया था। इस दौरान वो दलदल के पास ही छांव में आराम करनेन लगा। इस दौरान उसे गहरी नींद आग गई। नींद में करवट बदलते समय सीधे दलदल में गिरा गया, जिससे उसकी मौत हो गई। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। 

कमला काॅलोनी चुकटी के रहने वाले 18 साल का युवक मंगलवार को दिन में मवेशियों को चराने गया था। कुछ देर बाद वह मवेशियों को पानी पिलाने के लिए पनचक्की की तरफ ले गया। उसके पिता माधव ने बताया कि मवेशियों को पानी पीता छोड़ उनका बेटा नहर किनारे एक पेड़ के नीचे आराम करने के लिए लेट गया और उसकी आंख लग गई।

जिस जगह पर वो सोया था, वो थोड़ा ऊंचा एरिया था। नींद में उसने जब करवट बदली तो वह नहर में जा गिरा और नहर के दलदल में फंस गया। श्याम को दलदल में गिरता देख लोगों ने शोर मचाया। आसपास के लोगों ने उसे बाहर निकालकर अस्पताल पहुंचाया, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। 

गहरी नींद में सोते हुए बदली करवट, दलदल में गिरा और मौत हो गई गहरी नींद में सोते हुए बदली करवट, दलदल में गिरा और मौत हो गई Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Wednesday, May 15, 2019 Rating: 5

सलाम: बस चलाते हुए ड्राइवर को आया हार्ट अटैक, खुद की मौत हो गई पर 30 यात्रियों की जान बचा गए

उत्तरकाशी: आज एक ऐसी घटना हुई, जिसने सबको चौंका दिया। एक ऐसी घटना जिसमें चालक की मौत हो गई, लेकिन मरने से पहले वो 30 जानों को बचा गए। बस के ड्राइवर की जजबे को हर कोई सलाम कर रहा है, लेकिन उसकी मौत पर लोग गमगीन भी हैं।
गंगोत्री यात्रा पर आए गुजरात से यात्रियों को लेकर आए बस चालक को अचानक हार्ट अटैक आ गया, जिससे उसकी मौत हो गई। लेकिन, मरने से पहले उन्होंने बस को रोक दिया। गुजरात के तीस यात्रियों की जान आज एक बस चालक ने अपनी जान गंवाकर बचाई। बस चालक भारत सिंह पंवार को चलती बस में हार्ट अटैक आ गया, जिससे उनकी मौत हो गई। मरने से पहले चालक ने बस को रोक दिया। इस तरह एक बड़ा हादसा टल गया। गंगोत्री धाम यात्रा पर आये गुजरात, सूरत के 30 यात्री अपनी गंगोत्री के दर्शन कर लौट रहे थे।भरत पवांर ऋषिकेश के निवासी हैं। 

भटवाड़ी के पास बस चालक की तबीयत बिगड़ने लगी। चालक ने पूरे संयम और बहादुरी से बस को किनारे किया। हालत ज्यादा खराब होने पर बस में सवार कुछ यात्री, बस परिचालक व भटवाड़ी के ग्राम प्रधान संजीव नौटियाल ने बस चालक को स्वास्थ्य केंद्र भटवाड़ी ले गये। लेकिन तब तक वो दम तोड़ चुके थे। बस चालक ने अपनी जान तो गवां दी, लेकिन 30 यात्रियों की जान बचा गए।





Source.... Creative news express
सलाम: बस चलाते हुए ड्राइवर को आया हार्ट अटैक, खुद की मौत हो गई पर 30 यात्रियों की जान बचा गए सलाम: बस चलाते हुए ड्राइवर को आया हार्ट अटैक, खुद की मौत हो गई पर 30 यात्रियों की जान बचा गए Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Tuesday, May 14, 2019 Rating: 5

आज शाम को जरा संभलकर रहें, अगले 24 घंटे का अलर्ट

देहरादून: आज से प्रदेश में मौसम का मिजाज बदलने लगा है। मौसम विभाग ने अगले 24 घंटे अलर्ट रहने के लिए कहा है। प्रदेशभर में खासकर मैदानी इलाकों में आज शाम को तेज हवाएं यानि झक्कड़ आने का अनुमान है। हवाओं की रफ्तार 50 से 60 किलोमीटिर प्रति घंटे और गस्टिंग 60 से 70 किलोमीटर प्रतिघंटा तक जा सकती है। 


मंगलवार यानि आज सुबह से ही मौसम ने करवट बदली ली थी। राजधानी देहरादून समेत पहाड़ी इलाकों में सोमवार देर रात हुई बारिश से लोगों को गर्मी से भी कुछ राहत मिली है। आज कुंमाऊ से लेकर गढ़वाल तक सभी जगह बादल छाए हैं।

मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार अगले 24 घंटों में प्रदेशभर में बारिश हो सकते हैं। तेज आंधी का भी अनुमान लगाया गया है। आंधी और बारिश गर्मी से राहत मिलने की संभावना है। राज्य मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक विक्रम सिंह ने बताया कि 14 मई को दोपहर या शाम को 40 से 50 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से आंधी आ सकती है। कुछ स्थानों पर हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है।

आज शाम को जरा संभलकर रहें, अगले 24 घंटे का अलर्ट आज शाम को जरा संभलकर रहें, अगले 24 घंटे का अलर्ट Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Tuesday, May 14, 2019 Rating: 5

हल्द्वानी में इज्जत बचाने के लिए चलते ऑटो से कूदी छात्रा

हल्द्वानी: हल्द्वानी में ऑटो में सवार लड़की को अकेला देख ऑटो चालक ने उसके साथ बदतमीजी से बातें करनी शुरू कर दी। छात्रा के मना करने पर ऑटो चालक अश्लील बातें करने लगा। इतना ही नहीं वो छात्रा का अपहरण करना चाहता था। जैसे ही उसने ऑटो की गति तेजी की। छात्रा उसके इरादे भांप गई। उसने अपनी इज्जत बचाने के लिए चलते ऑटो से छलांग लगा दी। 


छात्रा ने पूरी घटना की जानकारी अपने परिजनों को दी। परिजनों ने अपने स्तर से सीसीटीवी फुटेज खंगाले लेकिन, पुलिस में शिकायत नहीं की। सोशल मीडिया पर एक ऑटो की फुटेज और छात्रा के अपहरण की कोशिश की बात वायरल हो रही है। ललित महिला इंटर कालेज के सामने सोमवार की दोपहर करीब दो बजे चार छात्राएं घर जाने के लिए एक ऑटो में सवार हुईं। तीन छात्राएं बड़ी मस्जिद के समीप उतर गईं, लेकिन नौवीं की एक छात्रा दुर्गा मंदिर के समीप जाने के लिए ऑटो में बैठी रही।

रास्ते में ऑटो चालक छात्रा से अश्लील बातें करने लगा। इस पर छात्रा चालक को खरी-खोटी सुनाकर आटो से कूद गई। चालक मौके से भाग निकला। छात्रा के बताने पर परिजनों ने चालक की पहचान करने के लिए सीसीटीवी फुटेज  खंगाले। परिजन एक आटो का नंबर फुटेज में आने पर पर संबंधित चालक की तलाश कर रहे हैं।

हल्द्वानी में इज्जत बचाने के लिए चलते ऑटो से कूदी छात्रा हल्द्वानी में इज्जत बचाने के लिए चलते ऑटो से कूदी छात्रा Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Tuesday, May 14, 2019 Rating: 5

बच्चों को सूखा कूड़ा दो, फीस में पांच प्रतिशत डिसकाउंट पाओ

उत्तरकाशी: अगर आपके बच्चे उत्तरकाशी के निजी स्कूलों में पढ़ते हैं, तो ये खबर आपके काम की है। आप अपने बच्चों के पास सूखा कूड़ा दीजिए और स्कूल फीस में पांच प्रतिशत की छूट पाइए। जी हां आप बिल्कुल सही पढ़ रहे हैं। उत्तरकाशी में इस योजना पर काम चालू हो गया है। ये एक बेहद खास मुहिम है, जिसे डीएम आशीष चैहान शुरू करने जा रहे हैं। 


मुहिम बेहद खास है। सफाई के प्रति लोगों को जागरूक करने की इस मुहिम को लेकर डीएम ने काम शुरू कर दिया है। उन्होंने सूखा कूड़ा लाने वोल स्टेडेंट को पांच प्रतिशत की छूट देने की बात कही है। विद्यालय में स्वच्छता निरीक्षक के साथ ही विद्यार्थीयों के स्वच्छता क्लब भी बनाये जायेंगे। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम एक माॅडल के तौर पर चलाया जायेगा। यह जिम्मेदारी भी मुख्य शिक्षा अधिकारी को दी गई है कि वो निजी स्कूलों से बात कर जल्द कार्ययोजना पेश करें, जिससे मुहिम को आगे बढ़ाया जा सके। 

दरअसल, डीएम आशीष चैहान आज जिले में कूड़ा निस्तारण को लेकर बैठक ले रहे थे। इस दौरान उन्होंने कहा कि सभी निकाय घर-घर से कूड़ा कलेक्शन करेंगे। जैविक-अजैविक कूड़ा घर से अलग-अलग जमा किया जाएगा। सभी निकायों के अधिशाषी अधिकारियों को पांच दिनों के भीतर काम्पेक्टर लगाने को कहा है। साथ ही डोर-टू-डोर कलेक्शन चार्ज लेने के भी निर्देश दिए हैं।
बच्चों को सूखा कूड़ा दो, फीस में पांच प्रतिशत डिसकाउंट पाओ बच्चों को सूखा कूड़ा दो, फीस में पांच प्रतिशत डिसकाउंट पाओ Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Monday, May 13, 2019 Rating: 5

बर्फीली टनल से हेमकुंड साहिब गुरुद्वारे तक पहुंचेंगे यात्री

देहरादून: हेमकुंड साहिब की यात्रा पर आने वाले यात्रियों को इस बार खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। हेमकुंड साहिब में करीब 10 फीट तक बर्फ जमी है। मंदिर तक पहुंचने का रास्ता अब भी बंद है। इस रास्ते को खोलने का मतलब मुसीबत को मोल लेना है। इसको देखते हुए अब गुरुद्वारे तक पहुंचने के लिए तीन मीटर की टनल बनाने का निर्णय लिया गया है। गुरुद्वारे तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को बर्फीली टनल से होकर गुजरना पड़ेगा।


हेमकुंड साहिब की यात्रा एक जून से शुरू होगी। यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले गुरुद्वारों में यात्रा की तैयारियां चल रही हैं। हेमकुंड साहिब आस्था पथ अभी भी तीन किलोमीटर तक बर्फ में ढका है। सेना के जवान बर्फ हटाने का काम कर रहे हैं। खून जमा देने वाली ठंड के बीच सेना के जवान और सेवादार लगातार काम पर जुटे हैं।

मौसम खराब होने से यात्रा शुरू होने तक पूरी तरह से बर्फ हटाना चुनौती से कम नहीं है। इसको देखते हुए गुरुद्वारे तक पहुंचने के लिए करीब तीन मीटर तक बर्फ को काटकर टनल बनाई जा जाएगी। इससे गुजर कर तीर्थयात्री गुरुद्वारे में मत्था टेकने पहुंचेंगे। हेमकुंड सरोवर भी अभी तक पूरी तरह से बर्फ में जमा हुआ है।

बर्फीली टनल से हेमकुंड साहिब गुरुद्वारे तक पहुंचेंगे यात्री बर्फीली टनल से हेमकुंड साहिब गुरुद्वारे तक पहुंचेंगे यात्री Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Monday, May 13, 2019 Rating: 5

अस्पताल के बिस्तर पर लेटी इस मां के लिए मदर्स-डे हैप्पी कैसे हो सकता है ?

पहाड़ समाचार
मदर्स डे। ये दिन पूरी दुनिया में मां को याद करने और उनके मातृत्व को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। कई माएं ऐसी हैं, जो अपनी संतान से बिछड़ गई। या उनके बच्चों ने उनको घर से निकाल दिया। मां का दिल बहुत कोमल होता है। मां को उनको उनकी संतान नहीं मिली, तो घर से निकल पड़ी अपनी औलाद को खोजन और खोजते ही खोजते अपनी सुध खो बैठी। खबर के साथ आपको जो फोटो नजर आ रहा है। वह भी ऐसी ही एक मां का हैं। ऐसी मां, जो अपने बच्चों को खोजते हुए सड़कों पर घूमती रहती है। सड़कों पर घूमते हुए, खुद को तबाह कर लिया, लेकिन रटन आज भी अपने बच्चों की है। वो यह नहीं बता पा रही है कि उसके बच्चे कहां हैं ? क्या करते हैं ? बच्चों से अलग कैसे हुई, लेकिन चिंता आज भी अपने बच्चों की है। जरा सोचिए कि क्यय इस मां का मदर्स-डे भी हैप्पी हो सकता है। सोशल मीडिया पर हैैप्पी मदर्स-डे की पोस्ट इनके बच्चों ने भी होगी। फिर सोचिए...कि क्या उन बच्चों का अपनी मां को इस तरह छोड़कर मदर्स-डे हैप्पी हो रहा होगा...?
नाम-बिमला पड्यार बिष्ट। मायका-मंजोखी ढांगू। सुराल-पड्सार गांव (ऋषिकेश के पास)। पूर्व नवसेना अधिकारी योगंबर सिंह रावत ने मदर्स-डे पर फेसबुक पर एक छोटी, लेकिन भावुक पोस्ट लिखी है। उन्होंने लिखा कि कुछ दिनों पहले गढ़वाल सभा के युवा प्रकोष्ठ के सचिव संजय थपलियाल ने एक महिला को कोटद्वार अस्पताल में भर्ती था। जहां कुछ सामाजिक कार्यकर्ता बहिनों ने उनकी सेवा की। फिर वो अचानक गायब हो गई थीं। उन्होंने लिखा कि अपने साथी गोबिंद डंडरियाल के साथ मुख्य चिकित्सक को मिलने गए तो उपरोक्त महिला मुझे सीढ़ी पर मिल गई। मैंने जब उससे पूछा कि गढ़वाली आती है। तो हां में सिर हिला दिया। फिर उन्होंने अपने बारे में काफी कुछ बता दिया। महिला ने बातया कि वो अपने बच्चों को खोजते हुए कोटद्वार पहुंच गई और अब उसकी ये हालत हो गई।
मां की ममता कितनी महान है, इसे सिर्फ एक मां ही जान सकती है। लेकिन, लानत है उन बच्चों पर, जिनहोंने अपनी मां को इस तरह सड़क पर लाकर छोड़ दिया। मां तो बच्चों को नहीं भूले, लेकिन बच्चे मां को भूल गए। आज सोशल मीडिया पर हर कहीं मदर्स-डे के पोस्टर ही नजर आ रहे हैं। मैसेज कर मदर्स-डे की शुभकामनांए दी जा रही हैं। दिखावे की इस दुनिया में हर कोई बस दिखावा करता नजर आ रहा है। मां बस मां होती है। मां होने का एहसास वही जान सकतीं हैं। संताने अक्सर मां को भुला बैठती हैं, लेकिन मांए हमेशा अपने बच्चों को याद रखती हैं। 

असल मायने में मदर्स-डे तब सही होगा, जब वृद्धा आश्रमों की माएं अपने घर, बपने बच्चों, अपने परिवार के साथ खुशी से जी रही होगी। जब किसी मां को बिमला देवी की तरह सड़कों पर नहीं भटकना पड़ेगा। एक तरफ हम मदर्स-डे मना रहे हैं। दूसरी ओर बिमला मां की तरह कई मांए अपने बेटों के लिए सड़कों पर भटक रही हैं। शुक्रिया पूर्व नवसेना अधिकारी योगंबर सिंह रावत और उनके साथियों को जिन्होंने मदर्स-डे पर सड़कों पर भटकती मां को अस्पताल पहुंचाया। अब वो उनको घर वापस जाने के के इंतजाम में जुटे हैं।
...प्रदीप रावत (रवांल्टा)
अस्पताल के बिस्तर पर लेटी इस मां के लिए मदर्स-डे हैप्पी कैसे हो सकता है ? अस्पताल के बिस्तर पर लेटी इस मां के लिए मदर्स-डे हैप्पी कैसे हो सकता है ? Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, May 12, 2019 Rating: 5

संस्कृति पर करारा प्रहार, बाबा केदार के दर पर नहीं सुनाई दी ढोल की थाप, भांगड़ा खूब हुआ

  • चंद्रशेखर पैन्यूली 
किसी भी देश प्रदेश या समाज की पहचान उसके रीति रिवाजों, उसकी संस्कृति से होती है, हमारा देश एक विशाल देश है। जहां कई तरह की संस्कृति रीति-रिवाज, बार-त्यौहार देखने को मिलते हैं। हमारे छोटे से प्रदेश उत्तराखंड में भी कई ऐसे रीति-रिवाज और संस्कृति है, जो हमें एक विशेष पहचान दिलाती है। कुछ पहचान हमें हमारे वाद्य यंत्र दिलाते हैं। उन्ही वाद्य यंत्रों में एक है ढोल-दमाऊ। ढोल-दमाऊ हमारी प्राचीन संस्कृति के द्योतक हैं। किसी भी मांगलिक कार्य, शुभ कार्य या किसी भी अवसर पर हमारे समाज में ढोल-दमाऊ की थाप पर कार्यक्रम होते हैं। लेकिन, बेहद दुःख तब हुआ जब इस बार विश्व प्रसिद्ध बाबा केदारनाथ के कपाट खुलते वक्त पहाड़ की पहचान ढोल-नगाड़ों के बजाय वहां पर देशी ढोल की थाप पर मन्दिर कपाट खुले।इस बड़ी भूल के लिए सीधे तौर से बीकेटीसी, राज्य सरकार, धर्म और संस्कृति मंत्रालय जिम्मेदार हैं। साथ ही ये स्थानीय बाजगियों की बड़ी अनदेखी है। क्योंकि सदियों से हमारे बाजीगर अपने ढोल-नगाड़ों की थाप के लिए जाने जाते हैं। कई बाजीगर (औजी) शामवेद के महान ज्ञाता हुए। लेकिन, जब केदार धाम जैसी पवित्र जगह पर ढोल-नगाड़ों के बजाय देशी ढोल को प्रमुखता मिलेगी तो साफ है कि इससे बाजीगरों का मनोबल टूटेगा। हमारी संस्कृति भी प्राभावित होगी। केदार नाथ में पहाड़ की संस्कृति के द्योतक ढोल-नगाड़ों का न होना बेहद दुर्भग्यपूर्ण है।

ढोल-दमाऊ हमारे लिए एक वाद्य यंत्र मात्र नहीं हंै। ये हमारी प्राचीन संस्कृति के द्योतक हैं। हमारे पूर्वजों की निशानी है। ये सिर्फ 4-6 किलो का ढोल मात्र नहीं है। ये हमारे देवी-देवताओं की निशानी होती है। देवी-देवताओं का वास ढोल पर माना जाता है। गढ़वाल के अधिकांश गांव में अपने-अपने आराध्य देवी-देवताओं के नाम पर ढोल बना होता है। जैसे नागराजा का ढोल, कोटेश्वर का ढोल, ओणेश्वर का ढोल, बटुक भैरव का ढोल, देवी मां का ढोल,  राजा रघुनाथ का ढोल आदि। ढोल सिर्फ मनोरंजन के साधन मात्र नहीं हैं, ये हमें अहसास कराते हैं, हमारी श्रेष्ठ संस्कृति का। किसी भी शुभ कार्य में ढोल बजने का मतलब देवी देवताओं को बुलावा होता है। लोग भले ही आज पहाड़ों से बड़ी संख्या में पलायन कर गए हों, लेकिन, अपने घर पर आज भी किसी भी शुभ कार्यों में वो अपने पैतृक गांव के देवी-देवताओं के ढोल को विधिवत न्योता देता है और ससम्मान बुलाता है। ये सम्मान हमारे बाजीगरों के प्रति भी अपनत्व और पारिवारिक सम्बन्धों को भी प्रगाढ़ करता है। क्योंकि जब ढोल आएगा तो स्वाभाविक है कि उसको बजाने वाला भी साथ ही होगा। ढोल मात्र नाचने-गाने या मनोरंजन का साधन नहीं है। ढोल हमें हमारी संस्कृति से रू-ब-रू करवाते हैं। 
ढोल की अलग-अलग धुनें दिन और समय का वर्गीकरण भी करते हैं। कहते हैं कि पहले के समय जब घड़ी नहीं थी, तो गांव में सार्वजनिक जगह पर गंव का बाजगी ढोल बजाकर समय की तरफ इशारा करता था। ये परम्परा आज भी जारी है। जैसे नपती लगाना, धुंयल बजाना, आदि। किसी भी मंडाण, थौले, पूजा, अनुष्ठान, मंन्दिरों में ढोल की थाप पर ही कार्यक्रम सम्पन होते हैं। ढोल हमारे कई रीति-रिवाजों का प्रतिनिधि है। जैसे चैत्र के महीने विवाहिता लड़कियों के यहां मायके पक्ष के औजी जाकर मायके की खुशखबरी देते थे और ससुराल से उनको ससम्मान विदा किया जाता है। जिसे हम लगमानी कहते हैं। साथ ही जब किसी दूर दराज के देवी देवता का ढोल हमारे घर गंव में आता है तो स्थानीय बाजीगर उसको पूर्ण सम्मान दिलवाता है। बाकायदा उसको सगुन देकर, पिठांई लगाई जाती है। अपने घर पर भी किसी भी शुभ कार्य में ढोल के घर पर आते ही सबसे पहले उसको नमन करते हुए उसको तिलक लगाकर सम्मान से आदरपूर्वक आमंत्रित किया जाता है।

हैरानी की बात है कि इस बार केदारनाथ धाम में स्थानीय ढोल-नगाड़ों का न दिखना बेहद दुःखद है। एक तरफ तो हम ढिंढोरा पीटते हैं कि हम संस्कृति और रीति-रिवाजों के सच्चे हितैषी हैं। हम पीएम मोदी के सामने इन्वेस्टर सम्मिट में मांगल गीत का बड़ा कार्यक्रम रखते हैं। वहीं, करोड़ांे लोगों की आस्था के केंद्र स्थल भगवान केदार के धाम में हम स्थानीय संस्कृति की पहचान ढोल-दमाऊ के बजाय देशी ढोल को बजाकर अपना कार्य पूर्ण समझ रहे हैं। 

केदारनाथ में भांगड़ा की धुन नहीं बल्कि, देवी देवताओं के आह्वान की धुन बजनी चाहिए। वो कोई पिकनिक स्पॉट नहीं बल्कि धार्मिक आस्था का केंद्र है। ये नहीं कि भांगड़ा बजवा दिया। 10-20 लोग थिरकें और हम खुश। ऐसा न हो बल्कि, ढोल दमाऊ की थाप पर देवी-देवताओं के आह्वान के साथ हम झूमें वो अधिक अच्छा होगा। साथ ही हमारे ढोल-दमाऊ से हमारे देश के विभिंन हिस्सों के साथ-साथ विदेशी श्रदालु भी परिचित हों। हमारे श्रेष्ठ रिवाजों और संस्कृति का प्रचार प्रसार हो।


संस्कृति पर करारा प्रहार, बाबा केदार के दर पर नहीं सुनाई दी ढोल की थाप, भांगड़ा खूब हुआ संस्कृति पर करारा प्रहार, बाबा केदार के दर पर नहीं सुनाई दी ढोल की थाप, भांगड़ा खूब हुआ Reviewed by पहाड़ समाचार www.pahadsamachar.com on Sunday, May 12, 2019 Rating: 5
Powered by Blogger.